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प्रचंड बहुमत के साथ आई मोदी सरकार 2.0 इन मोर्चों पर पास हुई या फेल?

नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक मंच पर बड़े-बड़े वादे किए थे. ये सच है कि इन वादों को पूरा किया गया. लेकिन, कई ऐसे वादे हैं जिन पर पूरा काम नहीं हुआ. इसका जिम्मेदार कौन है?

साल 2014 के जनादेश ने नरेंद्र मोदी को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया. इसके पीछे तीन महत्वपूर्ण कारण थे. पहला मोदी का व्यक्तिगत करिश्मा, दूसरा पार्टी और संघ परिवार कैडर का एकजुट जमीनी प्रयास और तीसरा पिछली यूपीए 2 सरकार की विफलताएं.

साल 2019 के आम चुनावों में मोदी को जो जनादेश मिला, वह 2014 के जनादेश से भी बड़ा था. इस जीत में मोदी का करिश्मा एक कारक बना रहा. जनता के साथ मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता हर गुजरते साल के साथ बढ़ती गई. अप्रैल 2019 में जीत के बाद पीएम मोदी अब तक के उच्चतम स्तर पर थे. अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी संगठन भी मजबूती और विस्तार में बढ़ा.   

2019 में भारी जीत के बाद जब उन्होंने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया, तो निर्णायक और व्यावहारिक दृष्टिकोण जारी रहा. सत्ता में वापस आने के कुछ महीनों के भीतर मोदी सरकार द्वारा लिए गए कुछ महत्वपूर्ण फैसलों से यह साफ हो गया कि मोदी जीत के बारे में आश्वस्त थे .

उन्होंने पहले से ही अपने दूसरे कार्यकाल के लिए योजनाएं तैयार कर ली थीं. शुरुआती 100 दिनों में लिए गए कई बड़े फैसलों से साफ संकेत मिलता है कि सरकार चुनाव से पहले ही इनकी तैयारी कर रही थी.

तीन तलाक को निरस्त करने के लिए विधेयक जुलाई में पेश किया गया था और पारित किया गया था. अगस्त की शुरुआत में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35 ए और 370 को ऐतिहासिक रूप से निरस्त कर दिया गया. जिससे जम्मू और कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में एक बड़ा बदलाव आया. साल के अंत में नागरिकता संशोधन कानून - सीएए को पास करके एक और बड़ा कदम उठाया गया.

अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और तीन तलाक को निरस्त करने जैसे फैसले आसान नहीं थे. उन्हें संसद में पारित करने और लोकप्रिय समर्थन हासिल करने के लिए दृढ़ प्रयास की जरूरत थी. अपने खास अंदाज में मोदी ने आगे बढ़कर दोनों सदनों में विधेयकों को पारित कराया.

जानकारों की मानें तो उन्होंने कुछ विश्वसनीय अधिकारियों की मदद से महीनों तक चुपचाप मसौदा विधेयकों पर काम किया था. हालांकि इसके बावजूद ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें सरकार को चुनौतियों का सामना करना पड़ा. सवाल ये है कि क्या पीएम मोदी इन मुद्दों पर फेल हुए हैं या पास. जानते हैं. 

वैश्विक महामारी- कोरोना

सरकार का लक्ष्य देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी तक पहुंचाने का था. देश और दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में थी. मोदी सरकार ने मार्च 2020 की शुरुआत में विदेशी यात्रियों पर प्रतिबंध लगा दिया. आखिरकार उस साल मार्च-मई के दौरान लगभग दो महीने के लिए पूर्ण लॉकडाउन लागू हो गया.

प्रधानमंत्री की निरंतर निगरानी और जनता के साथ जुड़ाव के साथ इन सख्त उपायों ने भारत को कोविड की पहली लहर के घातक प्रभाव एक हद तक काबू पाने में मदद की. भारत ने टीकों के निर्माण और कई देशों को उनकी आपूर्ति में भी नेतृत्व किया. दो भारतीय निर्मित टीके 2020 के अंत तक बाजार में आ गए हैं. बाद में और टीके जोड़े गए. वैक्सीन मैत्री' के रूप में भारत ने पड़ोसियों और कई अन्य देशों की भी मदद की.

हालांकि, महामारी की दूसरी लहर पहली लहर के मुकाबले बहुत ज्यादा उग्र हो गया था. इससे देश के हेल्थ सेक्टर का दम पूरी तरह से घुट गया. प्रधानमंत्री मोदी देश को ज्यादा उम्मीदें थी. सरकार के संचालन की कड़ी आलोचना हुई. पिछली सरकारों की तरह इस सरकार ने स्वास्थ्य सेवा की उपेक्षा की. भारत दुनिया में स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक खर्च के सबसे निचले स्तर में से एक है. 

कोरोना की वजह से विकास की रफ्तार हुई धीमी 

माना जाता है कि कोरोना महामारी की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को 200-300 अरब डॉलर का नुकसान पहुंचाया. लेकिन कोविड पूरी तरह से जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है. 2019-20 की चौथी तिमाही में भारत की जीडीपी 7-8% के उच्च स्तर पर थी, जो एक दशक में सबसे कम 3.1% थी. 

बेरोजगारी 
बीबीसी में छपी खबर के मुताबिक सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के सीईओ महेश व्यास ने कहा, 'भारत की सबसे बड़ी चुनौती 2011-12 से निवेश में सुस्ती रही है. 2016 के बाद से हमें एक के बाद एक कई आर्थिक झटके झेलने पड़े हैं. उन्होंने कहा कि नोटबंदी, जीएसटी और रुक-रुक कर लगाए गए लॉकडाउन से रोजगार कम हुए हैं.

पिछली आधिकारिक गणना के अनुसार 2017-18 में बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर - 6.1% पर पहुंच गई. तब से यह लगभग दोगुना हो गया है. 

2021 की शुरुआत से 25 मिलियन से ज्यादा लोगों ने अपनी नौकरी खो दी है. प्यू रिसर्च के अनुमान के अनुसार, 7.5 करोड़ से ज्यादा भारतीय फिर से गरीबी में चले गए हैं, जिसमें भारत के 10 करोड़ मजबूत मध्यम वर्ग का एक तिहाई हिस्सा भी शामिल है.

नौकरी की कमी

प्यू रिसर्च के अनुमान के अनुसार मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था को हर साल दो करोड़ नौकरियों की जरूरत के मुकाबले काफी कम रोजगार सृजित किए हैं. भारत में पिछले एक दशक से एक साल में केवल 4.3 मिलियन नौकरियां मिल रही हैं.

रिपोर्ट में ये संकेत भी मिलते हैं कि महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित किया है. सरकार की कोशिशोंं के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था में लड़खड़ाहत आई. रोजगार में कमी आई.

भारत का आर्थिक भविष्य भारत के आत्मनिर्भर कार्यक्रम और स्टार्ट-अप की पहल कितनी सफल होगी. इस पर भी निर्भर करता है. आत्मनिर्भर का वास्तविक उद्देश्य नागरिक-निवेशकों को सरकार पर कम निर्भर बनाना है. इसी तरह स्टार्ट अप और नए क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान देने और ध्यान देने की जरूरत है. अब तक प्रधान मंत्री की कोशिशों के बावजूद  ये क्षेत्र कम महत्वपूर्ण बने हुए हैं. 

जलवायु परिवर्तन की चुनौती के लिए सरकार कितनी तैयार

जलवायु परिवर्तन एक अन्य क्षेत्र है जिसमें भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है. प्रधानमंत्री मोदी ने 2016 के पेरिस जलवायु शिखर सम्मेलन के बाद से बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे का समर्थन किया है. 2023 -24 के बजट में भी ग्रीन बोनस का जिक्र नहीं किया गया था.

बीजेपी ने अपने पिछले घोषणापत्र में गांवों के लिए विद्युतीकरण, जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण जल संरक्षण और भूजल की कमी को 2024 तक पूरा करने का वादा किया था. साथ ही राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना के तहत 102 प्रदूषित शहरों पर ध्यान केंद्रित करने का भी वादा किया था.

लेकिन जमीनी स्तर पर कम काम हुआ. सवाल ये है कि देश में हर साल पानी की कमी से करीब 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है. 60 करोड़ भारतीय गंभीर पानी की कमी का सामना कर रहे हैं. ये सब जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहा है. आखिर इस सब का जिम्मेदार कौन है? विपक्ष भी अपने घोषणा पत्र में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा रखता रहा है.

पिछली सरकार के राजकोषीय घाटे से मोदी सरकार की बढ़ी चुनौती

पिछली सरकार ने अपने शासन के अंत में बड़े राजकोषीय घाटे को दबाने के लिए सरकारी खर्च और कर रिफंड में देरी की. इसने न केवल अर्थव्यवस्था को धीमा कर दिया , बल्कि इससे भी बदतर ये हुआ कि नई सरकार के सामने आने वाली चुनौतियां बढ़ गई.

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की रणनीति
स्ट्रैटेगी फाइनेंशियल टेक्नोलॉजीज इंडिया लिमिटेड  के निदेशक  माधो पावस्कर ने एक आर्टिकल में ये लिखा है कि अपने सामने मौजूद चुनौतियों का सामना करने के लिए मोदी सरकार को एक तीन-आयामी रणनीति शुरू करनी चाहिए - एक अल्पकालिक, एक मध्यम अवधि और एक दीर्घकालिक. अल्पकालिक रणनीति में मुद्रास्फीति को तुरंत नियंत्रित करने का लक्ष्य रखने की  जरूरत है. 

मुद्रास्फीति को रोकने में मदद के लिए घरेलू और विदेशी निवेश में वृद्धि  करना भी जरूरी है.  इससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि को भी बढ़ावा मिलेगा. 

खाद्य मुद्रास्फीति भारत में विभिन्न मुद्रास्फीति सूचकांकों के बीच सबसे आगे है. कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण सुधार के बिना, खाद्य की घरेलू आपूर्ति में वृद्धि करना आसान नहीं है. इसके लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमि बाजारों को विकसित करके नए तरह के भूमि सुधारों को अपनाने की जरूरत है. 

किसानों के लिए क्या किया गया 

खेती भारत की कामकाजी उम्र की आधी से अधिक आबादी को रोजगार देती है, लेकिन जीडीपी में बहुत कम योगदान देती है. भारत के कृषि क्षेत्र में सुधार की जरूरत है.  पीएम मोदी ने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था.

अर्थशास्त्री प्रोफेसर आर रामकुमार ने अपने एक लेख में लिखा कि पीएम मोदी ने किसानों के लिए टुकड़ों में सुधार किए हैं जिसका हासिल बहुत कम है. सरकार को खेती को अधिक किफायती और लाभदायक बनाने के लिए खर्च करने की जरूत है. 

वहीं माधो पावस्कर ने लिखा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को केवल गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) और कुपोषित बच्चों तक सीमित करने के जरूरत है. पीएम मोदी 2.0 इसपर पूरी तरह से काम नहीं कर पाई है. 

ज्यादा लोग औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल हुए 
इसे पीएम मोदी की बड़ी उपलब्धि कहा जाता है. डिजिटल भुगतान प्रणाली की बदौलत भारत डिजिटल भुगतान में वैश्विक नेता बनने की दिशा में आगे बढ़ा है. मोदी की जन धन योजना ने बैंक सुविधा से वंचित लाखों गरीब परिवारों को 'बिना तामझाम' वाले बैंक खातों के साथ औपचारिक अर्थव्यवस्था में प्रवेश करने में सक्षम बनाया है.

खातों और जमा में वृद्धि हुई है जो एक अच्छा संकेत माना जाता है. हालांकि रिपोर्टों से पता चलता है कि इनमें से कई खाते इस्तेमाल में नहीं है. 

जानकारों का मानना है कि इन चुनौतियों के बावजूद प्रधान मंत्री मोदी मुख्य रूप से जनता के साथ अपने सीधे जुड़ाव के कारण लोकप्रिय बने हुए हैं. राजनीतिक क्षेत्र में मोदी से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी लोकप्रियता का उपयोग करके हर चुनाव में जीत हासिल करेंगे.

मोदी 2.0 के दो वर्षों में हुए नौ विधानसभा चुनावों में से बीजेपी केवल तीन राज्यों - अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा और बिहार में जीत हासिल कर सकी. अप्रैल 2021 में पांच विधानसभाओं के लिए हुए चुनावों में पार्टी असम में सरकार बनाए रखने में सक्षम रही,जबकि पश्चिम बंगाल जीत नहीं मिली.तमिलनाडु और केरल में भी पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. 

हाल ही में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी को हार मिली. देश जिन महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है. उनसे पार पाने के लिए मोदी 2.0 को घरेलू स्तर पर सक्रिय भागीदारी पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. 

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