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कोरोना वायरस: लॉकडाउन ने दिखाया अपना असर, अब जिंदगी पटरी पर लाने की हो तैयारी

अब कोरोना से जंग जीतने के लिए देश की अधिकतम आबादी का जल्द टीकाकरण ही एकमात्र उपाय है और इस संबंध में हमें इजरायल, अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों से सबक लेना चाहिये.

नयी दिल्लीः कोरोना की दूसरी लहर पर काबू पाने के लिए विभिन्न राज्यों द्वारा लगाए गए आंशिक लॉकडाउन ने अपना असर दिखाया है और नए मामलों में अब तेजी से कमी आती दिखने लगी है. दक्षिण भारत के कुछ राज्यों और पश्चिम बंगाल को छोड़ दें, तो कमोबेश सभी राज्यों में संक्रमण की रफ़्तार कमजोर हुई है. ऐसे में सवाल उठता है कि लॉकडाउन को भले ही एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया लेकिन कोई भी राज्य सरकार आखिर इसे अनंतकाल तक तो नहीं लगा सकती? उसे आम जनजीवन व अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए इसे एक दिन तो खोलना ही पड़ेगा.

लिहाज़ा अब केंद्र सरकार का सारा फोकस ज्यादा से ज्यादा टीकाकरण पर होना चाहिए और इसके लिए जरुरी है कि वो राज्य सरकारों को पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन उपलब्ध कराए. इस बारे में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इस सुझाव पर केंद्र को गौर करना चाहिए कि वैक्सीन बनाने की अनुमति और भी कंपनियों को दी जाए और उन्हें रिक्वेस्ट करने की बजाय आदेश दिया जाये कि तय अवधि के भीतर वैक्सीन की सप्लाई सुनिश्चित हो.

वैसे दिल्ली और उत्तर प्रदेश में 24 मई की सुबह लॉकडाउन की अवधि ख़त्म हो रही है और दोनों ही स्थानों पर संक्रमण की दर दो से साढ़े तीन फीसदी तक आ पहुंची है. लेकिन दोनों ही सरकारों ने अभी यह तय नहीं किया है कि इसे और आगे बढ़ाया जाएगा या नहीं.

हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइंस के मुताबिक़ सही तरीके से टेस्ट किए जाने के बाद अगर संक्रमण दर दो हफ्तों तक 5 प्रतिशत से कम रहे, तो माना जाता है कि महामारी कंट्रोल में है. इस सूरत में लॉकडाउन लगाने जैसे सख्त उपाय का कोई मतलब नहीं रह जाता है.

दिल्ली में जबसे लॉकडाउन लगा है, धीरे-धीरे कोरोना केस कम हुए हैं. दिल्ली में एक दिन में कोरोना के मामले 28 हजार तक पहुंच गए थे, जो घटते-घटते शनिवार को 2260 तक आ गए. ऐसे में कुछ पाबंदियों के साथ अब लॉकडाउन खोलना और रोजमर्रा के जीवन को पटरी पर लाने का फ़ैसला गलत नहीं होगा.

वैसे विशेषज्ञों का मानना है कि देश में दूसरी लहर अपने पीक पर पहुंच चुकी है. हालांकि मरने वालों की संख्या अभी भी बढ़ रही है. देश में अभी तक एक दिन में सबसे अधिक मौतें 18 मई को रिकॉर्ड की गईं. ये संख्या 4,500 थी.

मरने वालों की संख्या का पीक आमतौर पर संक्रमण के पीक के एक हफ़्ते बाद आता है क्योंकि मौत पॉज़िटिव पाए जाने के एक हफ़्ते से लेकर 15 दिन के बाद होती है. पर, कम होती संक्रमण दर अच्छा संकेत हैं.

पॉज़िटिविटी रेट अब तेजी से कम हो रहा है, यानी जितने लोगों का टेस्ट किया जा रहा है उनमें पॉज़िटिव आने वालों की संख्या कम हो रही है. आठ मई को ख़त्म होने वाले हफ़्ते में ये दर 22.7 प्रतिशत थी जबकि 18 मई को ये दर कम होकर 16.9 प्रतिशत हो गई. ये आंकड़ें संकेत देते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर पीक पर पहुंच गई है.

देश के 20 में से 15 सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों में अनुमान है कि यहां कोरोना संक्रमण के मामले पीक पर पहुंच चुके हैं.इन 20 राज्यों में देश की 97 फ़ीसद आबादी रहती है. 95 फ़ीसद कोरोना संक्रमण के मामले भी इन्हीं राज्यों में दर्ज किए गए हैं.

आंध्र प्रदेश, असम, ओडिशा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल वो पांच राज्य हैं जहां संक्रमण के मामले अभी भी बढ़ रहे हैं. इस राज्यों में देश की कुल 23 फ़ीसद आबादी रहती है. 6 में से 5 सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों में, जहां 50 प्रतिशत आबादी रहती है, अनुमान है कि संक्रमण पीक पर पहुंच चुका है.

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