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जम्मू-कश्मीर: गांवों के विकास के लिए जाने वाला पैसा सीधा पंचों और सरपंचों के खाते में भेजेगी सरकार

अब केंद्र की योजना के मुताबिक़ गांवों के विकास के लिए दिए जाने वाला पैसा सीधे प्रदेश के सरपंचों और पंचों के खाते में केन्द्र सरकार द्वारा पहुंचाए जाएंगे. माना जा रहा है कि इस योजना से न सिर्फ जम्मू-कश्मीर के गांवों का विकास होगा बल्कि इसका फ़ायदा आने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिल सकता है.

नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर में तमाम विवादों के बीच एक अच्छी ख़बर यह है कि केंद्र सरकार ने फ़ैसला किया है कि अब वो गांवों के विकास के लिए जाने वाला पैसा सीधा पंचों और सरपंचों के खाते में भेजेगी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ दिन पहले लोकसभा और राज्यसभा में ये बयान दिया था कि जम्मू-कश्मीर प्रदेश में 40,000 गांवों के सरपंचों और पंचों को सीधे पैसे दिए जाएंगे. ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि उन पैसों से वे गांव के लोगों की जरूरत के हिसाब से विकास कार्य कर सकें और राज्य में विकास कार्यों में व्याप्त भ्रष्टाचार को जड़ से ख़त्म किया जा सके. गृह मंत्री अमित शाह ने अपने कश्मीर दौरे में कुछ पंचों और सरपंचों से मुलाक़ात भी की थी.

अब केंद्र की योजना के मुताबिक़ गांवों के विकास के लिए दिए जाने वाला पैसा सीधे प्रदेश के सरपंचों और पंचों के खाते में केन्द्र सरकार द्वारा पहुंचाए जाएंगे. प्रदेश में 35,500 पंच और 4,500 सरपंच हैं, जो पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में निर्वाचित हुए हैं. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कश्मीर में 1051 ऐसी पंचायतें हैं, जहां से आतंकवाद के डर से कोई उम्मीदवार ही खड़ा नहीं हुआ. ऐसे में इन गांवों का विकास पूरी तरह अफसरों के हाथ में है. माना जा रहा है कि इस योजना से न सिर्फ जम्मू-कश्मीर के गांवों का विकास होगा बल्कि इसका फ़ायदा आने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिल सकता है.

केंद्र की योजना में क्या है ख़ास जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने शुरुआत में 3700 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं. इस पैसे को प्रदेश के प्रत्येक गांव तक पहुंचाया जाएगा. कुल आवंटित 3700 करोड़ में से पहले चरण में 700 करोड़ रुपए सरपंचों तक पहुंचाए जा चुके हैं, जबकि दूसरे चरण में 1500 करोड़ रुपए और बाक़ी के 1500 करोड़ रुपए तीसरे और अंतिम चरण में जारी किए जाएंगे. केंद्र सरकार की सोच है कि ग्रामीण जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के ज़रिए ही गांवों का विकास किया जा सके.

हालांकि प्रदेश में चल रही योजनाओं के अंतर्गत आवंटित 80,000 करोड़ रुपए की जो अलग-अलग योजनाएं जम्मू-कश्मीर में चल रही हैं, वो पहले की तरह चलते रहेंगे. आपको बता दें कि जम्मू-कश्मीर में कुल 22 ज़िले हैं और प्रदेश की कुल आबादी करीब डेढ़ करोड़ है. कुल आबादी में से क़रीब 80 लाख लोग राज्य के 6,900 गांवों में रहते हैं. वहीं प्रदेश में कुल 4,483 पंचायत हैं. इस योजना के ज़रिए केंद्र सरकार सीधे पंचों और सरपंचों तक पैसे पहुंचाकर गांवों के विकास का प्रयास कर रही है. सरकार का मानना है कि पैसा पंचों और सरपंचों तक पहुंचेगा तो वह बेहतर तरीके से अपने गांव का विकास कर सकेंगे. केंद्र सरकार का दावा है कि आजादी के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर के गांव में पंच और सरपंच के जरिए विकास का खाका तैयार किया गया है और उनको पैसे पहुंचाए जा रहे हैं.

कश्मीर के गांवों में क्या है विकास का हाल केंद्र की इस योजना को लेकर कश्मीर की ग्रामीण जनता और पंच सरपंच क्या सोचते हैं, इसकी पड़ताल के लिए एबीपी न्यूज़ की टीम गांदरबल पहुंचीं. गांदरबल के अरहमां गांव में जब लोगों से विकास को लेकर सवाल किया गया तो यहां का नज़ारा ही बदल गया. गांव की महिलाएं अपने घरों से पानी लेकर दिखाने चली आयीं. सबकी पहली शिकायत है कि यहां पीने के पानी की सबसे बड़ी समस्या है. घरों में पानी की सप्लाई तो है लेकिन जो पानी ऊपर पहाड़ से घरों तक पहुंचाया जा रहा है, उसको फिल्टर करने की कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसे में ऊपर से आने वाले पानी में कचरा और कीड़े आते हैं, जो नल के सहारे लोगों के घरों तक पहुंच रहा है. गांव में पीने के गंदे पानी की वजह से न सिर्फ लोग परेशान हैं बल्कि बीमार भी पड़ रहे हैं.

लोगों का आरोप है कि नेताओं से शिकायत करने पर वो जल्दी ही दिक्कत दूर करने का वादा करते हैं लेकिन वोट लेने के बाद कोई इन दिक्कतों पर कोई कार्रवाई नहीं करता. पड़ताल आगे बढ़ी तो पता चला कि गांदरबल के अरहमां गांव में सिर्फ पानी की ही दिक्कत नहीं है बल्कि गांव में अस्थाई पुल को स्थायी किये जाने का मुद्दा बीते 12 सालों से लोगों के लिए एक ज़रूरत बना हुआ है. असल में अरहमां गांव दो हिस्सों में बंटा हुआ है. गांव के बीच में दूध नाला बहता है. आधा गांव पहाड़ के नीचे के हिस्से में है, बीच में दूध नाला है और बाकी गांव का हिस्सा पहाड़ के ऊपर है. ऐसे में ऊपर वाले हिस्से के ग्रामीणों को नीचे आने के लिए दूध नाला पार करना होता है. इस नाले के ऊपर से 2007 तक एक पुल बना हुआ था, जो बारिश के बहाव में बह गया. नतीजा यह हुआ कि 2007 के बाद ग्रामीणों ने नेताओं से लेकर अधिकारियों तक से स्थायी पुल बनाने की मांग की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.

निराश गांववालों ने अपने पैसे से एक अस्थायी पुल तो बना लिया लेकिन वो भी बारिश में अक्सर बह जाता है. केंद्र की योजना और विकास कार्यों की पड़ताल के लिए एबीपी न्यूज़ की टीम आगे बढ़ते हुए बदरकुण्ड गांव पहुंची. इस गांव में भी लोगों में पिछली सरकारों को लेकर काफ़ी रोष दिखाई दिया. लोगों को पीने के पानी की दिक्कत यहां भी है. घरों तक आने वाला पानी काफ़ी गंदा है. गंदे पानी की शिकायत कई कई बार करने के बाद भी आजतक कुछ न हो सका. घरों से निकलीं महिलाओं ने यहां भी गंदा पानी दिखाया. कश्मीरी में अपनी बात बताते हुए महिलाओं ने कहा कि पानी की दिक्कत के अलावा इस गांव में सड़क टूटी है. साथ ही अस्पताल की दिक्कत भी यहां की एक प्रमुख समस्या है. लोगों ने आरोप लगाया कि गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो बनाया गया है लेकिन उसमें डॉक्टर ही नहीं है. लोगों ने कहा कि अस्पताल में समस्या होने की वजह से उन्हें गांदरबल जाना पड़ता है. लोगों का आरोप है कि सड़क ख़राब होने की वजह से कई महिलाओं की डिलीवरी रास्ते में ही हो गई. साथ ही अस्पताल की दूरी की वजह से ग्रामीणों को बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

केंद्र की योजना पर क्या सोचते हैं कश्मीरी पंच और सरपंच जम्मू-कश्मीर पंचायती राज मूवमेंट के प्रदेश अध्यक्ष गुलाम हसन पुंज़ू ने कहा कि ज़मीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की वजह से अबतक विकास नहीं हो पाया है, लेकिन अब उम्मीद है इस योजना से विकास होगा. पुंज़ू ने कहा कि इसमें सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ग्रामीण स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन कराने का ज़िम्मा उठाने वाले पंचायत समिति के सदस्यों को मेहनताने के तौर पर सिर्फ एक हज़ार रुपये महीने के दिये जाते हैं. ऐसे में वो सरकार से मांग करते हैं कि अगर पंचायत स्तर के प्रतिनिधियों को मेहनताना बेहतर दिया जाएगा तो वो ज़मीनी स्तर पर भ्रष्टाचार नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि सरकार सरपंचों को कम से कम 10 हज़ार रुपये महीना और पंचायत सदस्यों यानी पंचों को 5 हज़ार रुपये महीना देने का काम करे तो वो सरकारी पैसे की चोरी नहीं करेंगे और योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुँचेगा.

बीजेपी को फ़ायदे के सवाल पर कहा कि अगर धार्मिक आधार पर बीजेपी आगे बढ़ेगी तब उसे कोई फ़ायदा कश्मीर में नहीं होने वाला लेकिन अगर एक राजनैतिक पार्टी के तौर पर वो लोकतांत्रिक तरीक़े से विकास को आगे बढ़ाए तो आने वाले वक़्त में उसे फ़ायदा हो सकता है. केंद्र सरकार की योजना के मुताबिक़ अब विकास कार्यों के लिए पैसे सीधे पंचों और सरपंचों को दिए जाने को लेकर जब टीम ने अरहमां गांव सरपंच अब्दुल रशीद से बात की तो उन्होंने केंद्र के इस फ़ैसले का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि कई ऐसे काम जो वो गांव में कराना चाहते थे, उसमें दिक्कतें आ रही थीं, अब उन्हें उम्मीद है कि ग्रामीणों की सलाह और ज़रूरत के मुताबिक़ योजना बनाकर विकास के कार्यों को आगे बढ़ा पाएंगे.

गांव के पंच मुश्ताक़ अहमद भी केंद्र के इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए उम्मीद जताते हैं कि इस योजना से गांवों का विकास ज़्यादा अच्छे से हो सकेगा. अब्दुल रशीद और मुश्ताक़ दोनों का मानना है कि अगर केंद्र की योजना सही तरीक़े से काम करने लगी तो घाटी में बीजेपी को इससे फ़ायदा हो सकता है. गांदरबल के बदरकुण्ड गांव के सरपंच ज़हूर अहमद ने बताया कि उन्हें केंद्र की योजना में पहली किश्त मिल गई है. पहली किश्त में 11 लाख 25 हज़ार रुपये आये हैं. सरपंच का कहना है कि वो ग्रामीणों से सुझाव के आधार पर गांव के विकास का काम करेंगे. इनका मानना है कि अगर केंद्र की सीधे पंचों और सरपंचों को पैसे देने की योजना ने सही से काम किया तो ज़ाहिर तौर पर बीजेपी को आने वाले विधानसभा चुनाव में मिल सकता है.

अधिकारियों को भी केंद्र की योजना के सकारात्मक प्रभाव की उम्मीद गांदरबल की समाज कल्याण अधिकारी बुरीदा मज़ीद ने कहा कि पंच और सरपंचों को ज़मीन की ज़रूरतों का पता होता है. साथ ही गांवों में कौन ज़रूरतमंद है, इससे भी पंच और सरपंच अच्छे से वाकिफ़ हैं, ऐसे में ये बेहतर होगा कि उनकी सलाह के मुताबिक़ योजना पर काम करेंगे और गांवों का विकास कर पाएंगे. उन्होंने कहा कि सड़क पानी स्कूल जैसी समस्याओं के साथ सरकार की योजना का लाभ इस योजना के मुताबिक़ आसानी से हो सकता है. भ्रष्टाचार को लेकर भी बुरीदा मज़ीद का मानना है कि ये समस्या ज़मीनी स्तर पर दूर होगी, ऐसी उम्मीद है. उन्होंने कहा कि अक्सर यह शिकायत आती थी कि ज़रूरतमंद को फ़ायदा न मिलकर जुगाड़ वाले लोगों को फ़ायदा मिल जाता था. ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि अब ये दिक्कत भी दूर हो जाएगी.

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