एक्सप्लोरर

कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने कैसे बदल दिया जातीय समीकरण का खेल?

आरक्षण में बदलाव से बीजेपी को भले ही तत्काल चुनावी फायदा न मिले, लेकिन बीजेपी को ये अच्छे से पता है कि राज्य में एक अलग शुरुआत कर चुकी है.

कर्नाटक विधानसभा के लिए 10 मई को मतदान होगा. चुनावों के नजदीक आता देख बीजेपी ने कर्नाटक में सांप्रदायिक मुद्दों और हिंदुत्व के एजेंडे को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, और सबसे पुराने एजेंडा "जातिगत पहचान" पर अपना पूरा ध्यान दे रही है. कुछ हफ्ते पहले ही कर्नाटक में आरक्षण के आंकड़ों में बदलाव किया गया था. कर्नाटक एक ऐसा राज्य है जहां लगभग 95 प्रतिशत जातियां किसी न किसी रूप में आरक्षण का फायदा उठाती आयी हैं. 

2021 में भारतीय जनता पार्टी ने बसवराज बोम्मई को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाया था. तब पार्टी जाति से परे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण मामले को भुनाने में लगी थी. बसवराज बोम्मई ने संघ परिवार के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल करते हुए हिजाब, हलाल और हनुमान मुद्दे को खूब उछाला था.

अब पार्टी ने पूरी तरह से अपना रुख आरक्षण की राजनीति पर कर लिया है. बदलाव की इस कवायद में सबसे जरूरी पहल पिछड़े वर्ग के कोटे के तहत मुसलमानों के लिए 4% आरक्षण को स्थानांतरित करना था. 1995 में जनता दल (सेक्युलर) के नेता एचडी देवगौड़ा ने भी इसी कवायद पर काम किया था. उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण दिया था .

बीजेपी के ताजा फैसले में मुसलमानों को दिए जाने वाला 4 प्रतिशत आरक्षण खत्म कर दिया गया है. कर्नाटक कैबिनेट के फैसले के बाद ओबीसी रिजर्वेशन का वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों का कोटा बढ़ गया है. वोक्कालिगा को चार प्रतिशत तो लिंगायत को पांच प्रतिशत ओबीसी आरक्षण कोटा में निर्धारित था. अब दो-दो प्रतिशत बढ़ने के बाद वोक्कालिगा समुदाय का कोटा छह प्रतिशत तो लिंगायत समुदाय को सात प्रतिशत हो जाएगा. मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने बताया कि कैबिनेट के फैसले के बाद वोक्कालिगा को क्रमशः 2 (सी) और 2 (डी) श्रेणी के तहत 6 प्रतिशत और लिंगायत को 7 प्रतिशत मिलेगा. 

जानकारों के मुताबिक चुनाव से पहले उठाया गया ये 2 प्रतिशत अतिरिक्त आवंटन का फैसला राज्य को दो बड़े समुदायों को सामाजिक न्याय दिलाने से कहीं ज्यादा इन समुदायों को राजनीतिक रूप से खरीदने जैसा है. 

पहले कैसा रहा है कर्नाटक में आरक्षण का दायरा

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी की अधिकतम आरक्षण सीमा तय कर रखी है, लेकिन कर्नाटक में फिलहाल करीब 56 फीसदी आरक्षण मिलता आया है. बोम्मई सरकार के एससी और एसटी समुदाय के आरक्षण के दायरे को बढ़ाने के बाद आरक्षण का  मुद्दा पहले से ही कर्नाटक उच्च न्यायालय में विचाराधीन था. 

पहले कर्नाटक में कर्नाटक में 50 फीसदी आरक्षण था. अनुसूचित जातियों के लिए 15 फीसदी, एसटी के लिए 3 फीसदी और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 32 फीसदी. ओबीसी के 32 फीसदी आरक्षण को कई कैटेगरी में बंटा हुआ है- पिछड़ा वर्ग को वन श्रेणी में 4 फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग को ए-2 कैटेगरी में 15 फीसदी, मुसलमानों को बी-2 के तहत 4 फीसदी आरक्षण मिलता आया है. 

दूसरी पार्टियां भी इसका फायदा उठाने को तैयार हैं 

विपक्ष और दूसरी पार्टियों ने भी इस आरक्षण की उतनी बगावत नहीं की. कोई विरोध प्रदर्शन भी नहीं हुआ. पार्टियों ने नाममात्र का शोर मचाया. सीधे लफ्जों में कहें तो कहीं न कहीं इन सभी पार्टियों को दो शक्तिशाली समुदायों से डर है, इन्हें ये लगता है कि आरक्षण के खिलाफ बोलना राजनीतिक रूप से पार्टियों को अंधेरे में डाल देगा. ये पार्टियां भी इस आरक्षण से अपने-अपने काल्पनिक फायदे की कल्पना करने लगी हैं. 

बीजेपी का दांव- जातीय समीकरण निशाना

मुस्लिमों का आरक्षण छीनने और दो बड़े समुदायों को लुभाने के अलावा बीजेपी ने कुछ और काम भी किए. बीजेपी ने दलितों को आंतरिक आरक्षण की पेशकश की. बता दें कि ये मांग लंबे वक्त से चली आ रही थी, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने इसे नहीं उठाया था. कहीं न कहीं राजनीतिक दल इस बारे में बहुत आश्वस्त नहीं थे कि कैसे काम करेगा.  बीजेपी की इसी चाल का नतीजा है कि ज्यादा उत्पीड़ित दलित उप-जातियां 2008 के बाद से बीजेपी की तरफ बढ़ रही हैं.

इसके अलावा पंचमसालियों के लिंगायत उप-संप्रदाय के लिए एक विशिष्ट कोटा बनाया गया. ये समुदाय राज्य का सबसे बड़ा मतदाता समूह माना जाता रहा है, लेकिन समुदाय के भीतर ये उप -समुदाय को कम ही कम फल-फूल रहा था. ऐसे में पंचमसालियों के लिंगायत उप-संप्रदाय 2डी के तहत कोटा चाहते थे. बोम्मई सरकार ने नई श्रेणियां (2 सी और 2 डी) बनाईं क्योंकि 2 ए और 2 बी श्रेणियों के भीतर कुछ भी बदलना नामुमकिन था. 

सिद्धारमैया के टालमटोल का फायदा उठा ले गयी बीजेपी

हर किसी को उम्मीद थी कि 2013 और 2018 के बीच सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पिछड़े वर्ग के कोटा पर फिर से काम करेगी. लेकिन सिद्धारमैया कोई भी जोखिम उठाने से बचते रहे. उन्होंने पिछड़े वर्ग के कोटा पर एक टालमटोल करने वाले नेता का रुख ही अपनाया. हालांकि समय-समय पर सिद्धारमैया ने कुछ समितियों की स्थापना की, प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात की. हर बार ऐसा संदेश दिया कि काम किया जा रहा है लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ. सिद्धारमैया ने जातिगत जनगणना के आंकड़े भी जारी नहीं की. 
 
अपने कार्यकाल के अंत तक सिद्धारमैया ने अचानक लिंगायतों को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया. रमैया का ये फैसला एक जल्दबाजी भरा कदम साबित हुआ और चुनावी नतीजे नकारात्मक आए. रमैया हार गए और उन्हें स्थायी रूप से एक ऐसे नेता के रूप में पहचान मिली जिसने लिंगायत समुदाय को विभाजित करने और तर्कों को विभाजित करने का काम किया. 

सिद्धारमैया की यथास्थिति की राजनीति ने उनके पूर्व समाजवादी सहयोगी बोम्मई के लिए मंडल खेल खेलने के दरवाजे खोल दिए. सिद्धारमैया ने अपने कुरुबा समुदाय को अत्यधिक संरक्षण देकर बाकी पिछड़े समुदायों को भी अलग-थलग कर दिया था. 

बीजेपी का नहले पर दहला

अब बीजेपी ने कोटा में फेरबदल की राजनीति अपनाई है. सब कुछ बहुत नया है ऐसे में बोम्मई या बीजेपी को तुरंत चुनावी फायदा नहीं मिल सकता है, लेकिन इसे कर्नाटक में जाति आधारित मतदाता के बजाय ज्यादा सार्वभौमिक मतदाता बनाने के बीजेपी के सपने की शुरुआत जरूर हो गयी है. 

बीजेपी की कोशिश इस बार जीत के लिए नहीं बल्कि राज्य में राजनीतिक खेल को सुधारने की हो सकती है. जातिगत हितों को बेअसर और भविष्य में जीत हासिल करने के लिए बीजेपी कोटा को विभाजित करना चाहती है . 4 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत के पीछे भी शायद बीजेपी का मूल इरादा यही था. इसलिए उसने येदियुरप्पा को हटाया जो जाति के खेल के मास्टर माने जाते रहे हैं.

जानकारों की मानें तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बोम्मई 1994 में कांग्रेस के वीरप्पा मोइली की स्थिति में हैं. मोइली ने कोटा प्रणाली में बदलाव करने की कोशिश की थी, लेकिन हर तरफ से उन्हें अविश्वास मिला. कांग्रेस ने उनके नेतृत्व में अब तक का सबसे खराब चुनावी प्रदर्शन किया. 

बोम्मई का हश्र भी यही हो सकता है. उन्हें कोटा के साथ खिलवाड़ करने के लिए दंडित किया जा सकता है. मोदी पहले से मतदाताओं को जाति से परे देखने और खुद को एक 'बड़ा' राष्ट्रीय हित रखने वाला नेता बता रहे हैं. उन्होंने 2018 के विधानसभा चुनावों के दौरान भी इसी तरह की अपील की थी.  

इस साल के चुनाव में बीजेपी पार्टी के जीतने या हारने से कर्नाटक की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत होगा. बीजेपी जानती है कि वह अच्छे विकेट पर नहीं है. इसलिए यह खेल को बदलने और तटस्थ पिच बनाने के लिए सब कुछ करने को तैयार है. 

कर्नाटक में जातिगत राजनीति के इतिहास पर एक नजर

कर्नाटक में जातिगत राजनीति और कोटा का इतिहास  1973 से शुरू होता है. उस समय के मैसूर में कोटा को लेकर पांच प्रमुख चरण आए. पहला में मैसूर के महाराजा ने जस्टिस लेस्ली मिलर को राज्य में जाति असंतुलन पर काम करने के लिए नियुक्त किया था. 1919 में ज्यादातर मैसूर प्रशासन में ब्राह्मणों के हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व का आकलन करने के लिए सर एम विश्वेश्वरैया जैसे लोगों की सहमति लेनी चाही लेकिन सहमति मिल नहीं सकी. 

दूसरा चरण राज्य के भाषाई एकीकरण से पहले 1947 और 1956 के बीच था, उस दौरान वोक्कालिगा प्रशासन संभाल रहे थे. राज्य का पुनर्गठन होते ही लिंगायतों ने सत्ता संभाली. केंगल हनुमंथैया और कदीदल मंजप्पा की जगह एस निजलिंगप्पा, बीडी जट्टी और वीरेंद्र पाटिल को अलग-अलग पदों पर नियुक्त किया जाने लगा. लिंगायत वर्चस्व तब तक बना रहा जब तक डी देवराज उर्स ने हवानूर आयोग की स्थापना करके पिछड़े वर्गों को फिर से तैयार नहीं किया.

1980 के दशक में राज्य में दो ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों ने राज्य का नेतृत्व किया ये राज्य में आरक्षण का चौथा चरण माना जाता है. इसके बाद सत्ता की कमान पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के दो अन्य मुख्यमंत्रियों एस बंगारप्पा और मोइली के पास आ गई. 1994 में पांचवा चरण आया और चार दशकों के बाद वोक्कालिगा ने देवगौड़ा के नेतृत्व में नियंत्रण वापस ले लिया.

इसके बाद नेतृत्व वोक्कालिगा और लिंगायत के बीच बारी-बारी से काम करता आया है. अब एक लंबे समय के बाद इस नेतृत्व को बीजेपी खत्म करने की कोशिश कर रही है.

इससे पहले सिद्धारमैया वोक्कालिगा और लिंगायत के बीच जरूर आए. लेकिन उन्होंने जिन समुदायों का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया, उनके लिए कुछ खास काम नहीं किया.

इस बीच राज्य में दलितों की मौजूदगी होने के बावजूद उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नजर नहीं आया है. केएच रंगनाथ, बी रचैया और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेताओं में क्षमता होने के बावजूद दलितों का वर्चस्व कोई खास उबर नहीं पाया.  

और पढ़ें
Sponsored Links by Taboola

टॉप हेडलाइंस

PM मोदी की मिडिल ईस्ट में शांति की पहल, दुनिया के इन नेताओं को लगाया फोन
PM मोदी की मिडिल ईस्ट में शांति की पहल, दुनिया के इन नेताओं को लगाया फोन
Israel-Iran War: ‘होर्मुज जलडमरूमध्य से नहीं लौटेंगे 22 भारतीय जहाज’, सोशल मीडिया के दावे को MEA ने किया खारिज
‘होर्मुज जलडमरूमध्य से नहीं लौटेंगे 22 भारतीय जहाज’, सोशल मीडिया के दावे को MEA ने किया खारिज
पालतू बिल्ली की मौत से सदमे में 20 साल की छात्रा, इस राज्य में सामने आया हैरान कर देने वाला मामला
पालतू बिल्ली की मौत से सदमे में 20 साल की छात्रा, इस राज्य में सामने आया हैरान कर देने वाला मामला
बैंक फ्रॉड मामले में अनिल अंबानी से CBI ने की 8 घंटे पूछताछ, अगले दिन फिर बुलाया
बैंक फ्रॉड मामले में अनिल अंबानी से CBI ने की 8 घंटे पूछताछ, अगले दिन फिर बुलाया

वीडियोज

महायुद्ध के 20 दिन...20 महा-सनसनी
दुनिया में आने वाला तेल संकट..कैसे निपटेगा भारत?
युद्ध के चलते शेयर बाजार में भारी गिरावट
Iran Israel War: ईरान ने किया तेल-गैस पर हमला, दुनिया में हाहाकार | World War3 | Trump | PM Modi
Iran Israel War: तेल की आग में जला मिडिल ईस्ट! | Donald Trump | Breaking | ABP News

फोटो गैलरी

Petrol Price Today
₹ 94.77 / litre
New Delhi
Diesel Price Today
₹ 87.67 / litre
New Delhi

Source: IOCL

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
ईरान के खिलाफ ब्रिटेन-फ्रांस-जर्मनी ने उठाया बड़ा कदम, कहा- अगर होर्मुज स्ट्रेट में इस तरह हस्तक्षेप...
ईरान के खिलाफ ब्रिटेन-फ्रांस-जर्मनी ने उठाया बड़ा कदम, कहा- अगर होर्मुज स्ट्रेट में इस तरह...
UP News: यूपी में फिर कैबिनेट विस्तार की चर्चा, सपा के इन बागी नेताओं की लग सकती है लॉटरी
यूपी में फिर कैबिनेट विस्तार की चर्चा, सपा के इन बागी नेताओं की लग सकती है लॉटरी
भारती सिंह ने व्लॉग में रिवील किया बेटे काजू का चेहरा, वीडियो वायरल, फैंस बोले- गोला जैसा दिखता है
भारती सिंह ने व्लॉग में रिवील किया बेटे काजू का चेहरा, वीडियो वायरल, फैंस बोले- गोला जैसा दिखता है
B-2 और B-52 बॉम्बर, अपाचे हेलिकॉप्टर... अमेरिका ने ईरान की कैसे की घेराबंदी, रक्षा सचिव हेगसेथ ने बताई एक-एक डिटेल
B-2 और B-52 बॉम्बर, अपाचे हेलिकॉप्टर... अमेरिका ने ईरान की कैसे की घेराबंदी, रक्षा सचिव हेगसेथ ने बताई एक-एक डिटेल
CSK से राजस्थान में आया खिलाड़ी IPL 2026 से हो सकता है बाहर! RR की टेंशन बढ़ी
CSK से राजस्थान में आया खिलाड़ी IPL 2026 से हो सकता है बाहर! RR की टेंशन बढ़ी
‘सभी तेल-गैस कंपनियों को अब अनिवार्य रूप से...’, मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत सरकार का बड़ा आदेश
‘सभी तेल-गैस कंपनियों को अब अनिवार्य रूप से...’, मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत सरकार का बड़ा आदेश
यूपी में स्पेशल एजुकेटर के पदों पर भर्ती शुरू, 26 मार्च तक करें आवेदन;जानें प्रक्रिया
यूपी में स्पेशल एजुकेटर के पदों पर भर्ती शुरू, 26 मार्च तक करें आवेदन;जानें प्रक्रिया
ऑफ सीजन में गोवा घूमने जा रहे हैं तो भूलकर भी न करना ये गलतियां, वरना जाना पड़ेगा जेल
ऑफ सीजन में गोवा घूमने जा रहे हैं तो भूलकर भी न करना ये गलतियां, वरना जाना पड़ेगा जेल
Embed widget