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जन्मदिन विशेष: जयललिता ऐसे बनीं दिल मोहने वाली हीरोईन से सख्त आयरन लेडी

नई दिल्ली: दक्षिण भारत में खासकर तमिलनाडु के लोगों के बीच भगवान की तरह पूजी जाने वाली जयललिता एक वक्त तमिल फिल्म इंडस्ट्री की सुपर स्टार थीं. उन्होंने बॉलीवुड में धर्मेंद्र के साथ भी एक फिल्म में काम किया था. आज जयललिता का 70वां जन्मदिन है.

जयललिता का जन्म एक तमिल परिवार में 24 फरवरी, 1948 में हुआ और वो कर्नाटक के मेलुरकोट गांव में पैदा हुई. मैसूर में संध्या और जयरामन दंपति के ब्राह्मण परिवार में जन्मीं जयललिता की शिक्षा चर्च पार्क कॉन्वेंट स्कूल में हुई. जन्मदिन विशेष: जयललिता ऐसे बनीं दिल मोहने वाली हीरोईन से सख्त आयरन लेडी जयललिता के पिता का तब निधन हो गया था जब वे केवल दो वर्ष की थीं. उनकी मां जयललिता को साथ लेकर बेंगलुरू चली गई थीं जहां उनके माता-पिता रहते थे. बाद में उनकी मां ने तमिल सिनेमा में काम करना शुरू कर दिया. जयललिता ने पहले बेंगलुरू और बाद में चेन्नई में अपनी शिक्षा प्राप्त की. कहा जाता है कि जब जयललिता स्कूल में पढ़ ही रही थीं तभी उनकी मां ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए राजी कर लिया था. उनकी पहली फिल्म एक अंग्रेजी फिल्म ‘एपिसल’ आई . 15 साल की उम्र में तो उन्होंने कन्नड़ फिल्मों में अभिनेत्री का काम करना शुरू कर दिया था. इसके बाद उन्होंने तमिल फिल्मों का रूख किया. दिलचस्प ये है कि जयललिता उस दौर की पहली ऐसी अभिनेत्री थीं जिन्होंने स्कर्ट पहन कर भूमिका की जिसे उस दौर में बड़ी बात माना गया. उस ज़माने के सबसे लोकप्रिय अभिनेता एम जी रामचंद्रन के साथ उनकी जोड़ी बहुत ही मशहूर हुई. 1965 से 1972 के दौर में उन्होंने अधिकतर फिल्में एमजी रामचंद्रन के साथ की. फिल्मी कामयाबी के दौर में उन्होंने 300 से ज़्यादा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और हिंदी फिल्मों में काम किया.

जयललिता अपने राजनीतिक गुरु एमजी रामचंद्रन के बाद सत्ता में लगातार दूसरी बार आने वाली वो तमिलनाडु में पहली राजनीतिज्ञ थीं. इसे महज इत्तेफाक नहीं कह सकते कि एमजीआर की हैट्रिक के बाद से कोई भी पार्टी अब तक तमिलनाडु में लगातार दूसरी पारी भी नहीं खेल पायी थी.

पिछले कई दशकों से इस द्रविड़ प्रदेश की राजनीति बारी-बारी से कभी जयललिता तो कभी करुणानिधि के इर्द-गिर्द घूमती रही. तमिलनाडु में सिर्फ एमजी रामचंद्रन ही थे जिन्होंने 1977 से 1988 तक लगातार तीन चुनाव जीतकर हैट्रिक लगाई थी.

एमजीआर की राजनीतिक वारिस जयललिता ने छठी खेली. जयललिता की जीत में उन 60 लाख युवा मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जा रही है जिन्होंने पहली बार मताधिकार का प्रयोग किया. युवा मतदाताओं ने 92 साल के करुणानिधि की बजाय 68 साल की अम्मा पर ज्यादा भरोसा किया.

तमिलों के बीच अम्मा के नाम से लोकप्रिय जयललिता ने अपने पांच साल के कार्यकाल में जनता को लुभाने वाले खूब काम किये. जयललिता ने ‘अम्मा कैंटीन’ शुरू की थी जहां बेहद कम दामों पर भोजन मुहैया कराया जाता है. इतना ही नहीं जयललिता ने अपने शासन के दौरान जनता के लिए अम्मा नाम से एक नया ब्रांड ही शुरू कर दिया. तमिलनाडु में अम्मा मिनरल वॉटर, अम्मा सब्जी की दुकान, अम्मा फार्मेसी यहां तक कि अम्मा सीमेंट भी सस्ती कीमत पर बाजार में मिलने लगे.

जयललिता की सफलता की एक बड़ी वजह ये भी रही कि पिछली बार की तरह उनके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं लगा. कर्नाटक हाईकोर्ट से भ्रष्टाचार के पुराने मामले में बरी होने के बाद से उनका और उनके समर्थकों का मनोबल लगातार बढ़ता चला गया.

तमिलनाडु की राजनीति में 68 साल की जयललिता के करिश्माई व्यक्तित्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब 2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की बाकी राज्यों में आंधी चल रही थी उस दौरान जयललिता की पार्टी को तमिलनाडु में 39 में 37 सीटों पर जीत मिली थी.

पहले फिल्मों में कामयाबी और फिर फिल्मों से राजनीति का सफर जयललिता ने बेहद कामयाबी से तय किया. लेकिन अपने राजनीति के सफर में जयललिता ने जो उतार-चढ़ाव देखे हैं वो उतने ही नाटकीय हैं कि वो फिल्मी कहानी का रूप ले सकते हैं.

एक खूबसूरत दिल मोहने वाली हीरोईन से सख्त आयरन लेडी तक का सफर जयललिता के लिए आसान नहीं रहा है. इन सालों में जयललिता ने देखी है उन्हें मारे जाने की साजिश, उन्हें कुर्सी से उखाड़ फेंकने के दांव-पेंच और भ्रष्टाचार के ऐसे आरोप जो किवदंती तक बन गए. लेकिन हर बार जयललिता इन सबसे निजात पाने में कामयाब रहीं.

अपने राजनैतिक गुरू एम जी रामचंद्रन के साथ उनका दूसरा दौर राजनीति में शुरू हुआ. एमजी रामचंद्रन जब राजनीति में चले गए तो करीब दस साल तक उनका जयललिता से कोई नाता नहीं रहा. लेकिन 1982 में एम जी रामचंद्रन उन्हें राजनीति में लेकर आए. हालांकि इस बात से जयललिता ने हमेशा इंकार किया. रामचंद्रन चाहते थे कि जयललिता राज्यसभा पहुंचे क्योंकि उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी. जयललिता 1984-1989 तक राज्यसभा सदस्य बनीं और साथ ही उन्हें पार्टी का प्रचार सचिव भी नियुक्त किया गया.

कहा जाता है कि करूणानिधि के लगातार आरोपों से परेशान होकर एम जी रामचंद्रन ने जयललिता को मदद के लिए बुलाया. जयललिता एक शानदार वक्ता साबित हुईं वो भाषण को रट लेती थीं और फिर डॉयलॉग की तरह सुना देती थीं. उनके भाषणों में भीड़ भी खूब जुटती थी. कहा जाता है कि प्रचार सचिव की जिम्मेदारी जयललिता बखूबी निभा रही थीं लेकिन पार्टी में बड़े ओहदों पर बैठे नेताओं को ये अच्छा नहीं लग रहा था. जिसके बाद धीरे-धीरे रामचंद्रन और जयललिता के बीच रिश्ते में दरार पैदा हुई.

लेकिन साल 1987 में जब रामचंद्रन का निधन हुआ तो अन्नाद्रमुक दो हिस्सों में बंट गई थी. एक धड़े की नेता एमजीआर की विधवा जानकी रामचंद्रन थीं और दूसरे की जयललिता. जयललिता रामचंद्रन की करीबी थीं उन्होंने खुद को रामचंद्रन की विरासत का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. लेकिन उनका शरूआत का दौर अच्छा नहीं रहा. जयललिता का खेमा ये कहता रहा है कि साल 1989 में डीएमके के एक मंत्री ने विधानसभा में उनके साथ बुरा बर्ताव किया था.

आरोप तो यहां तक है कि उनकी साड़ी तक खींची गई थी. जिसके बाद उन्होंने कसम था ली थी कि वो विधानसभा मुख्यमंत्री बन कर ही लौटेंगी. हालांकि डीएमके विधानसभा में हंगामे के लिए जयललिता और उनके विधाय़कों को ही दोषी बताता रहा है लेकिन इस हंगामे के बाद से जयललिता के विरोध की धुरी करूणानिधि हो गए थे. एमजीआर की मौत के बाद उनके राजनीतिक विरासत के लिए जयललिता और उनकी पत्नी जानकी के बीच टक्कर हुई. जिसमें जनता ने जयललिता को चुना. 1991 में वो पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री चुनी गईं.

जयललिता ना सिर्फ तमिलनाडु की पहली निर्वाचित महिला मुख्यमंत्री बनीं बल्कि सबसे कम उम्र में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी. जयललिता की एक खास बात और वो ये कि उन्होंने अपनी ग्लैमर की दुनिया के दरवाजे बिल्कुल बंद कर दिए. वो ना तो मेकअप लगाती हैं और ना ही पुराने दिनों की कोई बात याद करती हैं. वो सादी साड़ी पहनती हैं और यहां तक की फिल्मी दिनों के दोस्तों के बुलावे पर किसी कार्यक्रम में भी नहीं जाती.

1991 से 1996 के बीच जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं. इस दौरान उन पर भ्रष्टाचार के आरोप बार-बार लगे. नतीजा ये हुई कि करूणानिधि की डीएमके ने 1996 में जीत हासिल की. कहा जाता है कि करूणानिधि के सत्ता में आने के बाद जयललिता पर जो छापे पड़ी उसमें 750 जोड़े सैंडल, 800 किलो सिल्वर, 28 किलो सोना, साढ़े दस हजार साड़ी, 91 घड़ियां, 44 एसी और 19 कारें बरामद हुई थीं. इसी के बाद आय से अधिक संम्पत्ति का आरोप भी लगाया गया था.

भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ-साथ जयललिता के दत्तक पुत्र वी सुधाकरण की शाही तरीके से शादी की भी काफी आलोचना हुई थी. 7 सितंबर 1995 को सुधाकरण की शादी तमिल के अभिनेता शिवाजी के गणेशन की पोती से हुई थी. शादी पर करोड़ों रुपया खर्च हुआ. गिनीज बुक में शादी ने दो रिकॉर्ड बनाए. एक शादी में सबसे ज्यादा मेहमान शामिल हुए थे. और दूसरा शादी के लिए सबसे बड़ा पंडाल सजाया गया था. नवंबर 2011 में जयललिता ने स्पेशल कोर्ट को ये बताया था कि शादी में खर्च हुए पूरे 6 करोड़ रुपए दुल्हन के परिवार ने दिए थे.

जयललिता के मुताबिक सारे आरोप करूणानिधि की पार्टी ने ही लगाए थे और यही वजह है कि साल 2001 में जब वो दोबारा मुख्यमंत्री बनीं तो सबसे पहले उनका गुस्सा करूणानिधि और उनके परिवार पर भी फूटा. 30 जून 2001 में फ्लाईओवर घोटाले का आरोप लगाते हुए करुणानिधि को आधी रात को हिरासत में लिया गया था. उस वक्त की तस्वीरों ने देश को हिला दिया था. केंद्रीय मंत्री टीआर बालू और मुरासोली मारन को भी जबरदस्ती घर से उठा कर ले जाया गया था. उस वक्त इस कदम के लिए जयललिता की काफी आलोचना हुई थी.

जयललिता ने सख्ती से सरकार चलाई. 2001 में जब सरकारी कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी तो जयललिता ने एक साथ दो लाख कर्मचारियों को ही बर्रख़ास्त कर हलचल मचा दी थी.

दूसरी बार भी जयललिता का पीछा विवादों ने नहीं छोड़ा. उन्हें सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा और उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा. लेकिन यही वो दौर था जब जयललिता बीजेपी और एनडीए के करीब आईं. 1999 में उन्होंने अटल बिहारी वाजेपयी सरकार का समर्थन किया. लेकिन इस वक्त तक तमिलनाडु में जयललिता की छवि को खासा नुकसान पहुंचा था. अकेले लड़ना अपनी बात पर अड़े रहना और चुनाव गठबंधन ना करना. नतीजा 2004 से लगातार उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

2009 में जब लोकसभा चुनावों में भी हार हुई तब जयललिता की नींद खुली और उन्हें राज्य में गठबंधन के सहयोगियों की तलाश की ताकि उनके वोट ना कटें. नतीजा हुआ साल 2011 विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत.

लेकिन इसी दौरान जयललिता के सामने एक साजिश आई. जयललिता की तरफ से आरोप लगाया गया कि उनकी 25 साल से करीबी दोस्त शशिकला ना सिर्फ उन्हें बेदखल करने की साजिश रच रही थी बल्कि उन्हें मारना भी चाहती थी.

कहा जाता है कि 25 साल से शशिकला अपने रिश्तेदारों की फौज के साथ जयललिता के घर में ही रहती थीं. इस दौरान कोई काम शशिकला की मर्जी के बिना नहीं होता था. लेकिन 17 दिसम्बर 2011 को जयललिता ने शशिकला को और उसके रिश्तेदारों को अपने घर से निकाल दिया. 40 से ज्यादा वो नौकर भी हटा दिए गए जो शशिकला 1989 में अपने साथ अपने गांव मन्नारगुडी से लेकर आई थीं. कहा जाता है कि इन नौकरों के जरिए शशिकला एक-एक चीज पर नजर रखती थी. धीरे-धीरे शक बढ़ा तो जयललिता ने जांच शुरू करवाई जिसके बाद पूरी साजिश की कहानी सामने आती गई. शशिकला और उसके परिवार पर इसके बाद जमीन पर कब्जा करने के आरोप लगाए गए और शशिकला को एआईएडीएमके से निकाल दिया गया.

कहा ये भी जाता है कि अम्मा के नाम से मशहूर जयललिता को अपनी आलोचना पसंद नहीं आती. उनके कार्यकर्ता और समर्थक उन्हें भगवान की तरह पूजते हैं और जयललिता ऐसी श्रद्धा का बुरा नहीं मानतीं.

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