Bihar Election: वैश्विक सुर्खियों में आया बिहार! अंतरराष्ट्रीय मीडिया में क्यों हो रही इलेक्शन की चर्चा, जानें सब कुछ
बिहार चुनाव 2025 में नीतीश कुमार की जीत ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा है. दुनिया के तमाम बड़े मीडिया हाउस जैसे FT, NYT, Bloomberg, Washington Post और Diplomat ने लिखा है.

बिहार का यह चुनाव पहली बार सिर्फ भारत की राजनीति तक सीमित नहीं रहा. दुनिया के बड़े न्यूज़ नेटवर्क फ़ाइनेंशियल टाइम्स, न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, ब्लूमबर्ग और द डिप्लोमैट ने इसे अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक माहौल से जोड़कर देखा. इन मीडिया रिपोर्टों का सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर 74 साल के नीतीश कुमार ने सेहत, सुस्त अर्थव्यवस्था और ठहरी हुई विकास रफ्तार के बीच भी इतनी भारी जीत कैसे हासिल की.
विदेशी अखबारों ने इस चुनाव को सामाजिक ढांचे, महिलाओं की भागीदारी, नकद लाभ योजनाओं, जातीय बदलाव और मोदी–नीतीश संबंधों के जरिए समझने की कोशिश की. कई रिपोर्ट में यह तक कहा गया कि बिहार का चुनाव आने वाले समय में देशों की राजनीति को प्रभावित करने वाले संकेत दे सकता है.
फाइनेंशियल टाइम्स का विशेष विश्लेषण
ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स में रुचिर शर्मा ने लिखा कि चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार की हालत देखकर कई लोग चिंतित थे. उन्होंने कहा कि नीतीश अक्सर थके हुए दिखाई देते थे, मंच पर बोलते समय भूल जाते थे और उनकी निगाहें भी सुस्त लगती थीं. रुचिर शर्मा ने इसे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बाइडन की स्थिति से जोड़ा और बताया कि बावजूद इसके लोग नीतीश को हटाने के जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे. उनका कहना था कि बिहार की जनता विकास की धीमी गति से परेशान जरूर है, लेकिन उन्हें डर है कि सरकार बदलने से हालात और बिगड़ सकते हैं. कई विदेशी विशेषज्ञों ने भी यही माना कि बिहार की जनता ने स्थिरता को प्राथमिकता दी.
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट
न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में मतदाता सूची सुधार को प्रमुख मुद्दा बताया. अखबार के अनुसार लाखों नाम हटाए जाने के बावजूद यह विवाद चुनाव परिणाम पर गहरा असर नहीं डाल पाया. विपक्ष ने इसे राजनीतिक साजिश बताया था, लेकिन NYT लिखता है कि सामान्य मतदाताओं के निर्णय में यह मुद्दा पीछे रह गया. रिपोर्ट में कहा गया कि मोदी सरकार की तरफ से महिलाओं को दी गई नकद राशि ने मतदान के रुझान को काफी प्रभावित किया. न्यूयॉर्क टाइम्स का मानना है कि यह योजना चुनाव के वास्तविक रुख को तय करने वाली बनी.
ब्लूमबर्ग का दावा
ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बिहार चुनाव में महिलाओं को सीधे बैंक खाते में भेजी गई आर्थिक सहायता सबसे निर्णायक कारक थी. अखबार ने लिखा कि एक बड़ी संख्या में महिलाओं को दस हजार रुपये मिले, और इसका असर जातीय मतदान से कहीं अधिक शक्तिशाली दिखाई दिया. ब्लूमबर्ग के विश्लेषण में बताया गया कि बिहार की पारंपरिक राजनीति में जहां जाति मुख्य आधार मानी जाती थी, वहीं इस बार आर्थिक लाभ ने उस संरचना को पीछे धकेल दिया. रिपोर्ट ने इसे भारत की नई चुनावी अर्थव्यवस्था कहा.
वाशिंगटन पोस्ट की टिप्पणी
वाशिंगटन पोस्ट ने बिहार की जीत को प्रधानमंत्री मोदी के लिए महत्वपूर्ण सांस बताया. रिपोर्ट कहती है कि भाजपा के पास अकेले बहुमत नहीं है और केंद्र सरकार का काफी भार सहयोगी दलों पर टिका है. ऐसे में बिहार की जीत ने NDA की आंतरिक मजबूती को बढ़ाया. अखबार ने यह भी लिखा कि ग्रामीण महिलाओं के बीच नीतीश की भरोसेमंद छवि अभी भी बहुत मजबूत है और यही NDA के लिए सबसे बड़ी ताकत साबित हुई.
द डिप्लोमैट ने क्या कहा है?
द डिप्लोमैट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी राजनीतिक गिरावट बिहार में देखने को मिली. अखबार के अनुसार RJD, कांग्रेस और वाम दलों की सीटों में भारी गिरावट दिखी, जबकि नई राजनीतिक कोशिशें भी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाईं. द डिप्लोमैट लिखता है कि रोजगार जैसे मुद्दे चर्चा में थे, लेकिन भावनात्मक लहर और स्थिर नेतृत्व की छवि ने जनता का रुख NDA की ओर मोड़ दिया. रिपोर्ट यह भी कहती है कि विपक्ष को अब अपनी रणनीति, नेतृत्व और संगठन तीनों पर गंभीरता से विचार करना होगा.
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