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बीटिंग रिट्रीट समारोह: भारतीय सेनाओं के बैंड बिखेरेंगे संगीत का जादू, जानें 300 साल पुरानी परंपरा में क्या होने वाला है खास

बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी गणतंत्र दिवस समारोह का औपचारिक समापन करती है, जिसमें भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के बैंड शामिल होते हैं. आइए जानते हैं इसका इतिहास और समारोह की खास बातें.

Beating Retreat Ceremony: दिल्ली में आज बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी का समापन एक यादगार संगीत समारोह के साथ होगा, जिसमें भारतीय सेनाओं के बैंड ने देशभक्ति से भरी धुनों को पेश करेंगे. इस साल की धुनें 'आत्मनिर्भर भारत', 'स्वतंत्रता का प्रकाश फैलाओ', 'रिदम ऑफ द रीफ', और 'जय भारती' जैसी धुनों से शाम को सुनहरा बनाया जाएगा, जो देश की प्रगति और स्वाभिमान का प्रतीक बनेगी.

सेना बैंड ने उत्साही धुनों से माहौल को देशभक्ति से सराबोर करने की कोशिश करेंगे. उन्होंने 'वीर सपूत', 'ताकत वतन', 'मेरा युवा भारत', 'ध्रुव', और 'फौलाद का जिगर' जैसी प्रेरणादायक धुनों को पेश करेंगे, जो भारतीय सेना की ताकत और एनर्जी बनाएंगे.

समापन का मुख्य आकर्षण: 'सारे जहां से अच्छा
समारोह का समापन बगलर्स करेंगे, जो अपने सदाबहार धुन 'सारे जहां से अच्छा' के बजाएंगे. यह धुन हमेशा की तरह समारोह को एक गर्व भरा और देशभक्ति का एहसास देती है. इसके साथ ही 'प्रियम भारतम' और 'ऐ मेरे वतन के लोगों' जैसे गीत भी सामूहिक बैंड की ओर से पेश किए जाएंगे, प्रस्तुत किए गए, जो देशभक्ति की भावना को और ऊंचा ले जाने का काम करेगी.

बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी: गणतंत्र दिवस समारोह का समापन
बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी भारत में गणतंत्र दिवस समारोह का औपचारिक समापन करती है. हर साल 29 जनवरी को विजय चौक पर आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना के बैंड शानदार धुनें बजाकर समारोह को भव्य बनाते हैं. आइए जानें इस ऐतिहासिक परंपरा का महत्व और इसका इतिहास.

बीटिंग रिट्रीट का इतिहास
इस समारोह की शुरुआत का संबंध युद्ध के समय से है, जब युद्ध में शामिल राजा-महाराजाओं की सेनाएं सूर्यास्त के बाद युद्ध रोक देती थीं. यह घोषणा बिगुल बजाकर की जाती थी, जिसके साथ युद्ध समाप्ति के संकेत दिए जाते थे. दोनों पक्षों की सेनाएं युद्ध बंद कर अपने-अपने टेंट या महलों में लौट जाती थीं.

इस परंपरा की जड़ें 17वीं शताब्दी की इंग्लैंड में मानी जाती हैं, जब जेम्स II के शासनकाल में शाम के समय सैनिकों के लिए परेड और बैंड की धुन बजाई जाती थी. धीरे-धीरे यह परंपरा दुनियाभर के देशों, जैसे यूके, अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में भी फैल गई.

भारत में बीटिंग रिट्रीट की शुरुआत
भारत में बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी. देश को आजादी मिलने के बाद, पहली बार इंग्लैंड से एलिजाबेथ द्वितीय और प्रिंस फिलिप भारत आए थे. उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक भव्य स्वागत समारोह का आयोजन करने का आदेश दिया. इस समारोह की कल्पना सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट के मेजर जीए रॉबर्ट्स ने की थी.

बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी में क्या होता है?
वर्तमान समय में इस सेरेमनी में थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बैंड के साथ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल भी शामिल होते हैं. मुख्य अतिथि भारत के राष्ट्रपति होते हैं, जिनके सामने सभी बैंड मार्च करते हैं और धुन बजाते हैं. बैंड मास्टर राष्ट्रपति से बैंड वापस ले जाने की अनुमति मांगते हैं, और यह कार्यक्रम लोकप्रिय धुन "सारे जहां से अच्छा" के साथ समाप्त होता है. शाम को ठीक छह बजे, राष्ट्रीय ध्वज को उतारा जाता है और राष्ट्रगान के साथ गणतंत्र दिवस समारोह का समापन होता है.

महात्मा गांधी की प्रिय धुन का हटना
पहले इस सेरेमनी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रिय धुन "अबाइड विद मी" बजाई जाती थी, लेकिन अब इसे समारोह से हटा दिया गया है. इस बार भारतीय सेना का बैंड वीर सपूत, ताकत वतन, और मेरा युवा भारत जैसी धुनें बजाएगा, जबकि नौसेना और वायुसेना के बैंड भी कई नई धुनें प्रस्तुत करेंगे.

केवल दो बार रद्द हुआ बीटिंग रिट्रीट
भारत में बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी की शुरुआत के बाद से केवल दो बार इसे रद्द करना पड़ा है. पहली बार 2001 में गुजरात भूकंप के कारण और दूसरी बार 2009 में राष्ट्रपति वेंकटरमन के निधन के बाद इसे रद्द किया गया था.

भारत के गणतंत्र दिवस समारोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा
बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी भारत के गणतंत्र दिवस समारोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो न केवल सेना के बैंड की धुनों का जश्न मनाता है, बल्कि देश की गौरवशाली सैन्य परंपराओं को भी दिखाता है. यह आयोजन भारतीय सेना की अनुशासन और गर्व की भावना को प्रदर्शित करता है और राष्ट्र की एकता और अखंडता का प्रतीक है.

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