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Economy Edition: बढ़ रहा है बैंकों का NPA, सरकार की तैयारी से बैंकिंग सिस्टम को सुधार की उम्मीद

मोदी सरकार ने बैंकों के एनपीए से निपटने के लिए 4 बड़े कदम उठाये हैं जिसमें बैंक के एनपीए को पारदर्शी तरीके से पहचानना, एनपीए की रिकवरी करने के लिए कदम उठाना, बैंकों में पैसा डालना और पब्लिक सेक्टर बैंक में आर्थिक सुधार करना जैसे काम हैं.

नई दिल्लीः देश के बैंकिंग सिस्टम पर इस समय सवालिया निशान लग रहे हैं. पीएमसी बैंक जैसे संकट के बाद लोगों का ये सवाल बार-बार सामने आ रहा है कि क्या उनका पैसा बैंकों में भी सुरक्षित नहीं है? दरअसल बैंकिंग सेक्टर आज सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है. बैकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है और अर्थव्यवस्था की हालत खराब होती जा रही है.

एनपीए की लगातार बढ़ोतरी पीएमसी बैंक घोटाले ने देश के बीमार बैंकिंग सेक्टर की तरफ देश का ध्यान एक बार फिर खींचा है. एनपीए का मतलब होता है, नॉन परफॉर्मिंग असैट और हिंदी में इसे डूबा हुआ कर्ज बोल सकते हैं जो लगातार बढ़ रहा है.आंकड़ों के मुताबिक इसे देखें तो 2014 में बैंको का एनपीए 2.39 लाख करोड़ था, जो 2015 में 3.23 लाख करोड़ रुपये , 2016 में 5.66 लाख करोड़ रुपये, 2017 में 7.28 लाख करोड़ रुपये और 2018 में 10.36 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया.

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जानकार की सलाह एनपीए की वजह से बैंक डूब रहे हैं और आम लोगों का पैसा फंस रहा है जो बैंकों की साख को बट्टा पहुंचा रहे हैं. जानकार इसे भी मंदी का एक बड़ा कारण मानते हैं. जेएनयू के प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि पिछले 3 सालों में बैंकों के पास एनपीए बहुत हो गया है और बैंकों को पीसीए में डाल देने से वह अधिक उधार नहीं दे पाएंगे. अब बैंकों को भी बहुत ध्यान से लोन लेना है. एक तरफ मंदी है तो लोन लेने वाले कम है दूसरी तरफ बैंक घबराए हुए हैं कि लोन दिया जाए और कहीं वह एनपीए ना हो जाए. बैंक पर लोन देने का दबाव है वही एनपीए ना ज्यादा हो इसका भी दबाव है. इसपर स्पष्टता नही है कि बैंक क्या करें?

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एनपीए के कारण बैंकों ने कर्ज देने की शर्तों में सख्ती कर दी और जनवरी से सितंबर तक बैंक से मिलने वाले कर्ज 17 फीसदी से 8.8 फीसदी हो गया. इस कारण कारोबार में कम पैसा लगने लगा. कम नये कारोबार का मतलब कम रोजगार है. लोगों के पास नौकरी न होने से वो कम खर्च कर रहे हैं जिसका सीधा असर मांग पर पड़ रहा है.

सरकार की क्या है तैयारी एनपीए विकास के हाइवे का वो स्पीड ब्रेकर है, जिसे हटाए बिना भारत 5 ट्रिलियन इकॉनमी के सपने को पूरा नहीं कर सकता. इसीलिए सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कुछ कदम उठाए हैं, जिसमें बैंकों का विलय करना शामिल है. सरकार का दावा है कि मार्च 2019 में पहली बार एनपीए में गिरावट आई है और ये मार्च 2018 के 10.36 लाख करोड़ से घटकर 9.49 लाख करोड़ हो गया है. इसके बावजूद भारतीय बैंकों का एनपीए दूसरे विकासशील देशों की तुलना में काफी ज्यादा है.

अन्य देशों का एनपीए ब्राजील में बैंकों का एनपीए 3.6 फीसदी जबकि भारत में 10 फीसदी है. इंडोनेशिया में बैंकों का एनपीए 2.6 फीसदी है. साउथ अफ्रीका में बैंकों का एनपीए 2.8 फीसदी और मलेशिया में ये 1.5 फीसदी है.

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मोदी सरकार ने बैंकों के एनपीए से निपटने के लिए 4 बड़े कदम उठाये हैं 1. बैंक के एनपीए को पारदर्शी तरीके से पहचानना 2. एनपीए की रिकवरी करने के लिए कदम उठाना 3. बैंकों में पैसा डालना 4. पब्लिक सेक्टर बैंक में आर्थिक सुधार करना

सरकार नया इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड भी लेकर आई है जिसके तहत जो व्यक्ति या संस्था बैंक का पैसा लेकर फरार है. उसकी संपत्ति से पैसे वसूलने की जल्द कार्रवाई होती है. वैसे तो सरकार के कामों का कितना असर बैंकिंग सिस्टम की बेहतरी के तौर पर दिखेगा, इसको लेकर तस्वीर साफ नहीं है. हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी भरोसा दिलाया है कि बैंकों के विलय से एनपीए की समस्या से भी निपटने में आसानी होगी.

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