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फ्रांस से ABP न्यूज़ की खास रिपोर्ट, जानें कैसे भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगा राफेल

आज रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह फ्रांस में पहला राफेल लड़ाकू विमान हासिल करेंगे. समझौते के मुताबिक फ्रांस भारत को 36 राफेल लड़ाकू विमान सितंबर 2022 तक सौंपेगा.

फ्रांस: दशहरा के अवसर पर पहला राफेल लड़ाकू विमान (Rafale Fighter Jet) प्राप्त करने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) फ्रांस पहुंच चुके हैं. रक्षामंत्री सिंह फ्रांसीसी पोर्ट बोर्डेक्स पर दशहरे की पूजा के बाद पहला राफेल विमान स्वीकार करेंगे. यह शस्त्र पूजन लड़ाकू विमान राफेल और उसमें लोड हथियारों का किया जाएगा. खास बात ये है कि वायुसेना आज अपना 87वां स्थापना दिवस भी मना रही है. आखिर कैसे भारत के लिए राफेल होगा‌ एक बड़ा गेमचेंजर, ये जानने के लिए एबीपी न्यूज पहुंचा है फ्रांस हैं जहां भारत को पहला राफेल विमान मिलेगा.

भारत को फ्रांस से जो राफेल (राफेल) लड़ाकू विमान मिलने वाला है वो 4.5 जेनरेशन मीडियम मल्टीरोल एयरक्राफ्ट है. मल्टीरोल होने के कारण दो इंजन वाला (टूइन) राफेल फाइटर जेट एयर-सुप्रेमैसी (Air Supremacy) यानि हवा में अपनी बादशाहत कायम करने के साथ-साथ डीप-पैनेट्रेशन यानि दुश्मन की सीमा में घुसकर हमला करने में भी सक्षम है.

फ्रांस के साथ हुए सौदे में जो 36 राफेल (राफेल) फाइटर प्लेन भारत को मिलने वाले हैं, वे अत्याधुनिक हथियारों और मिसाइलों से लैस हैं. सबसे खास है दुनिया की सबसे घातक समझे जाने वाली हवा से हवा में मार करने वाली मेटयोर (METEOR) मिसाइल. ये मिसाइल चीन तो क्या किसी भी एशियाई देश के पास नहीं है. यानि राफेल प्लेन वाकई दक्षिण-एशिया में गेम-चेंजर साबित हो सकता है. इस मिसाइल की रेंज करीब 150 किलोमीटर है.

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, भारत ने राफेल सौदे में करीब 710 मिलियन यूरो (यानि करीब 5341 करोड़ रुपये) लड़ाकू विमानों के हथियारों पर खर्च किए हैं. गौरतलब है कि पूरे सौदे की कीमत करीब 7.9 बिलियन यूरो है यानि करीब 59 हजार करोड़ रुपये.

भारत को आज मिलेगा पहला लड़ाकू विमान राफेल, जानें इसकी खूबियां

जानकारी के मुताबिक, वियोंड विज्युल रेंज ‘मेटयोर’ मिसाइल की रेंज करीब 150 किलोमीटर है. हवा से हवा में मार करने वाली ये मिसाइल दुनिया की सबसे घातक हथियारों में गिनी जाती है. इसके अलावा राफेल फाइटर जेट लंबी दूरी की हवा से सतह में मार करने वाली स्कैल्प (SCALP) क्रूज मिसाइल और हवा से हवा में मार करने वाली माइका (MICA) मिसाइल से भी लैस है.

राफेल प्लेन में एक और खासयित ये है कि इसके पायलट के हेलमेट में ही फाइटर प्लेन का पूरा डिस्पले सिस्टम होगा. यानि उसे प्लेन के कॉकपिट में लगे सिस्टम को देखने की जरुरत भी नहीं पड़ेगी. उसका पूरा कॉकपिट का डिस्पले हेलमेट में होगा.

फ्रांस से ABP न्यूज़ की खास रिपोर्ट, जानें कैसे भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगा राफेल फाइल फोटो

जानकारी के मुताबिक, राफेल बनाने वाली कंपनी से भारत ने ये भी सुनिश्चित कराया है कि एक समय में 75 प्रतिशत प्लेन हमेशा ऑपरेशनली-रेडी रहने चाहिए. इसके अलावा भारतीय जलवायु और लेह-लद्दाख जैसे इलाकों के लिए खास तरह के उपकरण लगाए गए हैं.

भारत ने राफेल सौदे में करीब 710 मिलियन यूरो (यानि करीब 5341 करोड़ रुपये) लड़ाकू विमानों के हथियारों पर खर्च किए हैं. गौरतलब है कि पूरे सौदे की कीमत करीब7.8 बिलियन यूरो है यानि करीब 59 हजार करोड़ रुपये(मंहगाई दर 3.5 से ज्यादा नहीं होगी किसी भी स्थिति में). राफेल का फुल पैकेज कुछ इस तरह है. 36 विमानों की कीमत 3402 मिलियन यूरो, विमानों के स्पेयर पार्टस1800 मिलियन यूरो के हैं जबकि भारत के जलवायु के अनुरुप बनाने में खर्चा हुआ है 1700 मिलियन यूरो का. इसके अलवा पर्फोमेंस बेस्ड लॉजिस्टिक का खर्चा है करीब 353 मिलियन यूरो का. एक विमान की कीमत करीब 90 मिलियन यूरो है यानि करीब 673 करोड़ रुपये. लेकिन इस विमान में लगने वाले हथियार, सिम्यूलेटर, ट्रैनिंग मिलाकर एक फाइटर जेट की कीमत करीब 1600 करोड़ रुपये पडेगी.

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माना जा रहा है कि पहला राफेल विमान सितबंर 2019 तक भारतीय वायुसेना के जंगी बेड़े में शामिल हो जायेगा. राफेल की पहली स्कॉवड्रन यहीं पर तैनात की जायेगी. इसके अलावा एक स्कावड्रन पश्चिम बंगाल के हाशिमारा बेस पर तैनात की जायेगी, जो चीन सीमा से सटा हुआ है.

राफेल एक मल्टी रोल फाइटर जेट है जो एयर-सुपीरेरियटी और डीप पैनिट्रेशन दोनों को ही बखूबी निभा सकता है. यानि राफेल जब आसमान में उड़ता है तो कई सौ किलोमीटर तक दुश्मन का कोई भी विमान, हेलीकॉप्टर या फिर ड्रोन पास नहीं फटक सकता है. साथ ही वो दुश्मन की जमीन में अंदर तक दाखिल होकर बमबारी कर तबाही मचा सकता है. इसीलिए राफेल को मल्टी रोल लड़ाकू विमान कहा जाता है.

राफेल के अंबाला मे आने की वायुसेना ने पूरी तैयारी कर ली है. इसके लिए राफेल बनाने वाली फ्रांस की कंपनी, डेसॉल्ट (Dassault) 227 करोड़ रूपये की लागत से बेस में मूलभूत सुविधाएं तैयार कर रही है. जिसमें विमानों के लिए रनवे, पाक्रिंग के लिए हैंगर और ट्रैनिंग के लिए सिम्युलेटर शामिल है.

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अंबाला में राफेल की स्कॉवड्रन का नाम भी दे दिया गया है. ये स्कॉवड्रन 'गोल्डन एरो' (Golden Arrow) के नाम से जानी जाई गई. दरअसल, गोल्डन एरो अभी तक भटिंडा स्थित मिग-21 की स्कॉवड्रन को जाना जाता था. मिग-21 की गोल्डन एरो स्कॉवड्रन ने करगिल युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी. इसी स्कॉवड्रन के स्कॉवड्रन लीडर अजय आहूजा करगिल युद्ध में दुश्मन के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गए थे. उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से नवाजा गया था. अंबाला एयरबेस पर राफेल को तैनात करने का फैसला इसलिए भी किया गया क्योंकि यहां पर भारत के जंगी बेड़े की सबसे घातक और सुपरसोनिक मिसाइल, ब्रह्मोस की स्कॉवड्रन भी तैनात है.

पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति से मिले राजनाथ सिंह, अब राफेल हासिल कर करेंगे 'शस्त्र पूजा'

जानकारी के मुताबिक, राफेल बनाने वाली कंपनी से भारत ने ये भी सुनिश्चित कराया है कि एक समय में 75 प्रतिशत प्लेन हमेशा ऑपरेशनली-रेडी रहने चाहिए (सुखोई के लिए ये 46 % था). इसके अलावा भारतीय जलवायु और लेह-लद्दाख जैसे इलाकों के लिए खास तरह के उपकरण लगाए गए हैं, ताकि बेहद उंचाई और ठंड वाले इलाकों में भी इन्हे उड़नें में कोई दिक्कत ना हो. साथ ही राफेल 24 घंटे में पांच बार उड़ने की क्षमता रखता है. जबकि सुखोई सिर्फ तीन (03) उड़ान भर सकता है. राफेल का फ्लाइट रेडियस करीब 780-1050 किलोमीटर है.

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