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Explained: राजद का MY समीकरण क्यों फेल हुआ, NDA के ME समीकरण कितना कारगर रहा, चुनावी नतीजों में कैसे बिखर गईं जातियां?

ABP Explainer: बिहार चुनाव में इस बार कई रिकॉर्ड बने, जिसमें जातिगत समीकरण का बदलना भी शामिल है. महागठबंधन के पारंपरिक 31% MY (मुस्लिम-यादव) भी बिखर गए. NDA इन्हें भी तोड़ने में कामयाब हो गई.

बिहार चुनाव में इस बार राजद का पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण बिखर गया. 14% यादव और 18% मुस्लिम आबादी को राजनीतिक ताकत मानकर राजद पूरे आत्मविश्वास में उतरा था. लेकिन मोदी-नीतीश के समीकरण ने असर दिखा दिया. इसका सबसे बड़ा नुकसान राजद को हुआ. बची-कुची कसर AIMIM ने मुस्लिम वोट काटकर पूरी कर दी.

तो आइए ABP में समझते हैं कि बिहार में जातिगत समीकरण कैसे थे, यह फेल क्यों हो गए और नतीजों में जातिगत बंटवारा कैसा रहा...

सवाल 1- बिहार में जाति का रोल हमेशा बड़ा कैसे रहा है?
जवाब- बिहार की 85% आबादी पिछड़ी, दलित और अल्पसंख्यक जातियों से है. 2023 जाति सर्वे के मुताबिक, ऊपरी जातियों में ब्राह्मण 5%, भूमिहार 3% और राजपूत 4% हैं. वहीं दूसरी तरफ यादव 14%, मुस्लिम 17%, कुर्मी/कोएरी जैसे OBC 15%, EBC (100+ छोटी पिछड़ी जातियां) 36% और दलित (SC/ST) 16% हैं...

अपर कास्ट NDA का कोर वोटर रहा है. नीतीश कुमार और भाजपा 20 साल से इनको साधकर ही सत्ता पर काबिज है. वहीं, महागठबंधन अपने सामाजिक गठबंधन MY को व्यापक बनाने में नाकाम रहा, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान की NDA में वापसी ने उसके कुल वोट प्रतिशत बढ़ाने में मदद की. कुशवाहा और पासवान कारक ने पिछले विधानसभा चुनावों में CP(ML) लिबरेशन के साथ गठबंधन करके महागठबंधन की मिली भगत को भी कम कर दिया, क्योंकि मगध और शाहाबाद जैसे इलाकों में वामपंथी दल को कुशवाहा, मध्यवर्ती पिछड़ी जातियों और दलितों का परंपरिक समर्थन हासिल था.

सवाल 2- 2025 में जातिगत बंटवारा कैसा रहा?
जवाब- एक्सपर्ट्स के मुताबिक,

  • ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत का 80-85% वोट NDA को गया, मुख्य रूप से बीजेपी को मिला. मोदी का 'डबल इंजन' विकास मॉडल और ऊपरी जातियों की पारंपरिक लॉयल्टी काम आई. बीजेपी ने 11 भूमिहार, 7 ब्राह्मण और 15 राजपूत कैंडिडेट उतारे, जिससे वोट ट्रांसफर 90% से ऊपर रहा. हालांकि, यह 2020 से कोई बड़ा शिफ्ट नहीं, लेकिन यह NDA का मजबूत बेस बना.
  • महागठबंधन को यादवों के 70-75% वोट मिले, लेकिन 20-25% NDA की तरफ शिफ्ट हो गया. राजद ने 52 यादव कैंडिडेट उतारे, जो उल्टा पड़ गया, क्योंकि गैर यादवों को लगा कि जातिवादी हो रही है. युवा और महिलाएं नीतीश की योजनाओं से प्रभावित हुए. तेजस्वी का 'बदलाव' का नारा अच्छा था, लेकिन 10-15% वोट्स शिफ्ट ने महागठबंधन की 50 से ज्यादा सीटें गवां दीं.
  • 70-75% मुस्लिमों ने महागठबंधन को वोट दिया, लेकिन 15-20% NDA के पास शिफ्ट हो गए. सीमांचल में AIMIM ने 5% वोट काट लिया. कुछ मुस्लिम महिलाओं ने नीतीश की 'महिला रोजगार योजना' की वजह से वोट शिफ्ट किया. पुराना MY 31% था, लेकिन टूटकर महागठबंधन को सिर्फ 28-29% मिलने का अंदाजा है.
  • NDA को OBC के कोएरी/कुर्मी का 65-75% वोट मिला, खासकर जदयू को. नीतीश कुमार का कुर्मी कोर बेस 5.6% बढ़ा. राजद को सिर्फ 20-30% मिला. जदयू ने OBC वाले इलाके में 19 सीटें ज्यादा जीतीं.
  • सबसे बड़ा ग्रुप EBC गेम चेंजर साबित हुआ. इसने NDA को 55-60% वोट दिया, जो 2020 से करीब 15-20% ज्यादा है. नीतीश ने इन्हें कल्याण योजना से जोड़ा. लखपति दीदी और फ्री बिजली जैसी योजनाओं ने वोटर्स का इरादा बदल दिया. महागठबंधन को EBC का 30-40% वोट मिला, क्योंकि VIP (मल्लाह, 1.38%) और IIP (पान, 0.37%) के वोट बिखरे. EBC ने महागठबंधन की 'EBC सब्हा' को इग्नोर किया.
  • दलितों ने NDA का वोट प्रतिशत बढ़ाया. चिराग पासवान ने दलितों को एकजुट किया. चिराग ने 19 सीटें पर 4.97% वोट और जीतन राम मांझी ने महादलितों के 1.18% वोट बटोरे. महागठबंधन का लेफ्ट का 4.18% वोट कट गया.
  • सभी जातियों में महिलाओं का कुल टर्नआउट 71.78% रहा. NDA को 55-65% महिला वोट मिला, क्योंकि नीतीश की योजना ने 2.52 करोड़ महिलाओं को मोड़ा. जबकि महागठबंधन को 30-40% महिला वोट मिला. महिला-बहुल जिलों में NDA का वोट शेयर 10% ज्यादा था. नया 'ME' फॉर्मूला (महिला + EBC) ने 52% वोट बैंक बनाया.

सवाल 3- कैसे महागठबंधन जातिगत समीकरण से जीत का अंदाजा लगा रहा था?
जवाब- महागठबंधन ने 2020 का फॉर्मूला दोहराने पर भरोसा किया. उसका मुख्य हथियार'MY' यानी मुस्लिम (17%) + यादव (14%) = 31% कोर वोट था. 2020 में ये 37% तक पहुंचा था और 75 सीटें दिलाईं थीं. तेजस्वी यादव ने EBC को टारगेट किया. मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम फेस बनाया, VIP और IIP को जोड़ा.

कांग्रेस ने मेनिफेस्टो में 10 लाख नौकरियां, जीविका दीदियों को सरकारी दर्जा और पुरानी पेंशन का वादा किया. लेकिन एग्जिट पोल ने महागठबंधन को 80-100 सीटें दीं. तेजस्वी ने 'नौकरी 100%' नारा दिया और बेरोजगारी पर फोकस किया और 'वोट चोरी' का आरोप लगाया. महागठबंधन ने सोचा कि एंटी-इनकंबेंसी, युवा और MY को मिलाकर 122 से ज्यादा सीटें मिल जाएंगी. लेकिन ये अंदाजा छोटे सैंपल पर था. EBC/महिला शिफ्ट और जन सुराज का 3.5% कट मिस हो गया. महागठबंधन ने ओवर-एसर्टिव यादव स्ट्रैटेजी अपनाई, जिसने गैर-यादवों को दूर भगाया.

सवाल 4- तो फिर जातिगत समीकरण कैसे फेल हो गया?
जवाब- एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पुराना 'MY' समीकरण टूटा क्योंकि महागठबंधन सिर्फ 31% पर अटका रहा और बाकी को जोड़ न सका. इसी भरोसे में तेजस्वी यादव ने 18 नवंबर को शपथ ग्रहण तक की घोषणा कर दी थी, लेकिन जमीन पर मामला बिल्कुल उलट रहा. MY की जगह मोदी-नीतीश के ME समीकरण ने असर दिखाया.

2020 में जहां कुल 55 यादव विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे, वहीं इस बार यह संख्या घटकर केवल 28 रह गई, जो पिछली बार से 27 कम है. यादव प्रभाव वाली 55 सीटों में महागठबंधन का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा. इन सीटों पर महागठबंधन के 66 यादव उम्मीदवारों में से सिर्फ 12 ही जीत सके. इनमें माले के संदीप सौरभ अकेले गैर-राजद विजेता रहे, जबकि राजद के केवल 11 यादव उम्मीदवार ही जीत पाए.

राजद ने अपने कोटे की 144 सीटों में से 51 पर यादव प्रत्याशी उतारे थे. वहीं, NDA ने 23 यादव प्रत्याशियों को टिकट दिया, जिसमें 15 ने जीत हासिल की. राजद के खराब प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ा कारक था कई यादव उम्मीदवारों की अत्यधिक आक्रामक चुनावी रणनीति, जिसने स्थानीय स्तर पर विरोध भी पैदा किया. लालू प्रसाद जिन अति पिछड़ा वर्ग को अपने सामाजिक समीकरण की रीढ़ मानते थे, वे इस बार राजद से दूर होते दिखे.

वहीं, मुस्लिमों की बात करें तो आजादी के बाद से बिहार में 18 बार हुए विधानसभा चुनाव में इस बार सबसे कम 11 मुस्लिम विधायक जीते. खास बात यह है कि इन 11 मुस्लिम विधायकों में 5 विधायक AIMIM से जीते. जदयू ने चार मुस्लिमों को टिकट दिया पर मंत्री जमां खान ही चैनपुर से जीत पाए.

वहीं राजद ने 18 मुस्लिमों को टिकट दिया पर 3 जीत पाए. कांग्रेस ने 10 मुस्लिमों को टिकट दिया, इनमें 2 विधायक जीत पाए. कांग्रेस का प्रदर्शन इतना खराब रहा कि विधानसभा में पार्टी के नेता शकील अहमद भी कदवा सीट नहीं बचा पाए. माले ने 2 मुस्लिमों को टिकट दिया, दोनों हार गए. यहां तक कि 2020 विधानसभा में बिहार में सबसे बड़ी जीत दर्ज करने वाले महबूब आलम भी बलरामपुर से हार गए.

इससे पहले 2005 में सबसे कम 16 विधायक जीते थे जबकि सबसे अधिक 34 मुस्लिम विधायक 1985 में जीते थे. 2020 में भी AIMIM के 5 विधायक जीते थे पर चार राजद में शामिल हो गए थे.

कुल मिलाकर महागठबंधन का MY समीकरण फेल हो गया और NDA का ME समीकरण पास हो गया है. महागठबंधन से मात्र 5 मुसलमान और 11 यादव जीते, जिस कारण पिछली बार 2020 के 110 विधायक की तुलना में इस बार उसके मात्र 35 विधायक ही बन पाए हैं. वहीं, NDA के ME महिला और EBC ने उसे जबरदस्त सफलता दिलाते हुए पिछली बार के 125 विधायक की तुलना में 202 विधायकों पर पहुंचा दिया है. मुस्लिम बहुल इलाकों में AIMIM के सक्रिय प्रचार के कारण मुस्लिम वोटों में भी बिखराव हुआ.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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