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Explained: बिहार में गठबंधन हर पार्टी की मजबूरी क्यों, अकेले चुनाव जीतना कितना मुश्किल, 30 सालों में कैसे बदला पैटर्न?

ABP Explainer: बिहार की राजनीति में गठबंधन की 3 बड़ी वजहें हैं- वोटों का बंटवारा, जातिगत समीकरण और बहुदलीय सिस्टम. कोई भी पार्टी अकेले इन तीनों वजहों को एक साथ नहीं ला सकती. इससे गठबंधन हर पार्टी की मजबूरी बन जाता है.

बिहार की राजनीति में गठबंधन बनाना हर पार्टी की मजबूरी है. इसके पीछे कई बड़ी वजहें हैं. बीते 30 सालों के चुनाव देखें तो सिर्फ 1995 का चुनाव छोड़कर हर चुनाव में गठबंधन की सरकार बनी. 1995 में लालू प्रसाद यादव की लहर ने अकेले ही 167 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जो किसी एक पार्टी का आखिरी बहुमत था.

तो आइए ABP एक्सप्लनेर में समझते हैं कि बिहार की राजनीति में गठबंधन बनाना जरूरी क्यों, बीते 30 सालों में गठबंधन फैक्टर ने कैसे काम किया और पार्टी अकेले सरकार क्यों नहीं बना सकती...

सवाल 1- बिहार में गठबंधन हर पार्टी की मजबूरी क्यों?
जवाब: बिहार की राजनीति में वोटों का बंटवारा, जातिगत समीकरण और बहुदलीय व्यवस्था की वजह से कोई एक पार्टी अकेले पूर्ण बहुमत नहीं ला पाती. सिर्फ एक बार 1995 में राष्ट्रीय जनता दल यानी RJD (तब जनता दल) ने लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में 167 सीटें जीतकर अकेले बहुमत पाया था. इससे पहले और बाद में हर सरकार गठबंधन से बनी. इसकी 3 बड़ी वजहें हैं...

  • वोटों का बंटवारा: कोई पार्टी 40% से ज्यादा वोट शेयर नहीं ले पाती. 10-20% वोट लेफ्ट, AIMIM और पासवान की LJP या स्वतंत्र उम्मीदवारों को जाते हैं.
  • जातिगत समीकरण: बिहार में यादव (14%), मुस्लिम (17%), कुशवाहा-कोएरी (8%), ऊपरी जाति (15%) और दलित (16%) जैसे वोट बैंक बंटे हैं। कोई पार्टी सबको एक साथ नहीं ला सकती।
  • बहुदलीय सिस्टम: RJD, JDU, BJP, कांग्रेस, CPI-ML जैसे कई दल सक्रिय हैं। वोट बंटने से गठबंधन जरूरी हो जाता है। 1990 से 2020 तक हर चुनाव में गठबंधन ने सरकार बनाई, सिवाए 1995 को छोड़कर. 2020 में NDA (37% वोट) और महागठबंधन (37% वोट) में टक्कर थी, लेकिन सीटें गठबंधन से ही मिलीं.

सवाल 2- 1990 में बिहार की राजनीति कैसी थी और गठबंधन की क्या भूमिका थी?
जवाब- 1990 और 1995 के विधानसभा चुनावों में बिहार में 324 सीटें थीं. 2000 में बिहार से झारखंड अलग होकर नया राज्य बना. इसके बाद बिहार में 243 सीटें बचीं.

मार्च 1990 में जब बिहार विधानसभा चुनाव हुए तो लालू प्रसाद यादव की जनता दल और लेफ्ट फ्रंट की CPI,CPM मुख्य दल थे. जनता दल को 28.1% वोट प्रतिशत के साथ 122 सीटें मिलीं, कांग्रेस को (22.4% वोट प्रतिशत) 71 सीटें, बीजेपी को (11.7% वोट प्रतिशत) 39 सीटें, CPI को (6.8% वोट प्रतिशत) 23 और CPM को 6 सीटें मिलीं थीं.

लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम-यादव समीकरण बनाकर कांग्रेस का 30 साल का वर्चस्व तोड़ा था. जनता दल ने 122 सीटें जीतीं, लेकिन पूर्ण बहुमत के लिए 163 सीटें चाहिए थीं. इस वजह से लेफ्ट फ्रेंस (CPI,CPM) का समर्थन लिया. लालू 10 मार्च 1990 को मुख्यमंत्री बने. बीजेपी और कांग्रेस अकेले कमजोर थे. जनता दल को 28% का वोट शेयर का बंटवारा दिखाता है कि अकेले जीत मुश्किल थी. गठबंधन ने ही सरकार बनाई.

सवाल 3- तो फिर 1995 में लालू ने बिना गठबंधन के सरकार कैसे बनाई?
जवाब- मार्च-अप्रैल 1995 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए थे, जिसमें जनता दल और बाहरी लेफ्ट समर्थन मुख्य था. जनता दल को पहली बार 36.8% वोट शेयर के साथ 167 सीटों पर जीत मिली थी. जबकि बीजेपी को 14.5% के साथ 41 सीटें, कांग्रेस को 11.9% के साथ 29 सीटें और CPI को 7.2% वोट शेयर के साथ 26 सीटें मिली थीं.

लालू की सामाजिक न्याय की लहर और मुस्लिम-यादव समीकरण चरम पर था. जनता दल ने 167 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत पाया था, जो आज तक बिहार में एकलौता बहुमत है. लालू ने 4 अप्रैल 1995 को फिर मुख्यमंत्री पद संभाला. लेकिन वोट शेयर सिर्फ 36.8% था, यानी 63% वोट बंटे थे. फिर 1997 में जनता दल टूटा और RJD बना. 2000 से गठबंधन फिर जरूरी हुआ क्योंकि वोट शेयर और ज्यादा बंट गया.

1995 में अकेले बहुमत के बावजूद, वोटों का बंटवारा और पार्टी टूटने से गठबंधन की जरूरत बाद में पक्की हो गई.

सवाल 4- 2000 के चुनाव में गठबंधन का क्या रोल था?
जवाब- फरवरी 2000 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए। मुख्य दल NDA (बीजेपी + समता पार्टी), RJD + कांग्रेस थे. RJD ने 28.3% वोट शेयर के साथ 124 सीटें जीतीं. लेकिन 163 के बहुमत से यह आंकड़ा कम था, इसलिए कांग्रेस की 23 सीटों के साथ गठबंधन किया और सरकार बनाई. 25 फरवरी को राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री बनीं.

इसके बाद नवंबर 2000 में झारखंड 81 विधानसभा सीटों के साथ बिहार से अलग होकर नया राज्य बन गया. बिहार में 243 सीटें रह गईं. RJD गठबंधन ने बहुमत बनाए रखा, लेकिन वोट बंटवारे ने गठबंधन को मजबूरी दिखाई.

सवाल 5- 2005, 2010, 2015 और 2020 में बिहार चुनाव में गठबंधन कैसे जरूरी हो गया?
जवाब- 2005 में बिहार में दो बार विधानसभा चुनाव हुए.  फरवरी और अक्टूबर-नवंबर में. फरवरी में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला. RJD सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन 122 के जादुई आंकड़े से 47 सीटें कम रहीं. रामविलास पासवान की LJP ने वोट काट दिए. हंग असेंबली की वजह से 7 मार्च 2005 को राष्ट्रपति शासन लागू हुआ.

इसके बाद अक्टूबर-नवंबर के चुनाव में नीतीश कुमार की JDU और बीजेपी ने गठबंधन मजबूत किया. JDU को 20.5% वोट शेयर के साथ 88 सीटें मिलीं और बीजेपी को 15.7% वोट शेयर के साथ 55 सीटें मिलीं. वहीं RJD को 23.5% वोट शेयर होने के बावजूद 54 सीटें ही मिल सकीं.

2010 में गठबंधन की ताकत कैसे दिखी?
इस विधानसभा चुनाव में नीतीश की 'सुशासन' लहर चली. JDU ने 115 सीटें जीतीं, लेकिन बीजेपी के 91 सीटों के बिना बहुमत नहीं था. NDA ने 206 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाया. RJD की 22 सीटों और LJP की 3 सीटों का गठबंधन कमजोर रहा. नीतीश 26 नवंबर 2010 को फिर मुख्यमंत्री बने.

2015 में महागठबंधन की जीत कैसे हुई?
लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने ऐतिहासिक गठबंधन बनाया, जिसमें RJD, JDU और कांग्रेस शामिल थी. वहीं NDA के गठबंधन में बीजेपी, LJP, HAM और RLSP थी. महागठबंधन को 41.9% वोट शेयर के साथ 178 सीटें जीतीं और सरकार बनाई. 20 नवंबर 2015 को नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने.

2020 में गठबंधन की टक्कर कैसी थी?
पिछला महागठबंधन टूटा और नीतीश ने बीजेपी का हाथ थामा. NDA में JDU, HAM और VIP शामिल रहीं, जबकि महागठबंधन में RJD, कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी रहीं. NDA ने  37.2% वोट शेयर के साथ 125 सीटें जीतीं. वहीं, महागठबंधन को 110 सीटें मिलीं.16 नवंबर 2020 को नीतीश कुमार फिर एक बार मुख्यमंत्री बने.

सवाल 6- गठबंधन की मजबूरी के पीछे क्या पैटर्न दिखता है?
जवाब- गठबंधन के पीछे 3 पैटर्न दिखते हैं...

  1. वोट बंटवारा: 1990-2020 तक कोई पार्टी 40% वोट शेयर पार नहीं कर पाई. 2020 में NDA और महागठबंधन दनों को 37.2% वोट मिले, बाकी 25% छोटे दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों को मिले.
  2. जातिगत गणित: RJD (यादव+मुस्लिम), JDU (कुशवाहा-कोएरी), बीजेपी (ऊपरी जाति) और लेफ्ट (EBC+दलित) के पास वोट बैंक है. कोई भी पार्टी अकेले सभी जातियों को कवर नहीं कर सकती.
  3. ऐतिहासिक सबक: 1995 को छोड़कर, हर सरकार गठबंधन से बनी. 2005 की हंग असेंबली ने दिखाया कि गठबंधन न हो तो अराजकता होती है. नीतीश ने 4 बार गठबंधन बदला (1996-2005: समता+बीजेपी, 2005-13: JDU+बीजेपी, 2015: RJD+कांग्रेस, 2017: JDU+बीजेपी, 2022: RJD+कांग्रेस और 2024: BJP-led NDA).

अब यही गठबंधन का फैक्टर 2025 के विधानसभा चुनाव में भी बना हुआ है. NDA में JDU और बीजेपी साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं, तो वहीं महागठबंधन में RJD और कांग्रेस मैदान में हैं.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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