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कुशा के बिना क्यों तर्पण माना जाता है अधूरा, पितृ पक्ष में है बेहद जरुरी

Pitru Paksha 2026: कुशग्रहणी अमावस्या पर कुशा तोड़कर पितृ पक्ष की तैयारी शुरू हो जाती है, आखिर श्राद्ध कर्म में कुशा को क्यों जरुरी माना जात है, क्या है इसका धार्मिक महत्व और कैसे करें इस्तेमाल.

Pitru Paksha 2026: हिंदू धर्म में पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान में कई ऐसी सामग्री का प्रयोग होता है, जिन्हें सामान्य वस्तु नहीं बल्कि धार्मिक कर्म का अनिवार्य अंग माना गया है. इनमें कुशा का विशेष स्थान है. आज कुशग्रहणी अमावस्या है जो सिर्फ स्नान-दान नहीं बल्कि कुशा एकत्रित करने का दिन है, इस दिन से पितृ पक्ष की तैयारियां शुरू हो जाती है. 

मान्यता है कि कुशा के बिना पितृ कर्म पूर्ण नहीं माना जाता. यही वजह है कि पितृ पक्ष शुरू होने से पहले भाद्रपद अमावस्या को कुशा ग्रहण करने की परंपरा है. इसी कारण इस अमावस्या को कुशग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है.

कुशा को इतना पवित्र क्यों माना गया?

कुशा एक विशेष प्रकार की पवित्र घास है, जिसका उल्लेख वैदिक और धर्मशास्त्रीय परंपरा में मिलता है. यज्ञ, हवन, संकल्प, पूजा, श्राद्ध और तर्पण जैसे धार्मिक कर्मों में इसका प्रयोग किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं में कुशा को पवित्रता, संयम और शुद्धता से जोड़ा गया है और पितृ कर्म में शुद्धता बेहद जरुरी है, तभी पूर्वज श्राद्ध स्वीकार करते हैं, ऐसी मान्यता है. 

कुशा की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग पुराणिक कथाएं प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के वराह स्वरूप से कुशा की उत्पत्ति मानी गई है, इसलिए इसे विष्णु से संबंधित और पवित्र माना जाता है.

तर्पण में कुशा का इस्तेमाल कैसे होता है?

  • गरुड़ पुराण के पार्वण श्राद्ध-विधान में पितरों को अर्घ्य देते समय कुश और पुष्प सहित जल अर्पित करने का विधान मिलता है. 
  • इस दौरान हाथ में कुशा धारण की जाती है. कई परंपराओं में कुशा से पवित्री यानी अंगूठी बनाकर अनामिका उंगली में धारण की जाती है.
  • ‘ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ’ मंत्र बोलते हुए तर्पण किया जाता है. 
  • पिता, दादा और परदादा तथा उनके समकक्ष मातृ पक्ष के पितरों का नाम-गोत्र लेकर तर्पण किया जाता है.
  • हर तर्पण के साथ पितरों का स्मरण करते हुए स्वधा नमः का उच्चारण किया जा सकता है.
  • तर्पण के बाद कुशा को सम्मानपूर्वक अलग रखें, उसे पैरों से न छुएं और कचरे में न डालें.

कुशग्रहणी अमावस्या से क्या है संबंध?

भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या कहने का मुख्य कारण ही इस दिन वर्षभर के धार्मिक कार्यों के लिए कुशा ग्रहण करने की परंपरा है. पितृ पक्ष आने से पहले नई कुशा एकत्र कर उसे सुरक्षित रखा जाता है ताकि आने वाले श्राद्ध और तर्पण कर्म में उसका प्रयोग किया जा सके.

कुशा को तोड़ते समय रखें ध्यान

इसे स्वच्छ स्थान से लिया जाता है और धार्मिक कार्यों के लिए सुरक्षित रखा जाता है. कुशा को पैरों से छूने या अनादरपूर्वक रखने से बचना चाहिए. 

FAQs

  1. कुशग्रहणी अमावस्या क्या है?
    इस दिन पितृ पक्ष के लिए कुशा एकत्र करने की परंपरा है.
  2. तर्पण में कुशा क्यों जरूरी है?
    शास्त्रीय विधानों में कुशा को पितृ तर्पण का महत्वपूर्ण अंग माना गया है.
  3. कुशा के साथ तर्पण कैसे करें?
    कुशा धारण कर काले तिल मिले जल से पितरों को तर्पण करें.
  4. कुशा कब और कैसे एकत्र करें?
    कुशग्रहणी अमावस्या पर स्वच्छ स्थान से कुशा विधिपूर्वक ग्रहण करें.

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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

जागृति सोनी बरसले (Jagriti Soni Barsaley)

धर्म, ज्योतिष और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं पर शोध आधारित लेखन करने वाली डिजिटल पत्रकार

जागृति सोनी बर्सले धर्म, ज्योतिष, वास्तु और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े विषयों की अनुभवी डिजिटल पत्रकार और लेखिका हैं. उन्हें डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 10 वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में वह ABP Live (Abplive.com) में बतौर कंसल्टेंट कार्यरत हैं, जहां वह व्रत-त्योहार जैसे नवरात्रि, करवा चौथ, दिवाली, होली, एकादशी, प्रदोष व्रत, हरियाली तीज आदि, रमजान, धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय घटनाओं, शुभ मुहूर्त, वास्तु और फेंगशुई, पंचांग जैसे विषयों पर शोध आधारित और प्रमाणिक लेख लिखती हैं.

विशेषज्ञता (Expertise)

जागृति सोनी बर्सले विशेष रूप से इन विषयों पर लेखन करती हैं:

  • व्रत-त्योहार और भारतीय धार्मिक परंपराएं
  • वैदिक ज्योतिष और ग्रह-नक्षत्र आधारित घटनाएं
  • शुभ मुहूर्त और धार्मिक विधि-विधान
  • वास्तु शास्त्र और फेंगशुई
  • आध्यात्मिक मान्यताएं और सांस्कृतिक परंपराएं

उनके लेखों में धार्मिक विषयों को केवल आस्था के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि शास्त्रीय स्रोतों और प्रमाणिक ग्रंथों के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है.

शिक्षा और पृष्ठभूमि

जागृति सोनी बर्सले ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से की है.

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर डॉट कॉम से की, जहां डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने धर्म, समाज और संस्कृति से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर लेख लिखे.

डिजिटल मीडिया में काम करते हुए उन्होंने टेक्स्ट और वीडियो दोनों फॉर्मेट में काम किया है और वीडियो सेक्शन में सीनियर प्रोड्यूसर के रूप में भी लंबे समय तक योगदान दिया है. इस अनुभव ने उन्हें आधुनिक डिजिटल पत्रकारिता के विभिन्न फॉर्मेट को समझने और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने की क्षमता दी है.

शास्त्रीय अध्ययन और शोध

जागृति सोनी बर्सले की विशेष रुचि धर्म और ज्योतिष के शास्त्रीय अध्ययन में है.

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  • धर्म सिंधु
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  • शकुन शास्त्र
  • वास्तु

का अच्छा ज्ञान है. इन ग्रंथों के आधार पर वह व्रत-त्योहार, पूजा-विधि, ज्योतिषीय घटनाओं और मुहूर्त से जुड़े विषयों को सरल, प्रमाणिक और शोधपरक तरीके से पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं.

योगदान

जागृति सोनी बर्सले एक फ्रीलांस लेखक के रूप में भी कई मंचों पर आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और ज्योतिष से जुड़े विषयों पर लेख लिख चुकी हैं.

उनका उद्देश्य धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा में विश्वसनीय जानकारी के साथ प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक इन विषयों को समझ सकें और सही जानकारी प्राप्त कर सकें.

व्यक्तिगत रुचियां

अध्यात्म और भारतीय परंपराओं के अध्ययन के प्रति उनकी गहरी रुचि है. खाली समय में उन्हें आध्यात्मिक और ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ना पसंद है. यह अध्ययन उनके लेखन को और अधिक गहन, तथ्यपूर्ण और संदर्भ आधारित बनाता है.

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