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Holi 2025: वृंदावन की होली इतनी प्रसिध्द क्यों है? क्या इस दिन भांग पीना सही है ?

Holi 2025: होली का त्योहार ब्रज में धूमधाम से मनाया जाता है. वृंदावन की होली इतनी प्रसिध्द क्यों है? क्या पिचकारी और गुलाल रंग से खेलना शस्त्रों में वर्णन है?

Holi 2025: दीवाली के बाद सबसे बड़ा पर्व सनातन धर्म में होली माना जाता हैं. होली आने वाली है और हम सब उसके रंग मे रंग गए हैं. फाल्गुनी हवा के साथ वसंत ऋतु का आगमन मन मे नया उत्साह भर रहा हैं. खेत खलिहानो के रंग बिरंगे पेड़, फल, फूल आदि भंवरो को अपनी ओर बुला रहे हैं. मौसम बदल रहा हैं. होली की मस्ती सब पर छाई हैं.

जब भी कोई होली का प्रसंग आता है तब राधा–कृष्ण की छवि आँखों के आगे आती हैं. ऐसी धारना ही बन चली है की यह त्यौहार इसी युगल जोड़ी द्वारा प्रदत्त हैं. कई मायनो में यह सही भी हैं परन्तु कुछ ऐसे भी लोग है जो सहज विश्वासी नहीं हैं.

कई लोग इस बात को लेकर प्रमाण मांगते है कि किसी भी शास्त्र मे राधा–कृष्ण ने होली पर एक दूसरे पर रंग बरसाए थे ऐसा दृष्टांन्त बताएँ. उन्ही लोगो को मैं  सप्रमाण भ्रान्ति को दूर करना  चाहता हूँ.

गर्ग संहिता माधुर्य खण्ड अध्याय क्रमांक 12 अनुसार, एक दिन की बात है, होलिका महोत्सव पर भगवान कृष्ण को आया हुआ देख उन समस्त व्रजगोपिकाओं ने मानिनी श्रीराधासे कहा.

गोपियाँ बोलीं- रम्भोरु ! चन्द्रवदने ! मधु मानिनि! स्वामिनि ! ललने! श्रीराधे! हमारी यह सुन्दर बात सुनो. ये व्रजभूषण नन्दनन्दन तुम्हारी बरसाना-नगरी दिव्यादिव्य, त्रिगुणवृत्तिमयी भूतल गोपियों का वर्णन तथा श्रीराधा सहित गोपियों की श्रीकृष्ण के साथ होली खेलने आए हैं.

एक श्लोक है : –

श्रीयौवनोन्मदविघूर्णितलोचनोऽसौ नीलालकालिकलितांसकपोलगोलः । ध्वनिमता स्वपदारुणेन ॥

सत्पीतकञ्शुकधनान्तमशेषमारादाचालयन्

बालार्कमौलिविमलाङ्गदहारमुद्य‌द्विद्युत्क्षिपन्मकरकुण्डलमादधानः

पीताम्बरेण जयति द्युतिमण्डलोऽसौ भूमण्डले स धनुषेव घनो दिविस्थः ।। आबीरकुङ्कुमरसैश्च विलिप्तदेहो हस्ते गृहीतनवसेचनयन्त्र आरात् . प्रेक्षंस्तवाशु सखि वाटमतीव राधे त्वद्रासरङ्गरसकेलिरतः स्थितः सः ॥ (गर्ग संहिता, माधुर्य खण्ड 12.8-10)

अर्थ – शोभा सम्पन्न यौवन के मद से मतवाले उनके चञ्चल नेत्र घूम रहे हैं. घुँघराली नीली अलकावली उनके कंधों और कपोलमण्डल को चूम रही हैं. शरीर पर पीले रंग का रेशमी जामा अपनी घनी शोभा बिखेर रहा हैं. वे बजते हुए नूपुरों की ध्वनि से सबका ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं. उनके मस्तक पर बालरवि के समान कान्तिमान् मुकुट हैं.

अबीर और केसर के रस से उनका सारा अङ्ग लिप्त हैं. उन्होंने हाथ में नयी पिचकारी ले रखी है तथा तुम्हारे साथ रासरङ् की रसमयी क्रीडा में निमग्र रहनेवाले वे श्यामसुन्दर तुम्हारे शीघ्र निकलने की राह देखते हुए पास ही खड़े हैं. तुम भी मान छोड़कर फगुआ (होली) के बहाने निकलो.

निश्चय ही आज होलिका को यश देना चाहिये और अपने भवन में तुरंत ही रंग-मिश्रित जल, चन्दन के मकरन्द (इत्र आदि पुष्परस) का अधिक मात्रा में संचय कर लेना चाहिये! उठो और सहसा अपनी सखीमण्डली के साथ उस स्थान पर चलो, जहाँ वे श्यामसुन्दर भी मौजूद हों. ऐसा समय फिर कभी नहीं मिलेगा. बहती धारा में हाथ धो लेना चाहिये- यह कहावत सर्वत्र विदित हैं.

श्रीनारदजी कहते हैं- कि तब मानवती राधा मान छोड़कर उठीं और सखियों के समूह से घिरकर होलीका उत्सव मनाने के लिये निकलीं. चन्दन, अगर, कस्तूरी, हल्दी तथा केसर के घोलसे भरी हुई डोलचियाँ लिये वे बहुसंख्यक व्रजाङ्गनाएँ एक साथ होकर चलीं. रंगे हुए लाल-लाल हाथ, वासन्ती रंग के पीले वस्त्र, बजते हुए नूपुरों से युक्त पैर तथा झनकारती हुई करधनी से सुशोभित कटिप्रदेश बड़ी मनोहर शोभा थी उन गोपाङ्गनाओं की.

वे हास्ययुक्त गालियों से सुशोभित होली के गीत गा रही थीं. अबीर, गुलाल के चूर्ण मुट्ठियोंमें ले लेकर इधर-उधर फेंकती हुई वे ब्रजाङ्गनाएँ भूमि, आकाश और वस्त्र को लाल किये देती थीं. अबीर की करोड़ों मुट्ठियाँ एक साथ उड़ती थीं. सुगन्धित गुलाल के चूर्ण भी कोटि-कोटि हार्थो से बिखेरे जाते थे.

इसी समय व्रजगोपियों ने श्रीकृष्ण को चारों ओर से घेर लिया, मानो सावन की साँझ में विद्युन्मालाओं ने मेघ को सब ओर से अवरुद्ध कर लिया हो. वहाँ जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके भगवान कृष्ण भी उनके साथ होली खेलने लगे. श्रीराधा ने श्रीकृष्ण के नेत्रों में काजल लगा दिया.

श्रीकृष्ण ने भी अपना नया उत्तरीय (दुपट्टा) गोपियों को उपहार में दे दिया. फिर वे परमेश्वर श्रीनन्दभवन को लौट गये. उस समय समस्त देवता उनके ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे. इसी लिए वृंदावन में होली आज भी धूम–धाम से मचाई जाती हैं.

अलावा इसके एक और बात पर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि होली का अर्थ यह नहीं कि आप भांग और दारू का आनंद उठाएं ऐसा कोई भी शस्त्रों मे वर्णित हैं. उपर्युक्त उदाहरण से ज्ञात हो ही गया है कि होली में किसी भी प्रकार का नशा करने का उल्लेख नहीं.

फिर यह कुप्रथा कहाँ से आयी? होली आनंद का त्यौहार है और उसे इसी रूप मे मनाना चाहिए. लोकाचार मे लोग कभी पिचकारी से रंग डालते है अथवा गुलाल अबीर एक दूसरे के चेहरे पर मलते हैं. कहीं फाग गाया जाता है तो कहीं ढोलक कि थाप पर पैर थिरकने लगते हैं. ये है होली का वर्तमान स्वरुप.

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नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

मुंबई के रहने वाले अंशुल पांडेय धार्मिक और अध्यात्मिक विषयों के जानकार हैं. 'द ऑथेंटिक कॉंसेप्ट ऑफ शिवा' के लेखक अंशुल के सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म और समाचार पत्रों में लिखते रहते हैं. सनातन धर्म पर इनका विशेष अध्ययन है. पौराणिक ग्रंथ, वेद, शास्त्रों में इनकी विशेष रूचि है, अपने लेखन के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रहें.
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