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Ramayan: एक फैसला जिसने अयोध्या के भावी राजा को राजमहल छोड़ तपस्वी बना दिया

Ramayan: भरत की कहानी सिखाती है कि महानता सत्ता पाने में नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ का त्याग कर धर्म और रिश्तों का सम्मान करने में होती है. आज भी आदर्श भाई के रूप में लिया जाता है.

Ramayan: क्या कोई बेटा अपनी ही मां के फैसले का विरोध कर सकता है? क्या कोई राजकुमार अपने सामने रखा पूरा साम्राज्य ठुकरा सकता है? और क्या कोई भाई अपने भाई के लिए 14 साल तक तपस्वी जैसा जीवन जी सकता है?

श्रीरामायण में एक ऐसा ही चरित्र है, जिसका नाम है भरत. भगवान श्रीश्रीराम के छोटे भाई भरत को अक्सर लोग सिर्फ एक सेवक पात्र मान लेते हैं, लेकिन सच यह है कि उनका त्याग और धर्मनिष्ठा उन्हें श्रीरामायण के सबसे महान पात्रों में शामिल करती है.

जिस मां ने उन्हें अयोध्या का राजा बनाने के लिए सब कुछ किया, उसी मां के निर्णय का भरत ने खुलकर विरोध किया. उन्होंने सत्ता नहीं, धर्म चुना, राजसिंहासन नहीं, भाई का सम्मान चुना. यही वजह है कि आज भी भरत को आदर्श भाई का प्रतीक माना जाता है.

भरत जैसा भाई क्यों नहीं हुआ दूसरा? जिसने सगी मां से भी ऊपर रखा धर्म

जब भरत अपने ननिहाल से अयोध्या लौटे, तो उनके सामने एक ऐसा सच आया जिसने उनकी दुनिया ही बदल दी. उन्हें पता चला कि उनकी मां कैकेयी ने अपने दो वरदानों के दम पर श्रीश्रीराम को 14 वर्षों के वनवास पर भेज दिया है. इतना ही नहीं, श्रीराम के वियोग में राजा दशरथ भी प्राण त्याग चुके हैं और अब अयोध्या का सिंहासन भरत के लिए तैयार है.

यह सुनकर भरत के मन में खुशी नहीं, बल्कि गहरा दुख और पश्चाताप उमड़ पड़ा था. जिस राज्य को पाने का सपना कोई भी राजकुमार देख सकता था, वही राज्य उन्हें बोझ और अन्याय का प्रतीक लगने लगा था. उन्होंने अपनी ही मां के सामने खड़े होकर साफ कहा कि ऐसा सिंहासन उन्हें स्वीकार नहीं हैं, जिसकी कीमत उनके भाई का वनवास और पिता की मृत्यु हो. भरत ने कैकेयी के निर्णय का समर्थन करने के बजाय धर्म और न्याय का साथ चुना. 


Ramayan: एक फैसला जिसने अयोध्या के भावी राजा को राजमहल छोड़ तपस्वी बना दिया

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उसी वक्त उन्होंने साबित कर दिया कि सच्चे रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और धर्म के पालन से महान बनते हैं. यही वह पल था जिसने भरत को एक साधारण राजकुमार से इतिहास के सबसे आदर्श और प्रेरणादायक भाइयों में शामिल कर दिया था.

14 वर्षों तक निभाया ऐसा वचन, जो आज भी प्रेरणा देता है

भरत के सामने एक तरफ अयोध्या का राजसिंहासन था और दूसरी तरफ उनके बड़े भाई श्रीश्रीराम का अधिकार. जब उन्हें पता चला कि माता कैकेयी ने श्रीराम को वनवास भेजकर उनके लिए राज्य मांगा है, तो उन्होंने इसे सौभाग्य नहीं बल्कि अपना अन्याय माना था. भरत ने अपनी मां के निर्णय का विरोध किया और साफ रूप से यह कह दिया कि श्रीराम के बिना अयोध्या का सिंहासन उन्हें स्वीकार नहीं है.

इसके बाद वे खुद श्रीश्रीराम को वापस लाने के लिए वन पहुंचे थे, लेकिन जब श्रीश्रीराम ने पिता के वचन का पालन करने की बात कही, तो भरत ने उनकी चरण पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटने का निर्णय लिया.

अयोध्या पहुंचकर भरत ने श्रीश्रीराम की खड़ाऊँ को सिंहासन पर स्थापित कर दिया और खुद को केवल उनका प्रतिनिधि माना. उन्होंने राजसी सुखों का त्याग कर नंदिग्श्रीराम में तपस्वी जैसा जीवन बिताया और 14 वर्षों तक श्रीराम की वापसी की प्रतीक्षा करते रहे थे. भरत का यह त्याग बताता है कि सच्ची महानता सत्ता पाने में नहीं, बल्कि धर्म, प्रेम और रिश्तों के सम्मान के लिए अपने स्वार्थ का त्याग करने में होती है.

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अणिमा शुक्ला | डिजिटल पत्रकार (इंटर्न), ABP Live धर्म-एस्ट्रो सेक्शन

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