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When to Replace Underwear: कितने दिन बाद फेंक देना चाहिए पुराना अंडरवियर, कब बन जाता है यह बीमारी की वजह?

Bacterial Infection Risk: अंडरवियर हमारे शरीर के सबसे ज्यादा करीब होता है, यही कारण है कि समय- समय पर इसको बदलना काफी जरूरी हो जाता है, वरना इंफेक्शन का खतना बना रहता है.

How Often Should You Replace Underwear:कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो हमारे शरीर के संपर्क में हमेशा होती हैं, उनमें एक है अंडरगारमेंट्स. बाहरी कपड़ों के उल्टा, इनरवियर सीधे पसीने, बैक्टीरिया, डेड बॉडी सेल्स और शरीर की गंध के संपर्क में रहते हैं. अधिकतर लोग इन्हें नियमित रूप से धोते तो हैं, लेकिन एक्सपर्ट का का कहना है कि सिर्फ धोना ही काफी नहीं है. चलिए आपको बताते हैं कि कितने महीने या साल बाद आपको अपना अंडरवियर बदल लेना चाहिए. 

एक्सपर्ट के अनुसार, अंडरगारमेंट्स की भी एक तय उम्र होती है. भले ही वे ऊपर से साफ और ठीक दिखें, लेकिन उन्हें हमेशा के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. आमतौर पर सलाह दी जाती है कि हर 6 से 12 महीने में इनरवियर बदल देना चाहिए. समय के साथ कपड़े के रेशों में ऐसे बदलाव आने लगते हैं जो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बना देते हैं.

क्या होते हैं नुकसान?

पुराने या ठीक से साफ न किए गए अंडरगारमेंट्स पहनने से त्वचा में जलन, खुजली, इंफेक्शन और अन्य हाइजीन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. समय-समय पर बदलना भी काफी अहम है. एम्स , हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड से प्रशिक्षित एक प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और लिवर एक्सपर्ट डॉ. सौरभ सेठी  के अनुसार, हर एक इस्तेमाल के बाद इसको साफ करना जरूरी होता है.

 

 
 
 
 
 
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बदलना क्यों जरूरी?

दरअसल, लगातार इस्तेमाल और धुलाई के कारण कपड़े के रेशों में छोटे छेद बनने लगते हैं. इन बेहद छोटे छेदों में बैक्टीरिया, फंगस, डेड स्किन और शारीरिक द्रव फंस सकते हैं, जिन्हें सामान्य धुलाई से पूरी तरह हटाना संभव नहीं होता. यही जमा गंदगी दुर्गंध और त्वचा संक्रमण का कारण बन सकती है. कुछ संकेत ऐसे भी होते हैं जो बताते हैं कि अब अंडरगारमेंट बदलने का समय आ गया है. यदि इलास्टिक ढीली हो जाए, कपड़ा पतला पड़ने लगे या छोटे-छोटे छेद दिखने लगें, तो समझिए उसे बदलना चाहिए. जिद्दी दाग, जो धुलने के बाद भी बने रहें, या धोने के बाद भी आने वाली बदबू भी इस बात का संकेत है कि कपड़ा अपनी क्वालिटी खो चुका है. रंग फीका पड़ना भी फैब्रिक के खराब होने का इशारा है.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की सलाह है कि अंडरगारमेंट्स रोज बदले जाएं, खासकर तब जब अधिक पसीना आता हो या मौसम गर्म हो. वहीं मायो क्लीनिक भी कहता है कि गर्म, नम या धूलभरे माहौल में इनरवियर दिन में एक से ज्यादा बार बदलना पड़ सकता है. शरीर की गर्मी, नमी और रगड़ माइक्रोबियल ग्रोथ के लिए अनुकूल माहौल बनाते हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है।

फैब्रिक का चुनाव भी महत्वपूर्ण है. रिसर्च बताते हैं कि कॉटन जैसे प्राकृतिक और सांस लेने वाले कपड़े त्वचा के लिए बेहतर होते हैं. ये नमी को सोखते हैं और हवा का फ्लो बनाए रखते हैं, जिससे यीस्ट और बैक्टीरियल इंफेक्शन का खतरा कम होता है. इसके विपरीत, सिंथेटिक कपड़े नमी को फंसा सकते हैं और जलन या एलर्जी की संभावना बढ़ा सकते हैं.

ये भी पढ़ें: RSV से हर साल 100000 बच्चों की होती है मौत, WHO के हिसाब से जानें कब लगवाएं इसकी वैक्सीन?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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About the author सोनम

जर्नलिज्म की दुनिया में करीब 15 साल बिता चुकीं सोनम की अपनी अलग पहचान है. वह खुद ट्रैवल की शौकीन हैं और यही वजह है कि अपने पाठकों को नई-नई जगहों से रूबरू कराने का माद्दा रखती हैं. लाइफस्टाइल और हेल्थ जैसी बीट्स में उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल रीडर्स का ध्यान खींचा है, बल्कि अपनी विश्वसनीय जगह भी कायम की है. उनकी लेखन शैली में गहराई, संवेदनशीलता और प्रामाणिकता का अनूठा कॉम्बिनेशन नजर आता है, जिससे रीडर्स को नई-नई जानकारी मिलती हैं. 

लखनऊ यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में ग्रैजुएशन रहने वाली सोनम ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत भी नवाबों के इसी शहर से की. अमर उजाला में उन्होंने बतौर इंटर्न अपना करियर शुरू किया. इसके बाद दैनिक जागरण के आईनेक्स्ट में भी उन्होंने काफी वक्त तक काम किया. फिलहाल, वह एबीपी लाइव वेबसाइट में लाइफस्टाइल डेस्क पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही हैं.

ट्रैवल उनका इंटरेस्ट  एरिया है, जिसके चलते वह न केवल लोकप्रिय टूरिस्ट प्लेसेज के अनछुए पहलुओं से रीडर्स को रूबरू कराती हैं, बल्कि ऑफबीट डेस्टिनेशन्स के बारे में भी जानकारी देती हैं. हेल्थ बीट पर उनके लेख वैज्ञानिक तथ्यों और सामान्य पाठकों की समझ के बीच बैलेंस बनाते हैं. सोशल मीडिया पर भी सोनम काफी एक्टिव रहती हैं और अपने आर्टिकल और ट्रैवल एक्सपीरियंस शेयर करती रहती हैं.

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