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CRISPR Blood Test For Cancer: क्या ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कैंसर, ट्यूमर बनने से पहले कैसे पता लगेगी दिक्कत?

शेनजेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हान झांग और रिसर्चर्स ने डीएनए नैनोस्ट्रक्चर, क्वांटम डॉट्स, क्रिसपर जीन-एडिटिंग तकनीक और सेकंड हार्मोनिक जनरेशन नामक ऑप्टिकल तकनीक को मिलाकर यह सिस्टम तैयार किया.

Can A Blood Test Detect Cancer Early: दुनियाभर में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इसके पीछे जो सबसे बड़ा रीजन है वह है कि इसके लक्षण जल्दी दिखाई नहीं देते हैं. तमाम तरह के जांच कराने के बाद इसका पता चलता है. हालांकि, अब एक साधारण ब्लड टेस्ट भविष्य में कैंसर का पता उस समय लगा सकता है. दरअसल साइंटिस्ट ने एक बेहद सेंसिटिव लाइट-आधारित सेंसर डिवेलप्ड किया है, जो खून में मौजूद कैंसर बायोमार्कर की अत्यंत सूक्ष्म मात्रा सब-एटोमोलर लेवल तक पहचान सकता है. यानी जांच के लिए सिर्फ कुछ मॉलिक्यूल की मौजूदगी ही काफी हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या खोज हुई है और यह तकनीक कैसे काम करती है. 

कैसे काम करता है यह?

Optica जर्नल में पब्लिश स्टडी के अनुसार, शेनजेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हान झांग की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने डीएनए नैनोस्ट्रक्चर, क्वांटम डॉट्स, क्रिसपर जीन-एडिटिंग तकनीक और सेकंड हार्मोनिक जनरेशन नामक एक ऑप्टिकल तकनीक को मिलाकर यह सिस्टम तैयार किया. यह तकनीक मरीज के खून में कैंसर से जुड़े माइक्रोआरएनए को पारंपरिक RT-qPCR से अधिक सेंसिटिविटी के साथ पहचानने में सक्षम रही.

अभी किस तरह होती हैं जांच?

अभी ज्यादातर शुरुआती जांच या तो इमेजिंग पर आधारित होती है, जिसमें ट्यूमर तब दिखता है जब वह एक निश्चित आकार ले चुका हो, या फिर पीसीआर जैसी तकनीकों पर, जो जेनेटिक सामग्री को कई गुना बढ़ाकर मापती हैं. नई तकनीक इन दोनों से अलग है. इसमें किसी केमिकल एम्प्लीफिकेशन की जरूरत नहीं पड़ती. जैसे ही कैंसर बायोमार्कर मौजूद होता है, लाइट सिग्नल में सीधा बदलाव आता है और वही जांच का आधार बनता है.

मॉलिक्यूल जीन को कंट्रोल करते हैं छोटे आरएनए

यह सेंसर खास तौर पर माइक्रोआरएनए पर ध्यान देता है.ये छोटे आरएनए मॉलिक्यूल जीन को नियंत्रित करते हैं. miR-21, miR-155 और miR-10b जैसे माइक्रोआरएनए लंग्स के कैंसर के शुरुआती चरण से जुड़े पाए गए हैं. शुरुआती अवस्था में इनकी मात्रा बेहद कम होती है, इसलिए इन्हें पकड़ने के लिए असाधारण संवेदनशीलता चाहिए. लैब में यह डिवाइस miR-21 को 168 जेप्टोमोलर तक की बेहद कम कंसंट्रेटेड पर भी पहचान सका, जो सामान्य सैंपल में महज कुछ दर्जन अणुओं के मॉलिक्यूल होती है. इसमें मोलिब्डेनम डिसल्फाइड की एक पतली परत का इस्तेमाल किया गया, जो SHG सिग्नल के लिए जानी जाती है.

एक्सपर्ट का मानना है कि यदि माइक्रोआरएनए को ट्यूमर बनने से पहले ही पकड़ा जा सके तो कैंसर स्क्रीनिंग का तरीका बदल सकता है. भविष्य में यह अन्य कैंसर, वायरल संक्रमण, बैक्टीरियल रोग और यहां तक कि अल्जाइमर जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों की पहचान में भी उपयोगी हो सकता है.

यह भी पढ़ें: क्या खाली पेट काम करता है दिमाग ज्यादा बेहतर? जानिए फास्टिंग का मेंटल हेल्थ पर असर और फायदे

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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About the author सोनम

जर्नलिज्म की दुनिया में करीब 15 साल बिता चुकीं सोनम की अपनी अलग पहचान है. वह खुद ट्रैवल की शौकीन हैं और यही वजह है कि अपने पाठकों को नई-नई जगहों से रूबरू कराने का माद्दा रखती हैं. लाइफस्टाइल और हेल्थ जैसी बीट्स में उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल रीडर्स का ध्यान खींचा है, बल्कि अपनी विश्वसनीय जगह भी कायम की है. उनकी लेखन शैली में गहराई, संवेदनशीलता और प्रामाणिकता का अनूठा कॉम्बिनेशन नजर आता है, जिससे रीडर्स को नई-नई जानकारी मिलती हैं. 

लखनऊ यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में ग्रैजुएशन रहने वाली सोनम ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत भी नवाबों के इसी शहर से की. अमर उजाला में उन्होंने बतौर इंटर्न अपना करियर शुरू किया. इसके बाद दैनिक जागरण के आईनेक्स्ट में भी उन्होंने काफी वक्त तक काम किया. फिलहाल, वह एबीपी लाइव वेबसाइट में लाइफस्टाइल डेस्क पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही हैं.

ट्रैवल उनका इंटरेस्ट  एरिया है, जिसके चलते वह न केवल लोकप्रिय टूरिस्ट प्लेसेज के अनछुए पहलुओं से रीडर्स को रूबरू कराती हैं, बल्कि ऑफबीट डेस्टिनेशन्स के बारे में भी जानकारी देती हैं. हेल्थ बीट पर उनके लेख वैज्ञानिक तथ्यों और सामान्य पाठकों की समझ के बीच बैलेंस बनाते हैं. सोशल मीडिया पर भी सोनम काफी एक्टिव रहती हैं और अपने आर्टिकल और ट्रैवल एक्सपीरियंस शेयर करती रहती हैं.

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