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Explained: IVF क्लीनिक में बच्चा बदली का खुलासा! कैसे गर्भाशय की जगह कांच की प्लेट पर बनता भ्रूण, भारत में क्यों बढ़ रहा चलन?

IVF Clinic Swapped Samples: WHO के मुताबिक, भारत में बांझपन से पीड़ित 3.9-16.8% कपल्स में से 8% को IVF जैसी महंगी तकनीक की जरूरत होती है. IVF का सक्सेस रेट 30% से 55% के बीच है.

गुरुग्राम के राहुल और मीनू राठौर के लिए 9 जनवरी 2026 की सुबह सबसे खुशी का दिन था. सालों की कोशिशों के बाद IVF की मदद से मीनू ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था. लेकिन जैसे-जैसे बच्चियां बड़ी होने लगीं तो पता चला कि बच्चियों का रंग-रूप न तो राहुल से और न ही मीनू से मिलता था. उन्होंने DNA टेस्ट कराया तो रिपोर्ट मैच नहीं हुई. यानी क्लिनिक ने उनका भ्रूण किसी और कपल के भ्रूण से बदल दिया था. जानेंगे क्या है मामला और IVF की दुनिया...

कोर्ट ने क्या कहा और आगे क्या?

राठौर दंपती ने दिल्ली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट ने पुलिस को केस दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया. राहुल ने मांग की कि क्लिनिक के IVF रिकॉर्ड, भ्रूण से जुड़े दस्तावेज, लैब डेटा, इलेक्ट्रॉनिक डेटा और CCTV फुटेज को जांच के लिए सुरक्षित रखा जाए. लेकिन अब तक पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है. राहुल का सवाल था, 'हमारे अपने बच्चे कहां हैं? हम वहां अपने बच्चों के लिए गए थे.' मीनू ने कहा, 'जिस तरह मैं अपने बच्चे की तलाश कर रही हूं, उसी तरह जिस मां का बच्चा मेरे पास है, वह भी अपने बच्चे को तरस रही होगी. मैं इन बच्चियों को दूध भी नहीं पिला पाती.'

इस बीच मीनू ने खुलासा किया कि उन्हें देश-विदेश के कई कपल्स के फोन आ रहे हैं, जिनके साथ भी IVF क्लिनिकों ने इसी तरह का धोखा किया है. इससे पहले नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) ने एक दिल्ली क्लिनिक पर 1.5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था.

आखिर IVF होता क्या है और कैसे किया जाता है?

IVF का पूरा नाम है 'इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन.' विट्रो का मतलब होता है 'कांच का', यानी यह प्रोसेस शरीर के अंदर नहीं, बल्कि कांच की पेट्री डिश (एक तरह की लैब की प्लेट) में होती है. इसके लिए महिला के अंडाशय से एग्ज निकाले जाते हैं. फिर लैब में इन अंडों को पुरुष के स्पर्म के साथ मिलाया जाता है. इस मिलन के बाद जो भ्रूण बनता है, उसे कुछ दिनों तक लैब में पाला जाता है और फिर महिला के गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है. पूरी प्रोसेस में करीब 2 से 3 हफ्ते लगते हैं.

IVF क्यों कराते हैं?

इंदिरा IVF के मुताबिक, जब कोई कपल एक साल तक कोशिश करने के बावजूद बच्चा पैदा नहीं कर पाता, तो उसे बांझपन कहते हैं. IVF इस बांझपन का सबसे कारगर इलाज है. इसका इस्तेमाल तब होता है जब:

  • महिला की फैलोपियन ट्यूब (जो अंडे को गर्भाशय तक पहुंचाती है) बंद या खराब हो.
  • ओवुलेशन (अंडे निकलने की प्रक्रिया) में दिक्कत हो.
  • एंडोमेट्रियोसिस (गर्भाशय के बाहर ऊतकों का बढ़ना) हो.
  • पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या या गुणवत्ता कम हो.
  • महिला की उम्र 40 से ज्यादा हो.
    किसी जेनेटिक बीमारी को रोकना हो.

IVF सेंटर की अंदर की तस्वीर क्या है?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, IVF लैब में सुरक्षा की कई लेयर्स होती हैं. लेकिन गुरुग्राम का मामला बताता है कि अगर इन सुरक्षा उपायों को नज़रअंदाज़ किया जाए, तो कितना बड़ा नुकसान हो सकता है:

  • लैब के सख्त नियम: IVF लैब को फर्टिलिटी सेंटर का दिल कहा जाता है. यहां अंडे, शुक्राणु और भ्रूण को संभाला जाता है. इस लैब में तापमान, हवा की क्वालिटी और नमी को बहुत सटीकता से कंट्रोल किया जाता है, क्योंकि शुरुआती दौर में भ्रूण बहुत नाजुक होते हैं.
  • इलेक्ट्रॉनिक विटनेसिंग सिस्टम: यह सबसे अहम सुरक्षा उपाय है. यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है जो हर मरीज के अंडों, शुक्राणुओं और भ्रूणों को हर स्टेज पर ट्रैक करती है. अगर किसी भी स्टेज पर कोई गड़बड़ी या बेमेल होता है, तो तुरंत अलर्ट आ जाता है और एम्ब्रियोलॉजिस्ट उसकी जांच करते हैं.
  • आर्ट एक्ट 2021 कानून: भारत सरकार ने 2021 में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट पास किया था. इस कानून का मकसद ART क्लीनिकों और बैंकों को रेगुलेट करना है, ताकि सुरक्षित और बेहतर तरीके से काम किया जा सके. इसके तहत हर ART क्लिनिक रजिस्टर्ड होना चाहिए. भ्रूण ट्रांसफर से पहले इलेक्ट्रॉनिक बारकोडिंग और दो इंडिपेंडेंट एम्ब्रियोलॉजिस्ट के अनिवार्य हस्ताक्षर जरूरी हैं. मरीजों की पहचान और सैंपल ट्रैकिंग की प्रोसेस सख्त है.

IVF सेंटर में बच्चों की अदला-बदली कितना मुमकिन है?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मॉडर्न टेक्नोलॉजी और सख्त नियमों की वजह से एक अच्छी क्लिनिक में बच्चों की अदला-बदली होने की संभावना बहुत कम है. इलेक्ट्रॉनिक बारकोडिंग, डबल-वेरिफिकेशन और रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम ऐसे उपाय हैं जो गलती की गुंजाइश को लगभग खत्म कर देते हैं. लेकिन गुरुग्राम का मामला साबित करता है कि 'लगभग नामुमकिन' का मतलब 'पूरी तरह असंभव' नहीं है. जब क्लिनिक नियमों को नजरअंदाज करते हैं, जब लापरवाही होती है या जब सिस्टम में सेंध लगाई जाती है, तो ऐसी घटनाएं हो सकती हैं.

भारत में कितने लोग IVF अपनाते हैं?

अपोलो फर्टिलिटी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 1.6 करोड़ से 2.2 करोड़ कपल बांझपन से पीड़ित हैं. हर साल सिर्फ 3-4 लाख IVF साइकल होते हैं और सिर्फ 1.5-2.2% कपल ही IVF तक पहुंच पाते हैं. यानी लगभग 98% बांझ कपल IVF का सहारा नहीं ले पाते.

WHO के मुताबिक, भारत में बांझपन से पीड़ित 3.9-16.8% कपल्स में से 8% को IVF जैसी महंगी तकनीक की जरूरत होती है. IVF का सक्सेस रेट 30% से 55% के बीच है. 35 साल से कम उम्र की महिलाओं में यह 65% तक हो सकती है, जबकि 40 से ज्यादा उम्र में यह 5-10% तक गिर जाती है.

एक IVF साइकल की कीमत 1.2 लाख रुपए से 3 लाख रुपए तक होती है. अगर एक खास तकनीक ICSI की जरूरत हो, तो 15,000-40,000 रुपए एक्सट्रा लगते हैं. सरकारी अस्पतालों में भी यह 1.1 लाख रुपए से कम नहीं है.

भारत किस तबके के लोग IVF अपनाते हैं?

IVF स्पेशलिस्ट और गायनोकॉलोजिस्ट डॉ. निताशा गुप्ता के मुताबिक, 5 तरह के कपल्स यह प्रोसेस करवाते हैं:

  • हाई-क्लास ग्रुप: IVF महंगा है, इसलिए ज्यादातर अमीर लोग ही इसे अपना पाते हैं. एक कपल के लिए 1.5-3 लाख रुपए का खर्च उठाना आसान नहीं है.
  • शहरी और पढ़े-लिखे लोग: तमिलनाडु में सबसे ज्यादा IVF क्लीनिक हैं, क्योंकि वहां प्रति व्यक्ति आय ज्यादा है और महिला शिक्षा का स्तर ऊंचा है.
  • मिडिल क्लास: 90% कपल IVF के खर्च में कर्ज में डूब जाते हैं. 57% कपल IVF इसलिए नहीं कराते क्योंकि यह बहुत महंगा है.
  • 30-35 साल की उम्र के कपल: ज्यादातर IVF कराने वाले कपल की उम्र 30-35 साल के बीच होती है.
  • डिंक कपल यानी डबल इनकम, नो किड्स: जो जानबूझकर बच्चे पैदा करने में देरी करते हैं और बाद में IVF का सहारा लेते हैं.

IVF का बाजार भारत में 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का हो चुका है. अकेले इंदिरा IVF कंपनी की सालाना कमाई 1,500 करोड़ रुपए से ज्यादा है.

क्यों बढ़ रहा है IVF का चलन?

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के मुताबिक, IVF का चलन बढ़ने की 4 बड़ी वजहें हैं:

  • बांझपन: बदलती जीवनशैली, तनाव, PCOS, STDs और एंडोमेट्रियल TB जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. शहरों में रहने वाले कपल्स में यह समस्या और भी गंभीर है.
  • देर से शादी: अब लोग पढ़ाई-लिखाई और करियर पर फोकस करते हैं, इसलिए शादी और बच्चे पैदा करने की उम्र बढ़ गई है. 40 साल के बाद प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है, इसलिए लोग IVF का सहारा लेते हैं.
  • बढ़ती जागरूकता: पहले लोग बांझपन छिपाते थे, लेकिन अब इसके बारे में खुलकर बात होती है. IVF के बारे में जानकारी आसानी से मिल जाती है.
  • बेहतर टेक्नोलॉजी: IVF की सफलता दर पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है. नई-नई तकनीकें आ रही हैं जो इसे और भी कारगर बना रही हैं.

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ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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