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बहरापन इन वजहों से बन सकता है जन्मजात दोष, बचने के लिए अपनाएं ये उपाय!

आज के समय में लोग कानों में ईयर फोन लगाकर या फिर हेडफोन लगाकर बहुत तेज आवाज में म्यूजिक सुनते हैं. ऐसे में अगर आपका साउंड लेवल ज्यादा है तो ये आपके कानों को नुकसान पहुंचा सकता है.

नई दिल्लीः आज के समय में लोग कानों में ईयर फोन लगाकर या फिर हेडफोन लगाकर बहुत तेज आवाज में म्यूजिक सुनते हैं. ऐसे में अगर आपका साउंड लेवल ज्यादा है तो ये आपके कानों को नुकसान पहुंचा सकता है. इस बारे में एबीपी न्यूज़ की संवाददाता रत्ना शुक्ला ने आईएमए अध्यक्ष डॉ. के.के.अग्रवाल से बात की और जाना कि साउंड का डेसिबल कितना होना चाहिए और बहरेपन से युवाओं को कैसे बचाया जा सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट- डॉ. के.के.अग्रवाल का कहना है कि 8 घंटे तक 80 डेसिबल आपकी लिमिट है इससे ज्यादा साउंड आपके कान सहन नहीं कर पाएंगे. अगर 80 डेसिबल से ज्यादा साउंड है तो आपको हियरिंग लॉस हो सकता है. 80 से 85 डेसिबल गया तो 4 घंटे, 85 से 90 में गया तो 2 घंटे रह गए. 95 डेसिबल हुआ तो 1 घंटा रह गया. 100 से ऊपर गया तो आधा घंटा रह गया. उससे अधिक गया तो आप 15 मिनट तक की लाउड म्यूजिक सुन पाएंगे. यानि आप डीजे पर जाना चाहते हैं लाउड म्यूजिक के साथ आप 15 मिनट से ज्यादा लाउडनेस को सहन नहीं कर पाएंगे. आपके कान भी डैमेज हो सकते हैं. ऐसे में आप ईयर प्लग्स लगा कर जाएं.

क्या कहना है WHO का- वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) सलाह देता है कि 30 से 35 डेसिबल से ज्यादा साउंड नहीं होना चाहिए. भारत में ये 40 से 50 डेसिबल तक होता है. कॉन्फ्रेंस में 80 से 90 डेसबिल तक साउंड होता है. ऐसे में आप 1-2 घंटे से ज्यादा वहां फोकस नहीं कर पाएंगे. आपको अपने कान ठीक रखने है और बहरेपन से बचना है तो आपको खुद को हाई नॉयस लेवल से बचाना होगा.

कानों को डैमेज होने से बचाने के लिए रेडियो का वॉल्यूम 50 पर्सेंट से कम रखें. फोन का वॉल्यूम, ईयरफोन का वॉल्यूएम 50 पर्सेंट से कम रखें.

डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि जब भी आप घर खरीदें तो इस बात का ध्यान रखें कि वहां का नॉयज़ और एयर पॉल्यूशन कितना है.

ईयर प्लग है इलाज- डॉ. बताते हैं कि एयर प्लेन में सबसे ज्यादा कानों को नुकसान होता है इसलिए वहां ईयर प्लग्स को प्रमोट किया जाता है. ऐसे में आप अपने कानों को डैमेज होने से बचाना चाहते हैं तो ईयर प्‍लग्स‍ का इस्तेमाल करें.

बहरेपन की जांच - डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि कई बार बहरापन आनुवांशिक या फिर किसी जन्मजात दोष के कारण भी होता है. हां, बच्चों में बहरापन जांचने के लिए पारंपरिक तौर पर कटोरी-चम्मच से टेस्ट किया जाता है. इससे ये जांचा जाता है कि बच्चा आवाज सुन रहा है या नहीं. अगर बच्चा सुनने में सक्षम नहीं है तो बच्चों के कई टेस्ट होते हैं.

रूबेला बीमारी-   कई बार मां को प्रेग्नेंसी के दौरान वायरल बीमारी हो तो बच्चों को बहरापन जन्माजात हो सकता है. खासतौर पर रूबेला बीमारी. ऐसे में बच्चों के अंदर बहरेपन को पहले ही पहचानना बहुत जरूरी है ताकि बच्चे की डवलपमेंट सही तरह से हो सके.

रूबेला के लक्षण- पहली तिमाही में गर्भवती महिलाओं को यदि बुखार होता है, बुखार के साथ रैशेज आते हैं और कान के पीछे उनके ग्लैंड बनती हैं तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें ये रूबेला के लक्षण हो सकते हैं. इससे बच्चे में बहरापन आ सकता है.

रूबेला का इलाज- रूबेला बीमारी के लक्षण देखकर डॉक्टर इसका इलाज करते हैं. कई बार रूबेला बीमारी गंभीर रूप लेती है तो डॉक्टर गर्भपात तक की सलाह दे देते हैं.

रूबेला वैक्सीनेशन- डॉ. के.के.अग्रवाल सलाह देते हैं कि सभी महिलाओं जिनकी शादी की उम्र नहीं है उन्हें रूबेला का इंजेक्शन लगवाना चाहिए.

नोट: ये एक्सपर्ट के दावे पर हैं. ABP न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता. आप किसी भी सुझाव पर अमल या इलाज शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें.

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