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Dopamine Burnout: क्या सब कुछ होते हुए भी लगता है खालीपन? जानिए क्या होता है 'डोपामिन बर्नआउट'

Effects Of Social Media On Brain Chemistry: डोपामिन को आमतौर पर फील गुड केमिकल कहा जाता है, लेकिन असल में यह खुशी से ज्यादा मोटिवेशन और एक्सपेक्टेशन से जुड़ा होता है.

How To Reset Dopamine Levels Naturally: आज की तेज रफ्तार जिंदगी में एक अजीब सा बदलाव महसूस हो रहा है. पहले छोटी-छोटी चीजें भी खुशी दे जाती थीं. किसी दोस्त का मैसेज, वीकेंड का प्लान या पसंदीदा खाना भी मूड अच्छा कर देता था. लेकिन अब वही चीजें उतनी खास नहीं लगतीं. जैसे सब कुछ होते हुए भी अंदर से कोई खालीपन सा महसूस होता है.  इस बदलाव को अक्सर लोग तनाव या उम्र बढ़ने का असर मान लेते हैं, लेकिन इसके पीछे एक गहरी वजह हो सकती है, जिसे आजकल डोपामिन बर्नआउट कहा जा रहा है. यह कोई आधिकारिक बीमारी नहीं है, लेकिन इसका अनुभव बिल्कुल वास्तविक है. 

क्या होता है डोपामिन 

clevelandclinic के अनुसार, डोपामिन को आमतौर पर फील गुड केमिकल कहा जाता है, लेकिन असल में यह खुशी से ज्यादा मोटिवेशन और एक्सपेक्टेशन से जुड़ा होता है. यही हमें नई चीजें करने, खोजने और बार-बार कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है. जब दिमाग लगातार तेज़ और आसान उत्तेजनाओं के संपर्क में रहता है, तो धीरे-धीरे इसकी संवेदनशीलता कम होने लगती है. मतलब, जितनी ज्यादा उत्तेजना मिलेगी, उतनी ही कम उसका असर महसूस होगा. 

बिगड़ रहा है ब्रेन का संतुलन

आज की डिजिटल दुनिया में हर समय कुछ न कुछ नया देखने को मिल जाता है. छोटे वीडियो, नोटिफिकेशन और लगातार स्क्रॉल करने की आदत दिमाग को तुरंत मिलने वाले छोटे-छोटे रिवॉर्ड्स की आदत डाल देती है. पहले जहां मेहनत के बाद खुशी मिलती थी, अब बिना मेहनत के सब कुछ तुरंत उपलब्ध है. इससे दिमाग का मेहनत और इनाम वाला संतुलन बिगड़ जाता है. 

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तनाव और थकान का भी असर

इसके साथ ही लगातार तनाव और थकान भी डोपामिन सिस्टम को प्रभावित करते हैं. जब शरीर थका होता है, तो दिमाग का फोकस सिर्फ सर्वाइव करने पर रहता है, न कि खुशी महसूस करने पर. ऊपर से सोशल मीडिया पर दूसरों की सजी-धजी जिंदगी देखकर अपनी सामान्य जिंदगी भी कमतर लगने लगती है.

क्या होते हैं इसके संकेत

डोपामिन बर्नआउट के संकेत धीरे-धीरे सामने आते हैं. जो चीजें पहले अच्छी लगती थीं, वे अब फीकी लगने लगती हैं. मोटिवेशन कम हो जाता है, ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है और बिना वजह बेचैनी बनी रहती है. इससे बाहर निकलने के लिए किसी कठोर बदलाव की जरूरत नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे संतुलन बनाने की जरूरत होती है. सबसे पहले लगातार मिलने वाली आसान उत्तेजनाओं को थोड़ा कम करना चाहिए. मोबाइल या स्क्रीन टाइम घटाने से फर्क पड़ता है.  इसके साथ ही ऐसी गतिविधियों को शामिल करना जरूरी है जिनमें मेहनत लगती हो, जैसे चलना, पढ़ना या कुछ नया सीखना.  बोरियत को भी थोड़ा जगह देना जरूरी है, क्योंकि वहीं से दिमाग फिर से सामान्य संवेदनशीलता हासिल करता है.  अच्छी नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि भी इसमें मदद करती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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