मणिपुर में एक-दूसरे के दुश्मन क्यों हैं कुकी और नगा समुदाय? जानें वजह
मणिपुर में जारी हिंसा का मुख्य कारण मैतेई समुदाय को एसटी दर्जे की मांग, जमीन खरीदने से जुड़े असमान कानून और इंफाल घाटी तथा पहाड़ी इलाकों के बीच आबादी व अधिकारों का पुराना असंतोष है.

- कुकी-नागा जनजातियाँ मैतेई के दर्जे को लेकर चिंतित हैं।
मणिपुर में पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से जारी हिंसा और तनाव यह बताने के लिए काफी है कि पूर्वोत्तर का यह खूबसूरत राज्य किस कदर गहरे सामाजिक असंतोष की आग में झुलस रहा है. शांति बहाली के तमाम दावों और प्रयासों के बावजूद हालात सामान्य होने का नाम नहीं ले रहे हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि शासन व्यवस्था या तो इस जटिल समस्या का स्थाई समाधान ढूंढने में असमर्थ है या फिर पहाड़ी और घाटी के समुदायों के बीच गहरे मतभेदों को सुलझाने के प्रति उदासीन है. इस पूरे संकट को गहराई से समझने के लिए राज्य के तीन मुख्य समुदायों - कुकी, नगा और मैतेई - के आपसी रिश्तों, उनके ऐतिहासिक इतिहास, राजनीतिक प्रभुत्व और जमीनी कानूनों से जुड़े विवादों का अध्ययन करना बेहद आवश्यक है.
कुकी और नगा समुदायों की पहचान
कुकी और नगा दोनों ही पूर्वोत्तर भारत की प्रमुख जनजातियां हैं, जो मुख्य रूप से पहाड़ी इलाकों में निवास करती हैं. कुकी समुदाय भारत के मणिपुर और मिजोरम के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों के अलावा म्यांमार और बांग्लादेश के पहाड़ी इलाकों में भी फैला हुआ है. अरुणाचल प्रदेश को छोड़ दें तो उत्तर-पूर्वी भारत के लगभग हर राज्य में कुकी समुदाय के लोग पाए जाते हैं. मणिपुर की कुल जनसंख्या में कुकी और नगा समुदाय की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है. हालांकि, आबादी में 40 फीसदी होने के बावजूद राज्य के लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ी भू-भाग पर इन्हीं दोनों जनजातियों का नियंत्रण और निवास है.
इंफाल घाटी का बहुसंख्यक मैतेई समुदाय
मणिपुर की जनसांख्यिकी में मैतेई समुदाय सबसे बड़ा सामाजिक समूह है, जिसे आमतौर पर मणिपुरी भी कहा जाता है. राज्य की राजधानी इंफाल और उसके आसपास का मैदानी यानी घाटी क्षेत्र मैतेई समुदाय का मुख्य गढ़ है. वर्ष 2011 की आधिकारिक जनगणना के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में मैतेई समुदाय का हिस्सा 64.6 प्रतिशत है. इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का मात्र 10 प्रतिशत हिस्सा ही इनके पास है. धार्मिक दृष्टिकोण से मैतेई समुदाय के अधिकांश लोग हिंदू धर्म का पालन करते हैं, जबकि कुकी और नगा मुख्य रूप से ईसाई धर्म से जुड़े हैं. राज्य में हिंदू और ईसाई दोनों ही लगभग 41-41 प्रतिशत हैं.
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राजनीतिक वर्चस्व और सत्ता में मैतेई की पकड़
आबादी में बड़ा होने के साथ-साथ मैतेई समुदाय का मणिपुर की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पूरा नियंत्रण है. राज्य विधानसभा की कुल 60 सीटों में से 40 सीटें इंफाल घाटी क्षेत्र से आती हैं, जहां मैतेई समुदाय का भारी दबदबा है. यही वजह है कि राज्य की राजनीति में इनका प्रतिनिधित्व सबसे अधिक रहता है. मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भी मैतेई समुदाय से ही संबंध रखते हैं. इसके अलावा, शिक्षा, व्यापार और सरकारी नौकरियों में भी कुकी और नगा समुदायों की तुलना में मैतेई समाज के लोग कहीं अधिक समृद्ध और आगे हैं, जिससे उनके पास राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से ज्यादा ताकत आ जाती है.
कुकी और नगा की दुश्मनी क्यों?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो कुकी और नगा समुदायों के बीच पुरानी दुश्मनी रही है. 1993 में दोनों के बीच हुए भयानक जातीय संघर्ष में सैकड़ों कुकी मारे गए थे. हालांकि, मैतेई समुदाय के खिलाफ दोनों जनजातियां एकजुट हो जाती हैं. ऐतिहासिक रूप से, मैतेई राजाओं ने नगा हमलों से बचाव के लिए कुकी समुदाय को पहाड़ियों में एक 'बफर' के रूप में बसाया था. वर्तमान में कुकी और मैतेई के बीच असली फसाद की जड़ अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा है. पहाड़ी क्षेत्र के कुकी और नगा पहले से ही एसटी सूची में शामिल हैं, जबकि मैतेई इसमें शामिल नहीं हैं. हाईकोर्ट द्वारा मैतेई को एसटी दर्जे पर विचार करने के निर्देश के बाद विवाद भड़क उठा. कुकी-नगा को डर है कि मैतेई के एसटी बनने से उनकी नौकरियां और जमीन के अधिकार छिन जाएंगे.

मणिपुर का कानून भी है वजह
मणिपुर के इस जातीय संघर्ष में वहां का भूमि कानून भी एक बहुत बड़ा मुद्दा है. मौजूदा कानूनों के अनुसार, घाटी में रहने वाले मैतेई समुदाय के लोग पहाड़ी इलाकों में न तो जमीन खरीद सकते हैं और न ही वहां जाकर बस सकते हैं. इसके विपरीत, पहाड़ियों में रहने वाले कुकी और नगा समुदायों के लोगों को इंफाल घाटी में जमीन खरीदने, कारोबार करने और बसने की पूरी कानूनी छूट है. मैतेई समुदाय लंबे समय से इस कानून को असमान और भेदभावपूर्ण मानता आया है. उनका कहना है कि 10 फीसदी जमीन पर राज्य की 65 फीसदी आबादी को सीमित कर देना अनुचित है, और यही असंतोष आज हिंसा का मुख्य कारण बना हुआ है.
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