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खेती में यूरीन का इस्तेमाल क्यों कर रहे इस देश के किसान, जानें फसलों को कितना होता है फायदा?

यूरीन में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि मानक सिंथेटिक उर्वरक के बजाय यूरीन का इस्तेमाल करने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी कम होता है.

Uses of Human Urine in Agriculture: टेक्नोलॉजी के प्रयोग ने खेती के तरीकों में भी बहुत बदलाव किया है. एक समय था जब किसान खेतों की उर्वरकता बढाने के लिए पारंपरिक तरीके पर निर्भर थे, लेकिन अब रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ गया है. हालांकि, इसके इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों का भी खतरा बढ़ा है. 

प्राचीन रोम और चीन की बात करें तो यहां यूरीन (पेशाब) का प्रयोग उर्वरक के रूप में किया जाता था. इससे बनने वाली खाद न केवल उपज को दोगुना कर देती थी, बल्कि कम उर्वरकता वाली मिट्टी की भी उपज में सुधार होता था. अब इस पुराने खेती के तरीके को दोबारा अमल में लाया जा रहा है, जिससे बिना कीटनाशकों और रासायनिक खाद का प्रयोग के फसलों की उपज को बढ़ाया जा सके. 

यहां के किसान अपना रहे पुरानी प्रथा

पूर्वोत्तर अमेरिकी राज्य है वर्मोंट. यहां के किसान फसल को बढ़ावा देने और अधिक टिकाऊ तरीके के इस्तेमाल से फसल उगाने की पुरानी प्रथा को वापस अपना रहे हैं. इस राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में यूरीन न्यूट्रीएंट रीक्लेमेशन प्रोग्राम (UNRP) चलाया जा रहा है, जिसके तहत करीब 250 पड़ोसी हर साल 12,000 गैलन (45,400 लीटर) यूरीन दान करते हैं, जिसे रीसाइकिल किया जाता है. इस यूरीन को 90 सेकंड के लिए 80C (176F) तक गर्म करके पाश्चुरीकृत किया जाता है, जिसके बाद इसे एक पाश्चुरीकृत टैंक में संग्रहीत किया जाता है, जिसे फसलों की उर्वरकता बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है. 

फसलों को कितना होता है फायदा

इंसानों की यूरीन के बारे में हुई स्टडी में वैज्ञानिकों को पता चला है कि इसके प्रयोग से बिना किसी खाद के केल और पालक जैसी फसलों की उपज को दोगुना किया जा सकता है. इतना ही नहीं कम उर्वरता वाली मिट्टी की उपज को सुधारा जा सकता है. दरअसल, यूरीन में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि मानक सिंथेटिक उर्वरक के बजाय यूरीन का इस्तेमाल करने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी कम होता है.

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प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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