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न्यूक्लियर प्लांट को ही क्यों टारगेट करते हैं दुश्मन देश, जानें इस पर हमला क्यों समझा जाता है जंग के मैदान में जीत?

UAE के बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हुए ड्रोन हमले ने पूरी दुनिया को हिला दिया है. जानिए क्यों युद्ध के दौरान परमाणु केंद्रों को निशाना बनाना सबसे बड़ी रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक जीत माना जाता है.

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  • यह हमला मनोवैज्ञानिक खौफ पैदा करने का एक हथियार है.

संयुक्त अरब अमीरात के बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट पर हुए हालिया ड्रोन हमले ने एक बार फिर आधुनिक युद्ध की सबसे खतरनाक रणनीति को उजागर कर दिया है. अबू धाबी में हुए इस हमले में तीन ड्रोन शामिल थे, जिनमें से एक ने बिजली जनरेटर को निशाना बनाकर आग लगा दी. इस घटना को यूएई ने एक बेहद खतरनाक उकसावा करार दिया है. जंग के मैदान में जब भी कोई देश किसी न्यूक्लियर प्लांट को निशाना बनाता है, तो इसे केवल एक हमला नहीं बल्कि एकतरफा रणनीतिक बढ़त और बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत के तौर पर देखा जाता है.

बराकाह न्यूक्लियर प्लांट पर ड्रोन अटैक 

संयुक्त अरब अमीरात के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, रविवार को देश की पश्चिमी सीमा से तीन दुश्मन ड्रोन भीतर दाखिल हुए थे. मुस्तैद सुरक्षा तंत्र ने दो ड्रोनों को हवा में ही सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया, लेकिन तीसरा ड्रोन अबू धाबी में स्थित बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र की भीतरी सीमा तक पहुंचने में कामयाब रहा. उसने प्लांट के बाहर मौजूद एक बिजली जनरेटर को सीधे तौर पर निशाना बनाया, जिससे वहां भीषण आग लग गई. अबू धाबी के अधिकारियों ने इस पूरी हरकत को देश की सुरक्षा के खिलाफ एक बेहद खतरनाक उकसावा बताया है.

क्यों न्यूक्लियर प्लांट्स पर हमला करते हैं दुश्मन देश?

दुश्मन देश न्यूक्लियर प्लांट्स को मुख्य रूप से इसलिए निशाना बनाते हैं, क्योंकि ये किसी भी देश के पावर ग्रिड का सबसे मजबूत हिस्सा होते हैं. जब युद्ध के दौरान इन बेहद संवेदनशील ठिकानों पर हमला किया जाता है, तो एक बहुत बड़े इलाके की पूरी बिजली सप्लाई अचानक ठप हो जाती है. इसके कारण विरोधी देश के बड़े उद्योग, मिलिट्री बेस, अस्पताल और आम जनजीवन पूरी तरह ठप हो जाते हैं, जिससे उस देश की आर्थिक कमर और युद्ध लड़ने की बुनियादी क्षमता बेहद कमजोर हो जाती है.

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मनोवैज्ञानिक खौफ और जनता पर दबाव 

परमाणु ऊर्जा केंद्रों पर हमला करना सीधे तौर पर साइकोलॉजिकल वॉरफेयर यानी मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा माना जाता है. दुनिया भर में रेडिएशन का नाम सुनते ही आम जनता के भीतर एक गहरे विनाश का भारी खौफ और दहशत फैल जाती है. हमलावर देश इसी बड़े मानवीय डर का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करते हैं. वे विरोधी सरकार पर मानसिक दबाव बनाने और वहां के नागरिकों व सेना के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ने के लिए ऐसे आत्मघाती कदम उठाते हैं.

विनाशकारी रेडियोधर्मी प्रदूषण का परोक्ष हथियार 

अगर न्यूक्लियर प्लांट पर किए गए हमले की वजह से उसका मुख्य कूलिंग सिस्टम पूरी तरह फेल हो जाए या फिर उसके मुख्य रिएक्टर में कोई बड़ा विस्फोट हो जाए, तो स्थिति बेहद बेकाबू हो जाती है. इसके कारण प्लांट से निकलने वाला जानलेवा रेडियोधर्मी कचरा और गैसें तेजी से हवा और पानी में मिल जाती हैं. यह प्रदूषण उस पूरे भौगोलिक क्षेत्र को आने वाले कई दशकों के लिए पूरी तरह जहरीला बना देता है, जिसका भयंकर खामियाजा वहां की आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है.

परमाणु हथियारों के गुप्त कार्यक्रमों को रोकना 

कई बार वैश्विक संघर्षों के दौरान दुश्मन देशों को यह पुख्ता अंदेशा या खुफिया जानकारी होती है कि कोई विशिष्ट देश नागरिक ऊर्जा बनाने के नाम पर छुपकर परमाणु हथियार विकसित कर रहा है. मिडिल ईस्ट के लंबे इतिहास में ऐसे कई सैन्य संघर्ष देखे गए हैं, जहां किसी देश के गुप्त परमाणु अनुसंधान केंद्रों को समय रहते हवाई हमलों से पूरी तरह नष्ट करना विपक्षी सेना की मुख्य युद्ध नीति और रणनीतिक सुरक्षा का एक बेहद अनिवार्य हिस्सा माना गया है.

एरिया डिनायल और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का खेल 

सैन्य रणनीति में इसे 'एरिया डिनायल' भी कहा जाता है, जहां रेडिएशन का जानलेवा खतरा पैदा करके दुश्मन के पूरे भू-भाग को सेना की आवाजाही और इंसानी रहने के अयोग्य बना दिया जाता है. इसके अलावा, न्यूक्लियर प्लांट की तबाही का डर दिखाकर हमलावर देश अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर एक बड़ी बढ़त हासिल कर लेता है. वह इस वैश्विक विनाश के डर के बल पर तीसरे देशों से मध्यस्थता कराने, युद्ध को तुरंत रुकवाने या अपनी मनचाही संधियों पर हस्ताक्षर कराने की बड़ी कूटनीतिक ताकत पाता है. 

अंतरराष्ट्रीय कानून और युद्ध अपराध का दायरा 

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों और जिनेवा कन्वेंशन के सख्त नियमों के तहत किसी भी चालू न्यूक्लियर प्लांट पर सीधा हमला करना एक संगीन युद्ध अपराध माना गया है. चूंकि इससे लाखों आम नागरिकों की जान को सीधा और अपूरणीय खतरा होता है, इसलिए इन नियमों का उल्लंघन वर्जित है. यही वजह है कि किसी भी देश में इन बेहद संवेदनशील न्यूक्लियर प्लांट्स को अभेद्य बंकरों, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और बेहद मोटी कंक्रीट की दीवारों के घेरे में अत्यधिक सुरक्षित रखा जाता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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