बुलेट ट्रेन के लिए क्यों चाहिए नई पटरियां, वर्तमान ट्रैक पर क्यों नहीं दौड़ सकती?
बुलेट ट्रेन की 320 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ती है. तकनीक और ऑटोमैटिक सिग्नलिंग और अन्य कई कारणों से इसे पुराने ब्रॉड गेज और खुले भारतीय रेलवे ट्रैक पर चलाना संभव नहीं है.

- मोड़ों, ढलानों, बाधाओं से बचाव हेतु उन्नत, सुरक्षित कॉरिडोर।
भारत में हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट पर काम तेजी से चल रहा है, लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब देश में पहले से ही पटरियों का विशाल जाल बिछा हुआ है, तो बुलेट ट्रेन के लिए अलग से नया रेल कॉरिडोर क्यों तैयार किया जा रहा है. इसका सीधा जवाब सुरक्षा और आधुनिक तकनीक से जुड़ा है. बुलेट ट्रेन को 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलाने के लिए जिन तकनीकी मानकों की जरूरत होती है, वे हमारे पुराने रेलवे नेटवर्क पर मौजूद नहीं हैं. इसलिए नई पटरियां बिछाना मजबूरी और जरूरत दोनों है.
पटरियों की चौड़ाई और गेज का फर्क
भारतीय रेलवे का अधिकांश नेटवर्क ब्रॉड गेज यानी 1676 मिलीमीटर चौड़ी पटरियों पर बना हुआ है. इसके विपरीत दुनिया भर में बुलेट ट्रेनें अंतरराष्ट्रीय मानक के तहत स्टैंडर्ड गेज यानी 1435 मिलीमीटर चौड़ाई वाली पटरियों पर ही चलती हैं. ट्रेन की डिजाइनिंग और उसके पहियों की बनावट पूरी तरह इसी चौड़ाई के हिसाब से तैयार की जाती है. यदि बुलेट ट्रेन को पुराने ब्रॉड गेज ट्रैक पर चलाया जाएगा, तो उसकी पूरी प्रणाली काम नहीं कर पाएगी.
तेज रफ्तार और घर्षण को झेलने की क्षमता
भारत के पारंपरिक रेल ट्रैक अधिकतम 160 से 200 किलोमीटर प्रति घंटे की गति को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. जब कोई ट्रेन 320 किलोमीटर प्रति घंटे की अत्यधिक रफ्तार से दौड़ती है, तो पटरियों और पहियों के बीच भारी दबाव, कंपन और घर्षण पैदा होता है. सामान्य पटरियां इस अत्यधिक लोड और झटके को सहन नहीं कर सकतीं. बिना उपयुक्त मजबूत ट्रैक के इतने ऊंचे स्पीड लेवल पर ट्रेन चलाने से दुर्घटना का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
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बिना पत्थरों वाला कंक्रीट स्लैब ट्रैक
आम रेलवे पटरियों के नीचे कंकड़-पत्थर (बैलास्ट) बिछे होते हैं, जो ट्रेन के वजन को संभालते हैं. जब कोई ट्रेन 300 किमी प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से गुजरती है, तो हवा के भारी दबाव और कंपन के कारण ये पत्थर हवा में उड़ने लगते हैं. इससे ट्रेन की बॉडी और उसके पुर्जों को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है. यही कारण है कि बुलेट ट्रेन के लिए विशेष बैलास्टलेस कंक्रीट स्लैब ट्रैक बनाए जाते हैं, जो पूरी तरह पत्थरों से रहित होते हैं और पटरियों को अपनी जगह जमा कर रखते हैं.
मोड़ और ढलान
सामान्य भारतीय रेल पटरियां जमीन की बनावट के हिसाब से बिछाई जाती हैं, जिनमें कई जगह तीखे मोड़ और ढलान होते हैं. सामान्य ट्रेनों के लिए तो यह ठीक है, लेकिन इतनी तेज रफ्तार में अचानक आया तीखा मोड़ बुलेट ट्रेन को पटरी से उतार सकता है. हाई-स्पीड ट्रेनों को सुचारू रूप से चलाने के लिए सीधे और समतल मार्ग की आवश्यकता होती है. यही वजह है कि बुलेट ट्रेन के लिए ज्यादातर रास्ते एलिवेटेड यानी खंभों पर पुल बनाकर तैयार किए जा रहे हैं ताकि मोड़ बेहद हल्के हों.
एडवांस ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम
हाई-स्पीड रेल के लिए पारंपरिक सिग्नलिंग सिस्टम पूरी तरह बेअसर साबित होता है. 320 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रही ट्रेन का ड्राइवर बाहर लगे सिग्नल देखकर तुरंत फैसला नहीं ले सकता. इसके लिए ट्रेन के अंदर ही ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल (ATC) और अत्याधुनिक सिग्नलिंग स्क्रीन दी जाती है, जो पटरी से मिल रहे संकेतों के आधार पर खुद ब्रेक या स्पीड तय करती है. पुरानी पटरियों पर यह एडवांस डिजिटल सिग्नलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं है.

पूरी तरह सुरक्षित और बाड़बंद कॉरिडोर
भारतीय रेल पटरियां अक्सर खुली होती हैं, जहां जानवरों या इंसानों के अचानक सामने आने का जोखिम हमेशा बना रहता है. इतनी तेज रफ्तार में अगर कोई रुकावट सामने आ जाए, तो तुरंत ब्रेक लगाना नामुमकिन होता है. बुलेट ट्रेन के पूरे रूट को कंक्रीट की दीवारों और मजबूत बाड़ से पूरी तरह सील किया जाता है. इस सुरक्षा चक्र की वजह से कोई भी अनधिकृत व्यक्ति या जानवर ट्रैक तक नहीं पहुंच पाता और ट्रेन बिना किसी बाधा के दौड़ती है.
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