एथेनॉल से चीनी ही नहीं इन चीजों के दाम भी हुए हाई, क्यों इस पर डिपेंड है सिस्टम
ईंधन में ब्लेंडिंग बढ़ने से चीनी और एथेनॉल से जुड़े अन्य उद्योगों पर पड़ा सीधा असर, जानिए कैसे यह ग्रीन एनर्जी फॉर्मूला आम जनता की जेब पर भारी पड़ रहा है और क्या है इसका पूरा गणित.

एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर भारत का फोकस पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है और इसका सीधा असर अब बाजार में दिखने लगा है. हाल ही में चीनी की खुदरा कीमतें 20 अगस्त 2026 तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गईं, जबकि एक महीने पहले यह 48.18 रुपये प्रति किलो थी. लेकिन सिर्फ चीनी ही नहीं, एथेनॉल की बढ़ती डिमांड ने मक्का और खाद्य तेल जैसी कई और जरूरी चीजों के दाम भी ऊपर पहुंचा दिए हैं. आखिर एथेनॉल पर इतना बड़ा सिस्टम कैसे डिपेंड है और इसका आम आदमी की जेब पर क्या असर पड़ रहा है.
चीनी के दाम क्यों बढ़े?
सरकार का कहना है कि चीनी की कीमतों में उछाल की मुख्य वजह एथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारी सीजन की डिमांड और जमाखोरी है. दरअसल, रेड रॉट बीमारी, टॉप बोरर कीट और ज्यादा बारिश से हुए जलभराव के चलते गन्ने की पैदावार पर असर पड़ा है. इस साल घरेलू उत्पादन 30.6 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि पहले यह अनुमान 34.3 मिलियन टन था. हालांकि कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि एथेनॉल के लिए बढ़ता डायवर्जन भी कीमतों पर दबाव बना रहा है.
मक्का पर बढ़ा दबाव
चीनी से एथेनॉल बनाने के साथ-साथ अब भारत में ज्यादातर एथेनॉल अनाज से भी बनाया जा रहा है, खासतौर पर मक्के से. रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश का करीब तीन-चौथाई एथेनॉल अब अनाज आधारित है. इससे मक्के की मांग तेजी से बढ़ी है, जिसका सीधा असर इसके दामों पर भी पड़ रहा है. किसान भी अब मक्के की ज्यादा कीमत मिलने की उम्मीद में इसकी खेती की तरफ रुख कर रहे हैं.
खाद्य तेल पर भी पड़ रहा असर
एथेनॉल की बढ़ती मांग का एक और असर खाद्य तेल के बाजार पर भी दिख रहा है. मक्के की खेती बढ़ने से इससे निकलने वाला बाय-प्रोडक्ट DDGS भी बड़ी मात्रा में बाजार में आ रहा है, जिससे तिलहन से बनने वाले खल यानी ऑयलमील की डिमांड घट रही है. इसका नतीजा यह हो रहा है कि किसान सोयाबीन और मूंगफली जैसी तिलहन फसलों की जगह मक्का और धान उगाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जिससे खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता के सरकार के लक्ष्य पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
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क्यों जरूरी है? एथेनॉल पर यह निर्भरता
सरकार का मकसद पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट बढ़ाकर विदेशी तेल पर निर्भरता कम करना है. 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का लक्ष्य तय समय से पहले 2025 में ही हासिल कर लिया गया था और अब इसे 30 प्रतिशत तक ले जाने की मांग उठ रही है. ISMA के आंकड़ों के मुताबिक, देश की एथेनॉल उत्पादन क्षमता पहले से ही 20 अरब लीटर से ज्यादा है, जो 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग के लिए जरूरी करीब 11 अरब लीटर से कहीं ज्यादा है. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने के बाद यह मांग और तेज हो गई है, क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होती है.
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