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Volacanic Eruption: चुनिंदा जगहों पर ही क्यों होता है ज्वालामुखी? आखिर क्यों धरती उगलती है नर्क जैसी आग

ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर मौजूद वह दरार होती है, जहां से पृथ्वी के अंदर मौजूद ज्यादा गर्म मैग्मा, गैसें और राख बाहर निकलती है. यह जब यही मैग्मा सतह पर पहुंचता है तो उसे लावा कहा जाता है.

Volacanic Eruption: धरती की सतह पर जब कहीं से अचानक आग, धुआं, राख और पगली हुई चट्टानों का सैलाब निकलने लगता है तो उसे ज्वालामुखी विस्फोट कहा जाता है. वहीं दुनिया के इतिहास में ज्वालामुखी विस्फोटों ने कई शहरों को भी मिटा दिया. लेकिन आज तक सबसे बड़ा सवाल यही उठता रहा है कि आखिर ज्वालामुखी दुनिया के हर हिस्से में क्यों नहीं होते और क्यों कुछ खास इलाके ही धरती की इस भयावह चीज का केंद्र बनते हैं. ऐसे में समय चलिए आज हम आपको बताते हैं कि ज्वालामुखी कुछ चुनिंदा जगहों पर ही क्यों होते हैं और आखिर धरती क्यों नर्क जैसी आग उगलती है. 

क्या होता है ज्वालामुखी? 

ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर मौजूद वह दरार होती है, जहां से पृथ्वी के अंदर मौजूद ज्यादा गर्म मैग्मा, गैसें और राख बाहर निकलती है. यह जब यही मैग्मा सतह पर पहुंचता है तो उसे लावा कहा जाता है. जब कई बार विस्फोट तो इतना शक्तिशाली होता है कि उसकी आवाज हजारों किलोमीटर दूर तक सुनाई देती है. 1883 में इंडोनेशिया के क्राकाटोआ ज्वालामुखी का विस्फोट इतना भीषण था कि उसकी आवाज करीब 4800 किलोमीटर दूर ऑस्ट्रेलिया तक सुनी गई थी. 

ज्वालामुखी में धरती के अंदर क्या चल रहा होता है? 

पृथ्वी बाहर से भले ही ठोस दिखाई देती हो, लेकिन इसके अंदर लगातार गतिविधियां चलती रहती है. पृथ्वी के अंदर मौजूद रेडियोधर्मी तत्वों के विखंडन से भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है. इसी गर्मी के कारण गहराई में मौजूद चट्टानें बहुत गर्म रहती है. जब तापमान और दबाव के बीच संतुलन बिगड़ता है, तब चट्टानें पिघलकर मैग्मा में बदल जाती है. यह मैग्मा कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर बढ़ता है और अगर उसे रास्ता मिल जाए तो वह ज्वालामुखी के रूप में बदल जाता है. 

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सिर्फ चुनिंदा इलाकों में ही क्यों फटते हैं ज्वालामुखी? 

ज्वालामुखी के कुछ चुनिंदा इलाकों में ही फटने का जवाब पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों में छुपा है. पृथ्वी की ऊपरी सतह कई विशाल प्लेटों में बंटी हुई है, जो लगातार धीमी गति से खिसकती रहती है. जहां-जहां यह प्लेटें आपस में टकराती, अलग होती है या एक दूसरे के नीचे धंसती है, वहीं ज्वालामुखी बनने की संभावना सबसे ज्यादा होती है.

प्लेटों के अलग होने पर बनते हैं ज्वालामुखी 

कुछ जगहों पर टेक्टोनिक प्लेटें एक दूसरे से दूर जा रही होती है. ऐसे क्षेत्रों में पृथ्वी की परत पतली हो जाती है और नीचे मौजूद मैग्मा ऊपर आने लगते हैं.  आइसलैंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है. यहां उत्तरी अमेरिकी और यूरेशियन प्लेटें एक-दूसरे से दूर जा रही है. इसी कारण यह देश बर्फ और ज्वालामुखी का अनोखा संगम माना जाता है. वहीं दुनिया के सबसे खतरनाक ज्वालामुखी उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहां एक महासागरीय प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धंसती है. इस प्रक्रिया को सबडक्शन कहा जाता है. नीचे धंसने वाली प्लेट गर्म होकर पिघलने लगती है और मैग्मा का निर्माण करती है. यही मैग्मा ऊपर उठकर ज्वालामुखी विस्फोट का कारण बनता है.

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कविता गाडरी बीते कुछ साल से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी हुई है. राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाली कविता ने अपनी पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में की है. 
पत्रकारिता में अपना सफर उन्होंने राजस्थान पत्रिका से शुरू किया जहां उन्होंने नेशनल एडिशन और सप्लीमेंट्स जैसे करियर की उड़ान और शी न्यूज के लिए बाय लाइन स्टोरी लिखी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो पर काम करने का मौका मिला. जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन के लिए नए अनुभव दिए. 

इसके बाद उन्होंने एबीपी नेटवर्क नोएडा का रुख किया. यहां बतौर कंटेंट राइटर उन्होंने लाइफस्टाइल, करंट अफेयर्स और ट्रेडिंग विषयों पर स्टोरीज लिखी. साथ ही वह कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी लगातार सक्रिय रही. कविता गाडरी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में दक्ष हैं. न्यूज़ राइटिंग रिसर्च बेस्ड स्टोरीटेलिंग और मल्टीमीडिया कंटेंट क्रिएशन उनकी खासियत है. वर्तमान में वह एबीपी लाइव से जुड़ी है जहां विभिन्न विषयों पर ऐसी स्‍टोरीज लिखती है जो पाठकों को नई जानकारी देती है और उनके रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़ती है.

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