Raw Agent Ravindra Kaushik: पाकिस्तानी फौज में किस पद पर थे रविंद्र कौशिक, जानें किस नाम से वह करते थे नौकरी?
Raw Agent Ravindra Kaushik: 1975 में रॉ ने रविंद्र कौशिक के मिशन को अंतिम रूप दिया, उनकी भारतीय पहचान से जुड़े लगभग सभी ऑफिशियल रिकॉर्ड खत्म कर दिए गए और नबी अहमद शाकिर उन्हें नई पहचान दी गई.

Raw Agent Ravindra Kaushik: भारत के इतिहास में कुछ ऐसे नाम शामिल है, जिसकी बहादुरी और देशभक्ति की कहानी आज भी लोगों को हैरान कर देती है. ऐसा ही एक नाम ब्लैक टाइगर रविंद्र कौशिक का भी है. राजस्थान के श्री गंगानगर में जन्मे रविंद्र कौशिक ने देश की सुरक्षा के लिए अपनी पहचान परिवार और पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी. उन्होंने सिर्फ पाकिस्तान में सालों तक रहकर न सिर्फ जासूसी की, बल्कि पाकिस्तानी सेना में अफसर बनकर भारत को कई अहम खुफिया जानकारियां भी पहुंचाई. हालांकि उनकी कहानी का अंत बहुत दर्दनाक माना जाता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि पाकिस्तान में रविंद्र कौशिक फौज में किस पद पर थे और वह किस नाम से वहां पर नौकरी करते थे.
कॉलेज के मंच से रॉ तक का सफर
11 अप्रैल 1952 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे रविंद्र कौशिक बचपन से ही एक्टिंग और मिमिक्री में माहिर थे. कॉलेज के दिनों में वह नाटकों में हिस्सा लेते थे. बताया जाता है कि एक नाटक के दौरान उनकी प्रतिभा पर भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के अधिकारियों की नजर पड़ी. इसके बाद 1973 में बीकॉम पूरा करने के बाद वह रिसर्च एंड एनालिसिस विंग से जुड़ गए. रॉ ने उन्हें करीब 2 साल तक स्पेशल ट्रेनिंग दी, इस दौरान उन्हें उर्दू भाषा, इस्लामिक रीति रिवाज, पाकिस्तान का इतिहास और वहां की संस्कृति बारीकियों से सिखाई गई, ताकि वह पाकिस्तान में पूरी तरह से एक स्थानीय नागरिक की तरह रह सके.
भारत की पहचान मिटाकर बन गए नबी अहमद शाकिर
1975 में रॉ ने रविंद्र कौशिक के मिशन को अंतिम रूप दिया, उनकी भारतीय पहचान से जुड़े लगभग सभी ऑफिशियल रिकॉर्ड खत्म कर दिए गए और नबी अहमद शाकिर उन्हें नई पहचान दी गई. उनके लिए नया पता, नई नागरिकता और नया जीवन तैयार किया गया. यहां तक की उन पर किसी तरह का शक न हो इसके लिए उनका खतना भी कराया गया. इसके बाद उन्हें पाकिस्तान भेज दिया गया, जहां उन्होंने एक पाकिस्तानी नागरिक की तरह अपनी जिंदगी शुरू की. पाकिस्तान पहुंचने के बाद रवींद्र ने अपनी पहचान को और मजबूत बनाने के लिए कराची यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया, वहां उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई पूरी की. उनका मकसद सिर्फ पढ़ाई करना नहीं था, बल्कि पाकिस्तानी समाज में पूरी तरह गुल मिल जाना भी था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपना अगला और सबसे जरूरी कदम उठाया, जिसने उन्हें भारतीय जासूसी इतिहास का सबसे चर्चित नाम बना दिया.
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पाकिस्तानी सेना में मिली एंट्री
पाकिस्तान की सेन्य एक्टिविटी और रणनीतियों की जानकारी हासिल करने के लिए रविंद्र कौशिक ने सेना में शामिल होने का फैसला किया. रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने पहले सिविलियन स्तर पर सिस्टम में प्रवेश किया और बाद में आंतरिक परीक्षाएं पास कर पाकिस्तान सेना के मिलिट्री अकाउंट्स डिपार्टमेंट में बतौर कमीशंड ऑफिसर नियुक्ति हासिल की. यह किसी भी विदेशी जासूस के लिए बहुत कठिन काम माना जाता था, लेकिन रविंद्र कौशिक ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर इसे हासिल किया. पाकिस्तानी सेना में रविंद्र कौशिक का प्रदर्शन इतना प्रभावशाली था कि उन्हें लगातार प्रमोशन मिलते रहे. धीरे-धीरे वह सेना में ऊंचे पदों पर पहुंच गए और आखिरकार मेजर रैंक हासिल करने में सफल रहे. पाकिस्तान में उनकी पहचान मेजर नबी अहमद शाकिर के रूप में थी. यह उपलब्धि इसलिए भी खास थी क्योंकि वह एक भारतीय नागरिक थे, जिन्होंने दुश्मन देश की सेना में बहुत ऊंचा पद हासिल किया और किसी को उनकी असल पहचान का अंदाजा तक नहीं था.
रॉ की एक चूक से उजड़ गई पूरी जिंदगी
करीब 8 साल तक सफलतापूर्वक जासूसी करने के बाद 1983 में रविंद्र कौशिक का भेद खुल गया. दरअसल रॉ ने उनसे कांटेक्ट बनाए रखने के लिए एक दूसरे एजेंट इनायत मसीह को पाकिस्तान भेजा था, लेकिन मसीह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के हत्थे चढ़ गया. पूछताछ और यातनाओं के दौरान उसने रविंद्र कौशिक की पहचान उजागर कर दी. इसके बाद पाकिस्तानी एजेंसियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी के बाद रवींद्र कौशिक को लंबे समय तक यातनाएं दी गई. उन पर जासूसी का मुकदमा चलाया गया और 1985 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई, हालांकि बाद में सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया.
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