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कुर्सी पर तौलिया से कैसे बढ़ती है शान, क्या कहीं और ऐसा होता है?

Officer Chair Towel: आपने अक्सर ही कई लोगों की कुर्सी पर तौलिया रखा देखा होगा. आइए जानते हैं कुर्सी पर तौलिया रखना शान का प्रतीक कैसे है.

Officer Chair Towel: भारत में किसी भी सरकारी कार्यालय में चले जाएं एक चीज को नजरअंदाज करना काफी ज्यादा असंभव है. आपने यह जरूर देखा होगा कि बड़े अधिकारियों की कुर्सी पर एक सफेद तौलिया रखा होता है. कई लोग ऐसा मानते हैं कि यह सिर्फ आराम के लिए है, लेकिन इस प्रथा का औपनिवेशिक इतिहास, प्रशासनिक संस्कृति और प्राधिकरण के मनोविज्ञान से काफी गहरा संबंध है. वैसे तो तौलिया मूल रूप से ब्रिटिश काल के दौरान एक व्यावहारिक उद्देश्य पूरा करता था लेकिन दशकों में यह स्थिति काफी ज्यादा बदल गई है. 

औपनिवेशिक युग की प्रथा

यह प्रथा ब्रिटिश राज से चली आ रही है. उस वक्त बड़े प्रशासक चमड़े से ढकी भारी लकड़ी की कुर्सियों का इस्तेमाल करते थे. भारत की गर्म और आर्द्र जलवायु में अधिकारी अक्सर बिना एयर कंडीशनिंग के कार्यालय में लंबे समय तक बैठे रहते थे. पसीने को सूखने और महंगे चमड़े की सुरक्षा के लिए कुर्सी के पीछे सूती तौलिए रखे गए थे. एक और व्यावहारिक वजह तब सामने आई जब भारतीय अधिकारी सिविल सेवाओं में शामिल हुए. क्योंकि कई लोग अपने बालों में सरसों या फिर नारियल का तेल लगाते हैं इस वजह से तौलिया समय के साथ कुर्सी को दागदार या फिर चिपचिपा होने से बचाता है. 


कुर्सी पर तौलिया से कैसे बढ़ती है शान, क्या कहीं और ऐसा होता है?

सफेद तोलिया कैसे अधिकार का प्रतीक बन गया? 

1947 में स्वतंत्रता के बाद नवगठित भारतीय प्रशासनिक सेवा और दूसरे सरकारी विभागों ने बड़े पैमाने पर औपनिवेशिक प्रशासनिक संरचना को बरकरार रखा. वक्त के साथ तौलिए ने अपनी पूरी तरह कार्यात्मक भूमिका खो दी और कार्यालय, गरिमा और अधिकार का एक औपचारिक तरीका बन गया. आज कुर्सी पर एक सफेद तोलिया अक्सर संकेत देता है कि यह कमरे में सबसे वरिष्ठ अधिकारी का है. यहां तक की अधिकारी की गैर मौजूदगी में भी तोलिया सीट को आरक्षित के रूप में चिन्हित करता है. 

परंपरा के पीछे का मनोविज्ञान 

सरकारी कार्यालय में सत्ता की दृश्य भाषा में तौलिया एक बड़ी भूमिका निभाता है. एक कुरकुरा सफेद तौलिया तुरंत अधिकारी की कुर्सी को दूसरों से अलग करता है.  इससे आगंतुकों को बिना किसी संकट के विभाग के प्रमुख की पहचान करने में मदद मिलती है. भारतीय प्रशासनिक संस्कृति में सफेद रंग सादगी, पवित्रता और अधिकार से भी जुड़ा है. यह प्रतिष्ठा की धारणा को जोड़ता है. 

क्या यह परंपरा भारत के बाहर भी मौजूद है?

यह प्रथा भारत के लिए अनोखी नहीं है. पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश, जिनकी प्रशासनिक प्रणालियां ब्रिटिश भारतीय ढांचे से विकसित हुई हैं, सरकारी कार्यालय में वरिष्ठ अधिकारियों की कुर्सी पर सफेद तौलिया रखना जारी रखते हैं.

श्रीलंका में कई शहरी कार्यालय में इस प्रथा में गिरावट आई है लेकिन कुछ ग्रामीण प्रशासनिक प्रतिष्ठानों में अभी भी ऐसा देखा जा सकता है. ब्रिटिशों द्वारा सीधे तौर पर कभी शासित नहीं होने के बावजूद नेपाल ने भारत और ब्रिटेन से प्रभावित कई प्रशासनिक प्रथाओं को अपनाया है. इनमें से एक कुर्सी पर तौलिया रखना भी है.


कुर्सी पर तौलिया से कैसे बढ़ती है शान, क्या कहीं और ऐसा होता है?

एक परंपरा जो प्रशासनिक संस्कृति को दर्शाती है 

आज वातानुकूलित कार्यालयों और आधुनिक फर्नीचर ने तौलिये की मूल व्यावहारिक जरूरत को कम कर दिया है. इसके बावजूद भी कई सरकारी प्रतिष्ठानों में इसका प्रतीकात्मक मूल्य बरकरार है. कई अधिकारियों के लिए यह प्रशासनिक परंपरा के साथ निरंतरता का प्रतिनिधित्व करता है.  वहीं आगंतुकों के लिए यह तुरंत अधिकार पदानुक्रम और आधिकारिक स्थिति का संचार करता है. चमड़े की कुर्सियों की सुरक्षा के लिए यह एक सरल तरीके के रूप में शुरू हुआ था और अब धीरे-धीरे दक्षिण एशिया में नौकरशाही के सबसे पहचानने योग्य दृश्य प्रतीकों में से एक बन चुका है.

तौलिए के रखरखाव के लिए आमतौर पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जिम्मेदार होते हैं. यह अपेक्षा की जाती है कि इसे रोज धोया जाए, अच्छी तरह से इस्त्री किया जाए और जब भी इस पर दाग लगे या फिर यह खराब हो जाए तो इसे बदल दिया जाए. कई विभागों में ऐसी कार्यालय साज-सज्जा का खर्च रखरखाव बजट के अंदर शामिल किया जाता है. परंपरागत रूप से जूनियर स्टाफ मेंबर अपनी कुर्सियों पर एक जैसे तौलिये नहीं रखते हैं. क्योंकि यह प्रथा खास तौर से वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़ी है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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