कतर से कितनी रसोई गैस मंगवाता है भारत, ईरान के हमले से हम पर कितना पड़ेगा असर?
ईरान और कतर के बीच बढ़ती तनातनी केवल विदेशी खबरों का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आपकी रसोई तक पहुंचने वाले सिलेंडर की सुरक्षा से जुड़ी है. भारत अपनी जरूरत की एक-तिहाई रसोई गैस अकेले कतर से खरीदता है.

- भारत की रसोई गैस की मांग बढ़ी, 60% आयात पर निर्भरता.
- कतर, यूएई हैं एलपीजी के प्रमुख आपूर्तिकर्ता, भारत के लिए महत्वपूर्ण.
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है अधिकांश एलपीजी, तनाव से सप्लाई बाधित.
- आयात निर्भरता घटाने, रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने के प्रयास जारी.
भारत में रसोई गैस की जरूरतें जिस तेजी से बढ़ी हैं, उसने ऊर्जा सुरक्षा के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है. आज देश के 33 करोड़ से अधिक घरों में एलपीजी सिलेंडरों का इस्तेमाल हो रहा है, जिसकी आपूर्ति के लिए भारत बड़े पैमाने पर कतर जैसे खाड़ी देशों पर निर्भर है. ईरान और खाड़ी देशों के बीच बढ़ता तनाव केवल कूटनीतिक चिंता नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारतीय रसोई के बजट और सप्लाई चैन से जुड़ा मामला है.
भारत में रसोई गैस की बढ़ती मांग और घरेलू उत्पादन
पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी पहलों के कारण ग्रामीण और शहरी इलाकों में रसोई गैस की मांग में जबरदस्त उछाल आया है. भारत वर्तमान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता देश बन चुका है. हालांकि, भारत की अपनी रिफाइनरियां देश की कुल मांग का केवल 40 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा कर पाती हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि देश को अपनी 60 प्रतिशत जरूरतों के लिए विदेशी आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. यह निर्भरता भारत को वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के प्रति संवेदनशील बनाती है.
भारत का सबसे बड़ा और भरोसेमंद सप्लायर
जब बात रसोई गैस आयात की आती है, तो कतर भारत का सबसे महत्वपूर्ण साझेदार बनकर उभरता है. भारत अपनी कुल एलपीजी आयात का लगभग 29 से 34 प्रतिशत हिस्सा अकेले कतर से मंगवाता है. हालिया व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार, कतर ने भारत को 53 लाख मीट्रिक टन से अधिक एलपीजी की आपूर्ति की है, जिसका कुल मूल्य लगभग 4.04 अरब डॉलर (लगभग 33 हजार करोड़ रुपये से अधिक) है. कतर के साथ यह ऊर्जा सहयोग भारत की घरेलू ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है.
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यूएई और अन्य देशों की महत्वपूर्ण भूमिका
कतर के बाद संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भारत का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आपूर्तिकर्ता है. भारत के कुल आयात में यूएई की हिस्सेदारी लगभग 26 प्रतिशत है. इसके अलावा कुवैत और सऊदी अरब भी भारत को भारी मात्रा में रसोई गैस भेजते हैं. इन खाड़ी देशों का यह समूह भारत के एलपीजी आयात तंत्र की बुनियादी नींव है. यदि इस क्षेत्र में कोई भी बड़ा सैन्य संघर्ष होता है, तो भारत के लिए इन वैकल्पिक रास्तों से गैस मंगवाना भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य ऊर्जा सप्लाई की सबसे कमजोर कड़ी
ईरान और खाड़ी देशों के बीच स्थित हॉर्मुज जलडमरूमध्य वह संकरा समुद्री रास्ता है, जहां से भारत आने वाला अधिकांश एलपीजी कार्गो गुजरता है. दुनिया के कुल तेल और गैस व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर जाता है. यदि ईरान इस रास्ते को बंद करने की धमकी देता है या यहां कोई हमला होता है, तो भारत की गैस सप्लाई चैन पूरी तरह ठप हो सकती है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य का सामरिक महत्व इतना अधिक है कि इसकी संवेदनशीलता भारत की चिंताएं बढ़ा देती है.
ईरान के हमले और तनाव का भारत पर सीधा असर
ईरान और उसके पड़ोसियों के बीच बढ़ता सैन्य तनाव सीधे तौर पर समुद्री परिवहन को प्रभावित करता है. अगर ईरान कतर या यूएई के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाता है, तो भारत को मिलने वाली सप्लाई में भारी कमी आ सकती है. सप्लाई कम होने का सीधा असर देश में एलपीजी की कीमतों पर पड़ेगा. युद्ध की स्थिति में बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से घरेलू सिलेंडरों के दाम आसमान छू सकते हैं, जिसका बोझ सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा.
आयात पर निर्भरता घटाने के लिए भारत की रणनीति
ओवर-डिपेंडेंसी यानी किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए भारत अब अपने विकल्पों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. सरकार देश के भीतर रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने और सामरिक भंडारण को मजबूत करने पर जोर दे रही है. इसके साथ ही, भारत अन्य देशों से भी गैस आयात के नए समझौते कर रहा है ताकि खाड़ी क्षेत्र में किसी भी संकट की स्थिति में देश में रसोई गैस की किल्लत पैदा न हो. यह लंबी अवधि की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य कदम है.
'सेवन सिस्टर्स' का ऐतिहासिक प्रभाव और वर्तमान बाजार
वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में 'सेवन सिस्टर्स' के नाम से मशहूर सात बड़ी कंपनियों (जैसे एक्सॉन, मोबिल, शेवरॉन, बीपी और शेल) का दबदबा रहा है. इन कंपनियों ने 20वीं सदी में ऊर्जा व्यापार के जो तरीके तय किए थे, उनका असर आज भी बाजारों पर महसूस किया जाता है. हालांकि अब सरकारी कंपनियां और खाड़ी देशों के अपने राष्ट्रीय निगम बाजार को नियंत्रित करते हैं, लेकिन व्यापारिक मार्ग और सुरक्षा के पुराने नियम आज भी वैश्विक ऊर्जा राजनीति का केंद्र बने हुए हैं.
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