भारत में हिंदू ज्यादा गरीब है या मुस्लिम? ये आंकड़े देख चौंक जाएंगे आप
स्टडी के मुताबिक 2011-12 से 2023-24 के बीच भारत ने गरीबी कम करने में ऐतिहासिक गति दिखाई है. गरीबी में गिरावट न केवल तेज रही बल्कि हर वर्ग और हर क्षेत्र में समान रूप से देखी गई.

हम सभी को पता है कि भारत की अर्थव्यवस्था सकल घरेलू उत्पाद के हिसाब से दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जो 4.19 ट्रिलियन डॉलर है. साल 2025-26 में भारत की जीडीपी की वृद्धि दर लगभग 8.2 प्रतिशत रही. यह पिछले साल की तुलना में अधिक है, लेकिन हमारे मन में एक सवाल उठता है कि क्या जीडीपी वृद्धि के साथ हमारे देश की गरीबी और गरीबों की संख्या भी कम हुई.
इस बात का जवाब एक ताजा रिसर्च रिपोर्ट से मिलता है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और सोलहवें वित्त आयोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया और अर्थशास्त्री विशाल मोरे का अध्ययन बताता है कि भारत ने पिछले 12 वर्षों में गरीबी कम करने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2011-12 से 2023-24 तक के समय में अति गरीबी को लगभग खत्म कर दिया है. अगर हम बात करें हिंदू और मुस्लिम समुदाय में गरीबी की, तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं.
रिपोर्ट किसने बनाई और कहां प्रकाशित हुई?
यह अध्ययन कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और सोलहवें वित्त आयोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया और विश्लेषक विशाल मोरे ने किया है. यह रिपोर्ट Economic & Political Weekly में छपी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदुओं और मुसलमानों दोनों ही धार्मिक समुदायों में अति-गरीबी का अंतर लगभग मिट चुका है और कई राज्यों में मुसलमानों में गरीबी की दर हिंदुओं से भी कम पाई गई है.
रिपोर्ट का दावा है कि 2022-23 में मुसलमानों में अति-गरीबी दर 4% थी और हिंदुओं में 4.8%, जो घटकर 2023-24 में मुसलमानों में अत्यंत गरीबी 1.5% और हिंदुओं में अत्यंत गरीबी 2.3% थी जिसमें काफी गिरावट देखने को मिली. विश्व बैंक के मुताबिक, अधिक गरीबी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति का रोजाना $3 (PPP आधार पर) से कम पर जीवनयापन करना. मोरे और अरविंद पनगढ़िया के अनुसार, यह सीमा भारत की 'तेंदुलकर गरीबी रेखा' के लगभग बराबर है जो भारत में गरीबी मापन के लिए आधिकारिक तौर पर इस्तेमाल की जाती है.
डेटा कैसे इकट्ठा किया गया?
इस डेटा को जुटाने के लिए दो मानकों का इस्तेमाल किया गया जिसमें Tendulkar poverty line और HCES सर्वे जैसे मानकों का उपयोग किया गया, जिससे सटीक डेटा निकलकर आता है. तेंदुलकर गरीबी रेखा वह मानक है जिसके आधार पर यह तय किया जाता है कि किसी व्यक्ति या परिवार का खर्च गरीबी रेखा से ऊपर है या नीचे जिसे भारत में आधिकारिक तौर पर उपयोग किया जाता है और दूसरा है HCES यानी घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण जिसमें घर-घर जाकर लोगों की खर्च संबंधी जानकारी ली जाती है.
हिंदुओं और मुसलमानों में गरीबी कितनी घटी
अरविंद पनगढ़िया और विशाल मोरे की इस रिपोर्ट के अनुसार
- 2022-23 में मुसलमानों में अति गरीबी 4% थी जो 2023-24 में घटकर 1.5% रह गई.
- हिंदुओं में 2022-23 में यह दर 4.8% थी जो 2023-24 में घटकर 2.3% हो गई.
- दोनों समुदायों में गरीबी तेज़ी से घटी है और दोनों के बीच का अंतर लगभग खत्म हो चुका है.
रिपोर्ट का उद्देश्य क्या था?
- भारत में गरीबी का वास्तविक स्तर समझना
- धार्मिक समुदायों में गरीबी का अंतर देखना
- SC, ST, OBC, सामान्य वर्ग जैसी सामाजिक श्रेणियों की तुलना करना
- ग्रामीण और शहरी गरीबों की स्थिति समझना
- हर राज्य का अलग विश्लेषण करना
भारत में गरीबी घटने के नतीजे
स्टडी के मुताबिक 2011-12 से 2023-24 के बीच भारत ने गरीबी कम करने में ऐतिहासिक गति दिखाई है. गरीबी में गिरावट न केवल तेज रही बल्कि हर वर्ग और हर क्षेत्र में समान रूप से देखी गई.
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Source: IOCL






















