Hindavi Swarajya: छत्रपति शिवाजी महाराज से पहले किसने देखा था स्वराज का ख्वाब, जानें कहां रखी गई थी इसकी पहली नींव?
Hindavi Swarajya: अक्सर ही यह कहा जाता है कि स्वराज की शुरुआत शिवाजी महाराज ने की थी. लेकिन आपको बता दें कि इसकी नींव काफी पहले रखी जा चुकी थी. आइए जानते हैं इस बारे में पूरी जानकारी.

- विदेशी प्रभुत्व के विरुद्ध सदियों से स्वराज का विचार पनपा।
- विजयनगर, महाराणा प्रताप ने विदेशी सत्ता का प्रबल विरोध किया।
- संतों ने लोगों में स्वशासन की भावना प्रबल की।
- शिवाजी ने १६४५ में शपथ ली, १६७४ में छत्रपति बने।
Hindavi Swarajya: स्वराज का विचार विदेशी प्रभुत्व से मुक्त स्व-शासन छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ रातोंरात नहीं उभरा. छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस ख्वाब को एक शक्तिशाली और स्वतंत्र राज्य में बदल दिया, लेकिन इस विचार की नींव सदियों पहले शासकों, संतों और योद्धाओं के प्रयासों के जरिए ही रखी गई थी. उन्होंने विदेशी आक्रमणों का विरोध किया और स्वदेशी परंपरा और राजनीतिक स्वतंत्रता को संरक्षित करने की मांग की.
विजयनगर साम्राज्य ने पहली बड़ी नींव रखी
विदेशी शासन के विरुद्ध स्वदेशी साम्राज्य की स्थापना का सबसे पहला संगठित प्रयास 1336 में हरिहर और बुक्का द्वारा विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के साथ हुआ. ऐसे समय में जब अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद बिन तुगलक जैसे शासकों के अधीन दिल्ली सल्तनत के बार-बार आक्रमण ने दक्षिण भारत के ज्यादातर हिस्से को अस्त व्यस्त कर दिया था दोनों भाइयों ने विदेशी प्रभुत्व को खत्म करने की ठान ली थी.
विजयनगर साम्राज्य एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभरा जिसने लगभग तीन शताब्दियों तक भारतीय संस्कृति, मंदिर और क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा की.
महाराणा प्रताप का विरोध
16वीं शताब्दी तक मुगल साम्राज्य का विस्तार पूरे उत्तरी भारत में हो चुका था. जिस तरफ कई क्षेत्रीय शासकों ने मुगल सत्ता को अपना लिया था मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने सम्राट अकबर का विरोध करना जारी रखा. भारी सैन्य और वित्तीय नुकसान का सामना करने के बावजूद महाराणा प्रताप ने आत्म समर्पण के बजाय मुश्किल को चुना.
संतों ने स्वराज के विचार के लिए समाज को तैयार किया
सैन्य प्रतिरोध के साथ महाराष्ट्र में एक समानांतर सामाजिक और आध्यात्मिक आंदोलन भी सामने आ रहा था. ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम और समर्थ रामदास सहित वारकरी परंपरा से जुड़े संतों ने लोगों को सामाजिक विभाजन को दूर करने और सांस्कृतिक पहचान की भावना को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित किया. इन संतों ने आम लोगों को यह यकीन करने के लिए प्रेरित किया की आजादी न सिर्फ राजनीतिक बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक भी थी.
शाहजी राजे और जीजाबाई के विचार
छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास में प्रवेश करने से पहले एक स्वतंत्र राज्य का विचार उनके अपने परिवार में ही जड़ जमा चुका था. शिवाजी के पिता शाहजी राजे भोसले ने एक सैन्य कमांडर के रूप में अहमदनगर और बीजापुर सल्तनत में सेवा की थी. लेकिन कथित तौर पर एक आजाद राज्य स्थापित करने की इच्छा रखते थे.
ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने एक अलग शक्ति आधार बनाने का प्रयास किया लेकिन अंत में इन प्रयासों को दबा दिया गया. उन्होंने ही हिंदवी स्वराज्य शब्द का इस्तेमाल किया था. इसी के साथ राजमाता जीजाबाई भी उतनी ही जरूरी थीं. उन्होंने शिवाजी के चरित्र को आकार देने में एक बड़ी भूमिका निभाई. उन्होंने पुणे में उन्हें रामायण और महाभारत की कहानी सुनाते हुए बड़ा किया और यह यकीन दिलाया कि विदेशी शासकों की सेवा करना उनके लोगों की नियति नहीं थी.
शिवाजी महाराज ने सपने को हकीकत में बदला
वह बड़ा पल 1645 में आया जब माना जाता है कि लगभग 15 साल की उम्र में शिवाजी महाराज ने अपने साथियों के साथ मशहूर रायरेश्वर प्रतिज्ञा ली थी. पुणे के निकट रायरेश्वर मंदिर में उन्होंने क्षेत्र को विदेशी शासन से मुक्त करा कर स्वराज की स्थापना करने की शपथ ली थी.
इसके तुरंत बाद ही छत्रपति शिवाजी महाराज ने तोरणा किले पर कब्जा कर लिया. यह एक असाधारण सैन्य अभियान की शुरुआत थी. आगे चलकर उन्होंने कई बड़े किलों को सुरक्षित किया. 1659 में उन्होंने अफजल खान को हराया और पुणे में शाइस्ता खान पर साहसी छापे के साथ शक्तिशाली विरोधियों पर जीत हासिल की.
स्वशासन का सपना 6 जून 1674 को अपने आखिरी वक्त तक पहुंच गया. शिवाजी महाराज को वैदिक परंपराओं के मुताबिक रायगढ़ किले में छत्रपति का ताज पहनाया गया. राज्याभिषेक एक शाही समारोह से कहीं ज्यादा था. यह एक घोषणा थी कि एक आजाद और संप्रभु भारतीय साम्राज्य का उदय हो चुका है.
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