Missile Fuels: मिसाइल को कैसे मिलती है सुपरसोनिक रफ्तार, इनमें कौन से खास फ्यूल का होता है इस्तेमाल?
Missile Fuels: मिसाइलों की सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक रफ्तार के पीछे पेट्रोल-डीजल नहीं, बल्कि विशेष रॉकेट फ्यूल का हाथ होता है. जो अलग-अलग मिशनों के हिसाब से थ्रस्ट और कंट्रोल प्रदान करते हैं.

Missile Fuels: जब एक मिसाइल गर्जना के साथ आसमान का सीना चीरती हुई निकलती है, तो उसकी रफ्तार देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसे पलक झपकते ही हजारों किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड कैसे मिलती है? यह कोई जादू नहीं, बल्कि इसके अंदर भरा हुआ एक खास तरह का हाई-एनर्जी ईंधन है. आम गाड़ियों में डलने वाले पेट्रोल या डीजल से उलट, मिसाइलों में ऐसा बारूदी मिश्रण इस्तेमाल होता है जो कुछ ही सेकंड में इतना जबरदस्त धक्का पैदा करता है कि मिसाइल आवाज की गति को भी पीछे छोड़ देती है.
ये है मिसाइल का असली पावर हाउस
अक्सर लोग यह समझते हैं कि मिसाइलें भी हवाई जहाजों की तरह सामान्य ईंधन से उड़ती होंगी, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. मिसाइलों को उड़ाने के लिए हाई-एनर्जी रॉकेट फ्यूल की जरूरत होती है. पेट्रोल या डीजल में इतना ऊर्जा घनत्व नहीं होता है कि वे भारी-भरकम मिसाइल को गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ इतनी तेजी से ढकेल सकें. मिसाइल का ईंधन ऐसा होना चाहिए जो बहुत कम समय में बहुत ज्यादा गैस पैदा करे, ताकि उसे जबरदस्त थ्रस्ट या धक्का मिल सके.
सॉलिड फ्यूल
ज्यादातर बैलिस्टिक मिसाइलों, जैसे भारत की अग्नि-V (Agni-V) में सॉलिड फ्यूल यानी ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें HTPB (Hydroxyl-Terminated Polybutadiene) जैसे पॉलिमर को अमोनियम परक्लोरेट जैसे ऑक्सीडाइजर के साथ मिलाकर एक रबर जैसा पेस्ट बनाया जाता है. इसे रॉकेट मोटर के केसिंग में ही भर दिया जाता है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे सालों तक स्टोर किया जा सकता है और युद्ध के समय मिसाइल को तुरंत लॉन्च किया जा सकता है. एक बार इसमें आग लग गई, तो यह लगातार जलता रहता है.
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लिक्विड फ्यूल
मिसाइलों में दूसरा मुख्य प्रकार लिक्विड फ्यूल (तरल ईंधन) का है. इसमें ईंधन के रूप में UDMH और जलाने के लिए नाइट्रोजन टेट्रॉक्साइड जैसे रसायनों को अलग-अलग टैंकों में रखा जाता है. जब मिसाइल का इंजन स्टार्ट होता है, तो इन्हें पाइपलाइन के जरिए एक चैंबर में मिलाकर जलाया जाता है. लिक्विड फ्यूल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वैज्ञानिक इसके प्रवाह को कम या ज्यादा करके मिसाइल की रफ्तार को कंट्रोल कर सकते हैं या जरूरत पड़ने पर इंजन बंद भी कर सकते हैं. हालांकि, इसका सिस्टम काफी जटिल होता है.
न्यूटन का नियम और रफ्तार का विज्ञान
मिसाइल की सुपरसोनिक रफ्तार के पीछे न्यूटन का तीसरा नियम काम करता है. जब इंजन के अंदर ईंधन जलता है, तो बहुत गर्म गैसें बेहद ऊंचे दबाव के साथ पीछे की ओर निकलती हैं. जितनी तेजी से ये गैसें पीछे निकलती हैं, उतनी ही तेजी से मिसाइल आगे की ओर भागती है. इसी धक्के की बदौलत ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें Mach 2.8 से Mach 3 तक की सुपरसोनिक गति हासिल कर लेती हैं. यह रफ्तार इतनी ज्यादा होती है कि दुश्मन के रडार को संभलने का मौका भी नहीं मिलता है.
कैसे मिलती है हाइपरसोनिक स्पीड?
आजकल दुनिया हाइपरसोनिक मिसाइलों की ओर बढ़ रही है, जिनकी रफ्तार Mach 5 (आवाज से 5 गुना तेज) से भी ज्यादा होती है. इतनी भयंकर गति हासिल करने के लिए हाइब्रिड फ्यूल और स्क्रैमजेट इंजन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है. इसमें हाई-परफॉर्मेंस फ्यूल के साथ-साथ मिसाइल के एयरोडायनामिक डिजाइन का भी बड़ा रोल होता है. विशेष रसायनों का मिश्रण और इंजन की बनावट मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि मिसाइल हवा के घर्षण को झेलते हुए अपने लक्ष्य को पलक झपकते ही तबाह कर दे.
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Source: IOCL



























