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Child Death Rate: 5 साल उम्र होने तक किस धर्म के बच्चे ज्यादा गंवाते हैं जान, इनमें कितने हिंदू और कितने मुसलमान?

Child Death Rate: भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में गिरावट देखने को मिल रही है. लेकिन इसी बीच आइए जानते हैं कि किस धर्म के बच्चे सबसे ज्यादा जान गंवाते हैं.

Child Death Rate: बाल मृत्यु दर किसी भी देश के हेल्थ सिस्टम और सामाजिक समानता के सबसे संवेदनशील इंडिकेटर में से एक है. भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में लगातार गिरावट आ रही है लेकिन हाल के सरकारी डेटा से पता चलता है की धार्मिक समुदायों के बीच अभी भी काफी अंतर मौजूद है. NFHS-5,  MoSPI की ताजा रिपोर्ट और भारत सरकार की चिल्ड्रन इन इंडिया 2025 रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. आइए जानते हैं कि किस धर्म के बच्चे सबसे ज्यादा जान गंवाते हैं.

भारत में कुल बाल मृत्यु दर 

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय और राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार भारत ने बच्चों की मौतों को कम करने में काफी प्रगति की है. शिशु मृत्यु दर 2011 में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 44 से घटकर 2023 तक 25 हो गया. इसी तरह 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 2014 में 45 से घटकर 2021 में 31 हो गई. आपको बता दें कि इनमें से कई राज्यों ने पहले ही 2025 तक 25 से कम का लक्ष्य प्राप्त कर लिया. 

हिंदू बच्चों में मृत्यु दर ज्यादा 

 NFHS-5 के 2019-21 के डेटा विश्लेषण से यह पता चलता है कि हिंदू बच्चों में ऐतिहासिक रूप से मुस्लिम बच्चों की तुलना में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर ज्यादा रही है. हिंदुओं में अंडर 5 मोर्टेलिटी रेट अनुमान प्रति 1000 जीवित जन्मों पर लगभग 41.9 मौतों का लगाया गया है. हिंदू आबादी के अंदर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में जोखिम काफी ज्यादा है. यहां दरें प्रति 1000 पर लगभग 50 तक पहुंच सकती हैं.

मुस्लिम बच्चों में मृत्यु दर कम 

आपको बता दें कि मुस्लिम बच्चों में हिंदू बच्चों की तुलना में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर कम है. NFHS डेटा पर आधारित रिसर्च से यह पता चलता है कि मुस्लिम बच्चों के जीवित रहने की संभावना हिंदू बच्चों की तुलना में 17 से 18% ज्यादा है. यह ट्रेंड कई सर्वेक्षण में लगातार देखा गया है. 

नवजात शिशुओं की मौतें सबसे बड़ी चुनौती 

सभी धर्म में जीवन का पहला महीना सबसे जरूरी समय होता है. मौजूदा अनुमानों से यह पता चलता है कि 5 साल से कम उम्र की 50% से 73% मौतें नवजात अवस्था में ही हो जाती हैं. समय से पहले जन्म, कम जन्म का वजन और समय पर मेडिकल मदद की कमी मौत की सबसे बड़ी वजह हैं. गरीबी और कम मातृ शिक्षा, धर्म की परवाह के बिना शिशु मृत्यु दर के जोखिम को ढाई गुना तक बढ़ा सकती है.

ये भी पढ़ें: कितने राज्यों में महिलाओं को बांटा जा रहा कैश, जानें कहां सबसे ज्यादा मिलता है पैसा?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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