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Dollar Rupee Value: 1947 में रुपये के सामने क्या थी डॉलर की औकात, जानें साल-दर-साल कैसे आई गिरावट?

Dollar Rupee Value: भारतीय करेंसी इस वक्त काफी परेशानी से जूझ रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि आजादी के वक्त रुपये के सामने डॉलर की क्या कीमत थी.

Dollar Rupee Value: भारतीय रुपये ने हफ्ते का अंत मिले-जुले नोट पर किया. शुक्रवार को डॉलर के आउटफ्लो के डर से इसमें गिरावट देखने को मिली, लेकिन इसने लगभग 3 सालों में सबसे तेज साप्ताहिक बढ़ोतरी भी दर्ज की. इसी बीच आइए जानते हैं कि 1947 में रुपये के सामने डॉलर की क्या कीमत थी और साल दर साल कैसे आई गिरावट.

आजादी के समय डॉलर- रुपये का मूल्य 

जब भारत 1947 में आजाद हुआ तब एक्सचेंज रेट एक अमेरिकी डॉलर के लिए लगभग 3.30 रुपया था. उस समय रुपया आजादी से ट्रेड होने वाली करेंसी नहीं था. इसका मूल्य ब्रिटिश पाउंड से जुड़ा हुआ था. बंटवारे और औपनिवेशिक शोषण से हुई तबाही की बावजूद कागजों पर रुपये का मूल्य अभी भी काफी मजबूत था.

कब लगा पहला बड़ा झटका?

पहला बड़ा झटका 1966 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान लगा. भारत ने अभी-अभी दो युद्ध लड़े थे. 1962 में चीन के खिलाफ और 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ. इसी के साथ भारत सूखे और खाने की कमी का भी सामना कर रहा था. विदेशी मुद्रा भंडार पर काफी ज्यादा दबाव था. इस वजह से सरकार को रुपये का लगभग 57% अवमूल्यन करना पड़ा. डॉलर बढ़कर लगभग ₹7.50 हो गया.

तेल संकट और धीमी वृद्धि 

1973 का वैश्विक तेल संकट एक और बड़ा मोड लेकर आया. भारत जो डॉलर में भुगतान किए जाने वाले आयातित कच्चे तेल पर काफी ज्यादा निर्भर था, अब अपने आयात बिल की बढ़ोतरी को देख रहा था. 1970 के दशक के मध्य तक डॉलर ₹8.10 से ₹8.40 के आसपास ट्रेड हो रहा था. 1980 के दशक में बढ़ते ट्रेड डेफिसिट और बाहरी कर्ज ने रुपये को कमजोर करना जारी रखा. 1990 तक आते-आते डॉलर लगभग 17.50 रुपये तक पहुंच गया था.

1991 का बैलेंस ऑफ पेमेंट संकट 

शायद रुपये के इतिहास का सबसे अहम पल 1991 में आया. तब भारत को बैलेंस ऑफ पेमेंट के गंभीर संकट का सामना करना पड़ा. विदेशी मुद्रा भंडार मुश्किल से दो हफ्ते के इंपोर्ट के लिए काफी था. आर्थिक सुधार और लिबरलाइजेशन के तहत रुपये का कई चरणों में अवमूल्यन किया गया था. 1992 तक डॉलर 25.92 रुपये को पार कर गया था.

लिबरलाइजेशन से लगातार गिरावट 

21वीं सदी में रुपये की गिरावट चरणों में जारी रही है. 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट और 2013 के टेपर टैंट्रम ने डॉलर को ₹60 से ऊपर धकेल दिया. कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, महंगाई और पूंजी के बाहर जाने से दबाव और भी ज्यादा बढ़ा. 2014 तक यह दर ₹60 से ₹63 के आसपास बनी रही. 

फरवरी 2026 तक मजबूत अमेरिकी डॉलर, भू राजनीतिक तनाव, उच्च वैश्विक ब्याज दर और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा लगातार निकासी की वजह से विनिमय दर 90 रुपये प्रति डॉलर को पार कर गई है. 

रुपया कमजोर क्यों होता रहा?

रुपये के कमजोर होने के पीछे कई वजह रही. भारत निर्यात से ज्यादा आयात करता है खासकर कच्चा तेल और सोना. इससे डॉलर की लगातार मांग बनी रहती है. भारत में महंगाई आमतौर पर अमेरिका की तुलना में ज्यादा रही है. इस वजह से रुपये की खरीदने की शक्ति कम हुई है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां अक्सर वैश्विक पूंजी को डॉलर की तरफ खींचती है. इससे रुपये जैसी उभरती बाजार की मुद्राएं कमजोर होती हैं.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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