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आजादी के समय भारत में कितनी थी अंग्रेजों की आबादी, क्या इनकी भी जनगणना होती थी?

ब्रिटिश शासन के दौरान लाखों अंग्रेज भारत आए. कुछ सरकारी नौकरी के लिए, कुछ व्यापार के लिए और कुछ सेना में तैनात होने के लिए. कई दशकों तक ये अंग्रेज भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे रहे.

जब भारत 1947 में आजाद हुआ, तब यह सिर्फ एक राजनीतिक आजादी नहीं थी, बल्कि एक ऐतिहासिक मोड़ भी था. लगभग दो सदियों की ब्रिटिश हुकूमत का अंत हुआ था. इस अवधि में लाखों अंग्रेज भारत आए. कुछ सरकारी नौकरी के लिए, कुछ व्यापार के लिए और कुछ सेना में तैनात होने के लिए. इस तरह कई दशकों तक ये अंग्रेज भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे रहे.

लेकिन एक सवाल आज भी लोगों के मन रहता है कि जब आजादी का समय आया तो भारत की धरती पर मौजूद ब्रिटिश लोगों की संख्या क्या थी? क्या इनकी गिनती भी होती थी? क्या ये भी जनगणना में शामिल होते थे? तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि आजादी के समय भारत में अंग्रेजों की आबादी कितनी थी और क्या इनकी भी जनगणना होती थी. 

आजादी के समय भारत में अंग्रेजों की आबादी कितनी थी?

1947 में आजादी के समय, भारत में अनुमानित ब्रिटिश आबादी लगभग 10 लाख मानी जाती है. वहीं 1891 की जनगणना में भारत में अंग्रेजी मातृभाषा बोलने वालों की संख्या लगभग 2,38,409 थी. इसके बाद 1921 की जनगणना के अनुसार, भारत में ब्रिटिश नागरिकों की संख्या घटकर 1,65,485 रह गई थी. इस आबादी में लगभग 40,000 ब्रिटिश सैनिक, 2,000 से अधिक बड़े पद के अधिकारी, बड़ी संख्या में व्यापारी, प्रशासन और अन्य नागरिक और लगभग 10 लाख एंग्लो-इंडियन शामिल थे.

क्या अंग्रेजों की भी जनगणना होती थी?

भारत में जनगणना (Census) का इतिहास 1800 के दशक की शुरुआत से शुरू होता है. सबसे पहली अधिकारिक राष्ट्रीय जनगणना 1872 में हुई थी, लेकिन यह पूरी तरह समकालिक नहीं थी. वहीं पहली संपूर्ण और समकालिक जनगणना 1881 में हुई, जिसके बाद हर 10 साल में एक बार जनगणना होती रही. जनगणना में भारत की संपूर्ण आबादी, धर्म, भाषा, जाति, जन्म स्थान, आयु, शिक्षा और आजीविका जैसी जानकारियां दर्ज की जाती थीं. ब्रिटिश नागरिक, जो उस समय भारत में रहते थे, उनकी भी गिनती होती थी. हालांकि उन्हें एक जनजातीय या नस्लीय वर्गीकरण के तहत गिना जाता था, जैसे कि यूरोपीय मूल के लोग, अंग्रेज, स्कॉटिश, आयरिश या एंग्लो-इंडियन.

एंग्लो-इंडियन वे लोग थे जिनके माता-पिता में से एक यूरोपीय और दूसरा भारतीय होता था. ये लोग अक्सर अंग्रेजी बोलते थे, अंग्रेजी परंपराओं में विश्वास रखते थे, लेकिन ज्यादातर भारत में ही जन्मे और पले-बढ़े थे. वहीं आजादी के बाद, ज्यादातर अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए. ब्रिटिश सेना के जवान और अधिकारी वापस ब्रिटेन लौटे, व्यापारियों और अन्य नागरिकों ने भारत में अपना व्यवसाय समेट लिया, लेकिन सिर्फ कुछ लोग खासतौर पर एंग्लो-इंडियन भारत में रह गए. 

यह भी पढ़ें : भारत में नागरिकता पर मचा है बवाल, जानिए चीन और पाकिस्तान में कौन सा डॉक्यूमेंट मांगती है सरकार?

मानसी उपाध्याय करीब दो साल से डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं. मूल रूप से उत्तराखंड से जुड़ी मानसी ने अपनी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से पूरी की. इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की और वर्तमान में राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नलिज्म कर रही हैं. पत्रकारिता में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अक्टूबर 2024 में एबीपी नेटवर्क से की. अब वह डिजिटल कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें फीचर और इंफॉर्मेटिव स्टोरीज लिखने के साथ-साथ स्क्रिप्ट राइटिंग, सोशल मीडिया और रिसर्च आधारित कंटेंट तैयार करने में रुचि है. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखने वाली मानसी ऐसी स्टोरीज लिखना पसंद करती हैं, जो पाठकों को नई और जरूरी जानकारी आसान भाषा में दें. उनकी कोशिश रहती है कि कंटेंट सिर्फ जानकारी देने वाला ही नहीं, बल्कि पढ़ने में दिलचस्प और पाठकों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ भी हो.

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