आसमान में विमान में क्यों लगते हैं झटके, आखिर क्या है टर्बुलेंस?
Air Turbulence Phuket Delhi Flight: फुकेट से दिल्ली की ओर आ रही फ्लाइट को बीते दिन तगड़े एयर टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा. चलिए जानते हैं कि आखिर यह क्या होता है और कैसे बनता है.

- सीट बेल्ट न पहनने वालों को चोट का अधिक खतरा।
Air Turbulence Phuket Delhi Flight: बीते दिन फुकेट से दिल्ली आ रही एअर इंडिया की फ्लाइट एआई2379 जब आसमान में थी, तब अचानक झटका लगा और विमान की ऊंचाई थोड़ी कम हो गई. हालांकि विमान दिल्ली में पूरी तरह सुरक्षित उतरा और सभी यात्री व क्रू सदस्य सुरक्षित रहे. इस घटना के बाद कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर टर्बुलेंस क्या होता है, हवा में अचानक विमान झटके क्यों खाने लगता है और पायलट ऐसी स्थिति में क्या कदम उठाते हैं. आइए, इस पूरी प्रक्रिया के पीछे के विज्ञान को आसान भाषा में समझते हैं.
एयर टर्बुलेंस का क्या मतलब है?
एयर टर्बुलेंस का सीधा अर्थ हवा की उस अवांछित और असंतुलित चाल से है, जो आसमान में उड़ रहे विमान को अचानक ऊपर-नीचे या अगल-बगल हिला देती है. सामान्य परिस्थितियों में जब विमान उड़ता है, तो आसपास की हवा काफी हद तक शांत और स्थिर रहती है. लेकिन जब हवा के अलग-अलग हिस्सों में तापमान, दिशा या हवा की रफ्तार में अचानक बदलाव आ जाता है, तो वहां एक हलचल पैदा होती है. यात्रियों को यह हलचल झटकों के रूप में महसूस होती है. हल्के टर्बुलेंस में केवल मामूली कंपन होता है, जबकि तेज टर्बुलेंस में रखे हुए सामान गिरने का डर रहता है.
आसमान में झटके लगने की वजहें क्या हैं?
हवा में टर्बुलेंस पैदा होने के पीछे कई प्राकृतिक कारण काम करते हैं. इनमें सबसे आम है थर्मल टर्बुलेंस, जो गर्म और ठंडी हवा के आपस में टकराने से बनता है. खासकर गर्मी के दिनों में जब जमीन गर्म होती है, तो सतह की हवा तेजी से ऊपर उठती है और ऊपर मौजूद ठंडी हवा नीचे आती है, जिससे हवा में असंतुलन बनता है. इसके अलावा जब विमान पहाड़ी इलाकों के ऊपर से गुजरता है, तो हवा पहाड़ों से टकराकर लहरों की तरह व्यवहार करने लगती है, जिसे माउंटेन वेव टर्बुलेंस कहा जाता है.
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अब क्लियर एयर टर्बुलेंस भला क्या है?
टर्बुलेंस का सबसे जटिल रूप क्लियर एयर टर्बुलेंस (सीएटी) कहलाता है. इसकी सबसे बड़ी बात यह है कि यह बिना किसी बादल या खराब मौसम के, बिल्कुल साफ आसमान में होता है. यह अक्सर जेट स्ट्रीम के आसपास बनता है, जो अत्यधिक ऊंचाई पर पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली बहुत तेज हवा की पट्टी होती है. जब इस तेज हवा के किनारे पर धीमी गति की हवा आकर मिलती है, तो हवा में भंवर बनने लगते हैं. इसी तरह ट्रॉपोपॉज परत के पास जब तापमान और हवा का घनत्व बदलता है, तो वहां पैदा होने वाली तरंगें विमान को झटका देती हैं.
पायलट अचानक क्यों बदल देते हैं ऊंचाई?
जब विमान टर्बुलेंस वाले इलाके में फंसता है, तो पायलट तुरंत उसकी ऊंचाई बदल देते हैं. दरअसल, क्लियर एयर टर्बुलेंस अमूमन हवा की एक पतली परत में ही सीमित रहता है. ऐसे में जेट स्ट्रीम के इलाके में विमान को 2000 फीट ऊपर ले जाने या नीचे लाने से वह शांत हवा वाली परत में पहुंच जाता है. एअर इंडिया की फ्लाइट एआई2379 में भी ऊंचाई में जो क्षणिक बदलाव किया गया था, वह पायलट द्वारा अपनाया गया सुरक्षा उपाय था, न कि किसी खतरे की बात. पायलट वेदर रडार और दूसरे पायलटों से मिली रिपोर्ट्स के आधार पर सुरक्षित ऊंचाई तय करते हैं.

टर्बुलेंस से यात्रियों को क्या खतरा?
टर्बुलेंस के दौरान सबसे बड़ा जोखिम उन यात्रियों को होता है जिन्होंने सीट बेल्ट नहीं बांधी होती है. अचानक झटका लगने से व्यक्ति सीट से उछलकर केबिन की छत या आसपास की सख्त चीजों से टकरा सकता है, जिससे सिर या हड्डियों में चोट आ सकती है. जो केबिन क्रू उस वक्त यात्रियों को सर्विस दे रहे होते हैं, उनके चोटिल होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है. इसके अलावा अचानक झटकों से यात्रियों में घबराहट या जी मिचलाने की शिकायत हो सकती है. हालांकि आधुनिक विमानों की बनावट इतनी मजबूत होती है कि टर्बुलेंस से विमान के ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.
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