National Debt: अगर कोई देश कर्ज न चुका पाए तो क्या होगा, क्या उस पर कब्जा कर सकता है दूसरा देश?
National Debt: अगर कोई देश दूसरे देश का कर्ज चुकाने में कामयाब नहीं होता तब कुछ बड़े कदम उठाए जाते हैं. आइए जानते हैं इस बारे में पूरी जानकारी.

- ऋण न चुकाने पर किसी देश पर सैन्य कब्जा गैरकानूनी है।
- कर्ज चुकाने में विफल देश संपत्ति लीज पर देने को मजबूर होते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय अदालतें विदेशी संपत्तियों को जब्त कर ऋण वसूलती हैं।
- डिफॉल्ट से साख बिगड़ती है, IMF मदद से देश उबरते हैं।
National Debt: दुनिया भर के देश अक्सर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए पैसे उधार लेते हैं, बजट घाटे को मैनेज करते हैं या फिर आर्थिक संकटों से निपटते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर कोई देश अपना कर्ज नहीं चुका पाता तो क्या होता है? कई लोग ऐसा सोचते हैं कि कर्ज देने वाले देश कर्जदार देश की जमीन पर कब्जा कर सकते हैं या फिर उस पर कंट्रोल कर सकते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. आधुनिक इंटरनेशनल लॉ ऐसे कामों की इजाजत बिल्कुल भी नहीं देता. आइए जानते हैं कैसे काम करता है यह कानून.
कर्ज के लिए किसी देश पर कब्जा नहीं किया जा सकता
अगर कोई देश अपना कर्ज नहीं चुका पाता तो मौजूदा इंटरनेशनल कानून और यूनाइटेड नेशंस के सिद्धांतों के तहत कोई भी देश कानूनी तौर पर किसी दूसरे देश पर हमला नहीं कर सकता, उस पर कब्जा नहीं कर सकता या फिर उसे अपने में मिला नहीं सकता. इंटरनेशनल समझौतों के तहत राष्ट्रीय संप्रभुता सुरक्षित है. इस वजह से कर्ज की वसूली के लिए सैन्य कार्रवाई गैरकानूनी है.
जब भी कोई सरकार अपनी बाहरी देनदारी को चुकाने में कामयाब नहीं हो पाती तो आम तौर पर उसे सॉवरेन डिफॉल्ट की स्थिति में माना जाता है. इसका मतलब है कि देश अपने कर्ज पर तय समय पर पेमेंट करने में कामयाब नहीं रहा.
लीज पर दी जा सकती हैं संपत्तियां
हालांकि सैन्य कब्जा मुमकिन नहीं है लेकिन कर्ज देने वाले देश वित्तीय समझौतों के जरिए अपनी शक्ति दिखा सकते हैं. कुछ मामलों में भारी कर्ज वाले देशों को लंबे समय के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर संपत्तियों को लीज पर देने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
इसका सबसे बड़ा उदाहरण श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट है. इसे चीन को 99 साल के लिए लीज पर दिया गया था. ऐसे इसलिए क्योंकि वित्तीय दिक्कतों की वजह से कर्ज को मैनेज करना काफी मुश्किल हो गया था.
विदेशी संपत्तियों को निशाना बनाया जा सकता है
कर्ज देने वाले देश इंटरनेशनल कोर्ट के जरिए भी पैसे वसूलने की कोशिश कर सकते हैं. अगर वे कामयाब हो जाते हैं तो डिफॉल्ट करने वाले देश की विदेशी अधिकार क्षेत्र में मौजूद संपत्तियों को जब्त किया जा सकता है. इन संपत्तियों में सरकार के स्वामित्व वाले विमान, विदेशी बैंक खाते, कमर्शियल प्रॉपर्टी या फिर विदेश से होने वाली कमाई शामिल हो सकती है. इस तरह की कानूनी लड़ाइयां अक्सर सालों तक चलती हैं और पहले से ही मुश्किल से घिरी अर्थव्यवस्था पर और भी ज्यादा दबाव डाल सकती है.
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इंटरनेशनल स्तर पर उधार लेना काफी मुश्किल
सॉवरेन डिफॉल्ट से ग्लोबल वित्तीय बाजारों में देश की साख को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचता है. बड़ी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आमतौर पर देश की क्रेडिट रेटिंग को जंक स्टेटस या फिर उससे भी नीचे डाल देती हैं.
इसके बाद इंटरनेशनल लेंडर, प्राइवेट इन्वेस्टर और दूसरे वित्तीय संस्थान नए कर्ज देने में हिचकते हैं. अगर किसी तरह फंडिंग मिल भी जाती है तो उधार लेने की लागत तेजी से बढ़ जाती है.
देश इस मुश्किल से कैसे उभरते हैं?
चुनौतियों के बावजूद भी सॉवरेन डिफॉल्ट इसका मतलब यह नहीं है कि देश का पूरा अस्तित्व ही खत्म हो जाए. सरकार आमतौर पर अपने कर्ज को रिस्ट्रक्चर करने के लिए लेनदारों से बातचीत करती है. इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड जैसे कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठन अक्सर वित्तीय सहायता पैकेज देते हैं. इन्हें आमतौर पर बेलआउट कहा जाता है. इसके बदले में देश को आमतौर पर आर्थिक सुधार लागू करने, खर्च को कम करने, टैक्स बढ़ाने या फिर वित्तीय प्रबंधन में सुधार करने की जरूरत होती है.
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