भारत के अलावा पाकिस्तान में भी हो चुके सीजेपी जैसे प्रोटेस्ट, जानिए किन मांगों को लेकर धरने पर बैठे थे छात्र?
दिल्ली में सीजेपी के उग्र छात्र प्रदर्शन के बीच पाकिस्तान के छात्र आंदोलनों का इतिहास भी जान लीजिए. वहां छात्र यूनियनों पर लगे प्रतिबंध, फीस वृद्धि, असुरक्षा और राजनीतिक तानाशाही के खिलाफ कई प्रदर्शन हो चुके हैं.

राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में छात्रों का बड़ा विरोध प्रदर्शन जारी है. इस प्रदर्शन में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज के बाद यह लगातार हर दिन अक्रामक रूप ले रहा है. वहीं पर्यावरण कार्यकर्ता भी लगातार 25 दिन से भूख हड़ताल पर हैं. छात्रों पर लाठीचार्ज के बाद प्रदर्शन की आंच देश के अन्य कई शहरों में भी पहुंच गई है. आइए जानें कि सीजेपी की तरह से पाकिस्तान में कब छात्रों ने आंदोलन किया और उनके मुद्दे क्या थे.
छात्र यूनियनों पर लगा प्रतिबंध
पाकिस्तान में छात्रों के आंदोलन का एक बड़ा आधार यूनियनों की बहाली रहा है. साल 1984 में तत्कालीन सैन्य शासन के दौर में छात्र संघों की गतिविधियों पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई थी. इस प्रतिबंध को हटाने और परिसरों में लोकतांत्रिक अधिकार वापस पाने के लिए वहां की युवा पीढ़ी दशकों से लगातार आवाज उठाती आ रही है. भारत में सीजेपी के मौजूदा प्रदर्शनों की तरह ही सरहद पार भी छात्रों की सबसे बड़ी बुनियादी और प्रमुख मांग यह रही है कि उनको परिसरों में अपने विचार रखने और संगठन बनाने की अनुमति दी जाए.
फीस बढ़ोतरी और आर्थिक संकट के खिलाफ आंदोलन
यूनियनों के अधिकार के अलावा भारी आर्थिक दबाव और शिक्षा के निजीकरण ने भी पाकिस्तान में बार-बार बड़े छात्र आंदोलनों को जन्म दिया है. विश्वविद्यालयों में बेतहाशा बढ़ती ट्यूशन फीस, उच्च शिक्षा के बजट में कटौती और परीक्षा प्रणालियों में गड़बड़ियों के खिलाफ छात्र सड़कों पर उतरते रहे हैं. देश में बढ़ती महंगाई और शैक्षणिक संस्थानों में सुविधाओं की कमी ने युवाओं के गुस्से को भड़काने का काम किया है. इन आर्थिक और शैक्षणिक वजहों से पाकिस्तान के अलग-अलग प्रांतों में समय-समय पर उग्र आंदोलन हुए हैं.
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परिसरों में सुरक्षा और न्याय की मांग
शैक्षणिक संस्थानों के अंदर सुरक्षा व्यवस्था की बदहाली और प्रशासनिक जवाबदेही की कमी भी एक बड़ा मुद्दा रही है. यौन उत्पीड़न की घटनाओं पर पर्दा डालने, छात्रों की सुरक्षा में चूक और बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के छात्र कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जानें या लापता किए जाने के खिलाफ जोरदार धरने दिए गए. जब भी परिसरों में छात्रों के अधिकारों और सम्मान पर आंच आई तो युवाओं ने शासन और प्रशासन के खिलाफ लामबंद होकर न्याय की मांग की, जिससे पूरे देश में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक दबाव कायम हुआ.
पाकिस्तान में छात्र आंदोलनों का इतिहास
पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि छात्र क्रांतियों ने देश के बड़े-बड़े राजनीतिक मोड़ तय किए हैं. साल 1968-69 के एतिहासिक छात्र-मजदूर आंदोलन ने तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान को अपना पद छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था. इसके बाद 2007-08 में परवेज मुशर्रफ के शासन के खिलाफ न्यायपालिका की बहाली के लिए छात्रों ने बड़ी भूमिका निभाई. वर्ष 2018 से 2020 के बीच स्टूडेंट सॉलिडैरिटी मार्च देश के 50 से अधिक शहरों में फैल गया, जबकि 2024 से 2026 के दौरान पंजाब प्रांत और अन्य हिस्सों में भी सुरक्षा तथा आर्थिक मुद्दों पर व्यापक आंदोलन देखे गए.
























