Venezuela Earthquake: आंधी से लेकर तूफान, बारिश से लेकर सुनामी तक... सबकी भविष्यवाणी कर लेते हैं वैज्ञानिक, लेकिन भूकंप की क्यों नहीं?
Venezuela Earthquake: वेनेजुएला में 7.5 और 7.2 मैग्नीट्यूड के दो भूकंपों ने तबाही मचा दी है, जिसके बाद सुनामी की चेतावनी जारी हो गई है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज तक भूकंप की भविष्यवाणी क्यों नहीं पाई है?

Venezuela Earthquake: अमेरिकी देश वेनेजुएला में लगातार दो बार आए तगड़े भूकंप ने सब तहस-नहस करके रख दिया है. मलबे में तब्दील हुई इमारतें और अपनों को तलाशते लोग विज्ञान की उस लाचारी को बयां कर रहे हैं, जो कि आज के आधुनिक दौर में भी इंसानी जिंदगियों को बचाने के लिए छोटी साबित होती है. इस दौरान सबसे पहला सवाल यह उठता है कि हमारे वैज्ञानिक अंतरिक्ष की गहराइयों को नाप चुके होते हैं, वे तीन-चार दिन पहले ही आने वाले भयंकर चक्रवात, आंधी-तूफान और सुनामी तक की सटीक जानकारी दे देते हैं, तो आखिर धरती के नीचे आने वाले इस भूकंप के आगे वे लाचार क्यों हो जाते हैं? क्यों इसकी कोई सटीक भविष्यवाणी नहीं हो पाती है, चलिए जानें.
कैसे हो पाती है मौसम की निगरानी?
मौसम से जुड़ी हर आफत जैसे कि चक्रवात, आंधी या बारिश खुले आसमान के नीचे ही होती है. सैटेलाइट और अत्याधुनिक रडार बादलों की आवाजाही, हवा की रफ्तार और वायुमंडल के बदलते दबाव को लगातार नापते रहते हैं. इससे वैज्ञानिकों को यह समझने का पूरा मौका मिल जाता है कि कोई तूफान कब-कहां और कितनी ताकत के साथ दस्तक दे सकता है. वहीं भूकंप का सारा खेल धरती के नीचे होता है. यह हमारी नजरों से कोसों दूर जमीन की उस गहराई में होता है, जहां पर कोई भी कैमरा, रडार या फिर सैटेलाइट नहीं झांक सकता है. इसीलिए मौसम का मिजाज समझना आसान है, लेकिन धरती का रोष नहीं.
वैज्ञानिक पहले से क्यों नहीं लगा पाते भूकंप का अंदाजा?
धरती के कई किलोमीटर नीचे की तरफ टेक्टॉनिक प्लेट्स हमेशा बेहद धीमी गति से खिसकती रहती हैं. जब भी ये प्लेंटे आपस में टकराती हैं तो उनके किनारों पर मौजूद चट्टानों के बीच भारी दबाव और तनाव पैदा हो जाता है. यह तनाव सालों-साल, दशकों तक अंदर ही अंदर बढ़ता चला जाता है और फिर एक ऐसा अंतिम बिंदु होता है, जब चट्टानें अचानक टूट जाती हैं. यह पूरी प्रक्रिया इतनी गहराई में और इतनी अचानक होती है कि सतह पर बैठे वैज्ञानिकों को इस बात का पहले से अंदाजा नहीं लग पाता है. जमीन के अंदर इस अदृश्य हलचल को पहले से भांपकर 2-4 दिन पहले से एकदम सटीक जानकारी देने वाली तकनीक दुनिया में अभी नहीं है.
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फिर कैसे पकड़ ली जाती है तूफान और सुनामी की चाल?
आंधी-तूफान जैसी मौसम प्रणालियां बहुत धीमी गति से आगे बढ़ती हैं, जिससे उनके रास्ते और ताकत का अंदाजा लगाना आसान हो जाता है. अगर सुनामी की बात की जाए तो वह ज्यादातर भूकंप के बाद आती है. जब समुद्र के नीचे की धरती हिलती है, तो पानी की ऊंची-ऊंची लहरों को तट तक पहुंचने में कुछ मिनट या घंटों का वक्त लगता है. बस इसी समय के फासले का फायदा उठाकर वैज्ञानिक तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए समय रहते सुरक्षित चेतावनी जारी कर देते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान कम होता है.
भविष्यवाणी और त्वरित चेतावनी में अंतर
भले ही वैज्ञानिक यह न बता पाएं कि कल सुबह किस शहर में भूकंप आएगा, लेकिन पुराने इतिहास को देखते हुए वे यह जरूर बता सकते हैं कि कौन सा इलाका कितना संवेदनशील है. इसे भूकंप का पूर्वानुमान कहा जाता है. इसके अलावा आजकल अर्थक्वेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है. इस दौरान भूकंप आने पर जो पहली तेज तरंगें निकलती हैं, वो नुकसान नहीं पहुंचातीं. तभी जमीन के अंदर लगे सेंसर इनको पकड़ लेते हैं और तबाही मचाने वाली तरंगों के पहुंचने से कुछ सेकेंड या मिनट भर पहले अलार्म बजा देते हैं, जिससे लोगों को बचने का कुछ समय मिल सकता है, लेकिन ये मौसम की तरह 3-4 दिन पहले से भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं.
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