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International Space Station: स्पेस स्टेशन में कहां से पहुंचती है बिजली, वहां कहां होता है पावर हाउस?

International Space Station: अंतरिक्ष में पृथ्वी का चक्कर लगाता हुआ स्पेस स्टेशन आखिर बिजली कहां से लाता है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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  • अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन मुख्य रूप से सौर ऊर्जा से चलता है।
  • आठ विशाल सौर पंख 84-120 किलोवाट बिजली उत्पन्न करते हैं।
  • इसकी बिजली उत्पादन प्रणाली ट्रस संरचना में एकीकृत है।
  • अंधेरे में लिथियम-आयन बैटरी स्टेशन को बिजली देती है।

International Space Station: इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पृथ्वी के चारों तरफ घूमते हुए एक छोटे शहर की तरह काम करता है. यह जीवन रक्षक प्रणाली और वैज्ञानिक प्रयोगशाला से लेकर कंप्यूटर और संचार उपकरण तक हर चीज को बिजली देता है. लेकिन पृथ्वी पर मौजूद शहरों के उलट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में कोई भी कोयला संयंत्र, परमाणु रिएक्टर या फिर डीजल जनरेटर नहीं होता. इसके बजाय यह पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर ही निर्भर होता है.

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के लिए बिजली का मुख्य स्रोत 

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन 8 बड़े सौर सरणी विंग्स पर निर्भर होता है. यह इनका इस्तेमाल करके बिजली पैदा करता है. ये कुल मिलाकर लगभग 1 एकड़ क्षेत्र को कवर करते हैं. ये सौर पैनल फोटोवोल्टिक तकनीक का इस्तेमाल करके सूरज की रोशनी को सीधे डायरेक्ट करंट बिजली में बदल देते हैं. 

सामान्य स्थितियों में सौर सरणियां 84 से 120 किलो वाट के बीच बिजली पैदा करती हैं. इनमें से लगभग 75 से 90 किलोवाट बिजली स्टेशन की प्रणाली, वैज्ञानिक प्रयोग, संचार उपकरण और जीवन रक्षक बुनियादी ढांचे को चलाने के लिए मौजूद होती है. 

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स्पेस स्टेशन का पावर हाउस कहां है? 

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में पृथ्वी पर पाए जाने वाले पावर हाउस जैसा कोई भी अलग से पावर हाउस नहीं होता. इसके बजाय इसकी पूरी बिजली उत्पादन प्रणाली इंटीग्रेटेड ट्रस स्ट्रक्चर में बनी है. यह स्टेशन के आर-पार फैला एक लंबा बाहरी ढांचा है. 

यह ट्रस सौर पैनल, बैटरी, विद्युत नियंत्रण इकाई और बिजली वितरण उपकरण को सहारा देता है. इसी के साथ अंतरिक्ष यात्री दबाव युक्त मॉड्यूल के अंदर रहते हैं और काम करते हैं, ट्रस स्टेशन के ऊर्जा केंद्र के रूप में काम करता है, जो लगातार बिजली को पैदा करता है और उसका प्रबंधन भी करता है.

बिजली उत्पादन को ज्यादा से ज्यादा करने के लिए ट्रस में घूमने वाले जोड़ लगे होते हैं जिन्हें गिम्बल कहा जाता है. ये सौर पैनलों को अपने आप से घूमाते हैं ताकि वे सूरज की तरफ पॉइंटेड रहें, साथ ही स्टेशन पृथ्वी की परिक्रमा करता है.

अंधेरे के दौरान कैसे मिलती है बिजली? 

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन हर 90 मिनट में एक चक्कर लगाता है. साथ ही हर कक्षा के दौरान लगभग 45 मिनट सूरज के प्रकाश में और 45 मिनट पृथ्वी की छाया में बिताता है. निर्बाध बिजली आपूर्ति को पक्का करने के लिए स्टेशन शक्तिशाली लिथियम आयन बैटरी को चार्ज करता है. जैसे ही इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन अपनी कक्षा के अंधेरे इस समय प्रवेश करता है ये बैटरियां अपने आप से बिजली के आपूर्ति शुरू कर देती हैं.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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