World War Survival Countries: तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो बचेंगे सिर्फ ये दो देश, भारत का नाम नहीं है शामिल
World War Survival Countries: अगर तीसरा विश्व युद्ध होता है तो सिर्फ दो ही ऐसे देश हैं जो बच सकते हैं. आइए जानते हैं कौन से हैं वे देश और आखिर क्या है इसके पीछे की वजह.

World War Survival Countries: मिडिल ईस्ट में बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन ने एक बार फिर से तीसरे वर्ल्ड वॉर की संभावना को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ा दी है. एक्सपर्ट ने यह चेतावनी दी है कि अगर बड़े पैमाने पर न्यूक्लियर लड़ाई होती है तो इसके नतीजे पूरी दुनिया के लिए काफी ज्यादा बुरे हो सकते हैं. साइंटिफिक स्टडीज से ऐसा पता चलता है कि हजारों न्यूक्लियर हथियारों के इस्तेमाल से दुनिया भर में एनवायरमेंटल तबाही हो सकती है. इसे न्यूक्लियर विंटर कहा जाता है. लेकिन इस खतरे के बीच सिर्फ दो ही ऐसे देश हैं जो बच सकते हैं. आइए जानते हैं कौन से हैं वे देश.
सिर्फ बच सकते हैं दो ही देश
साइंटिफिक जनरल नेचर में छपी एक पीयर रिव्यूड स्टडी से ऐसा पता चलता है कि ग्लोबल न्यूक्लियर वॉर के बाद बचने के लिए शायद कुछ ही इलाकों में जरूरी हालात हों. रिसर्चर्स के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दो ऐसे देश हैं जिनके बचने की सबसे ज्यादा संभावना है. उनका ज्योग्राफिकल आइसोलेशन, मजबूत एग्रीकल्चरल सिस्टम और आसपास के समुद्र उन्हें न्यूक्लियर विंटर के दौरान होने वाले काफी ज्यादा क्लाइमेट चेंज का सामना करने में मदद कर सकते हैं. साइंटिस्ट्स का ऐसा मानना है कि इन देशों को अभी भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा लेकिन वह कुछ खाना उगाने और सीमित इंसानी आबादी को बनाए रखने की क्षमता को संभाल सकते हैं.
न्यूक्लियर वॉर से आने वाली सर्दी
एक्सपर्ट्स का ऐसा कहना है कि न्यूक्लियर वॉर का सबसे बड़ा खतरा सिर्फ धमाके नहीं होंगे. दरअसल उसके बाद होने वाला एनवायरमेंटल नुकसान सबसे ज्यादा खतरनाक है. न्यूक्लियर वाॅरफेयर एनालिस्ट एनी जैकबसैन के मुताबिक न्यूक्लियर धमाकों से निकलने वाले बड़े आग के गोले 100 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक के टेंपरेचर तक पहुंच सकते हैं. जैकबसेन का ऐसा कहना है कि तुरंत होने वाले तंबाकू से लाखों लोग मारे जा सकते हैं लेकिन लंबे समय तक चलने वाले असर और भी खतरनाक होंगे. आयोवा और यूक्रेन जैसे एग्रीकल्चरल इलाकों में लगभग एक दशक तक बर्फबारी और जमने वाली ठंड पड़ सकती है. इससे खेती करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा.
क्या होता है न्यूक्लियर विंटर?
न्यूक्लियर विंटर सिर्फ काफी ज्यादा ठंड नहीं होती. दरअसल यह एक ग्लोबल क्लाइमेट कोलैप्स है. यह न्यूक्लियर धमाकों के बाद एटमॉस्फियर में घुसने वाली भारी धुएं और कालिख से शुरू होता है. वैज्ञानिकों का ऐसा कहना है कि लगभग डेढ़ सौ मिलियन टन कालिख ऊपरी एटमॉस्फियर में निकल सकती है. इससे सूरज की रोशनी धरती की सतह तक नहीं पहुंच पाएगी. इससे ग्लोबल टेंपरेचर काफी ज्यादा कम हो जाएगा पर प्लेनेट का क्लाइमेट सिस्टम पूरी तरह से बिगड़ जाएगा. दुनिया भर में बारिश 90% तक कम हो सकती है. यहां तक कि जो लोग शुरुआती धमाकों में बच भी गए थे उन्हें भी बड़े पैमाने पर खाने की कमी का सामना करना पड़ेगा.
अरबों लोग भुखमरी से मारेंगे
रिसर्चर्स का ऐसा मानना है कि शुरुआती न्यूक्लियर धमाकों में बचने वाले दो से तीन बिलियन लोग बाद में अकाल से मार सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि ग्लोबल एग्रीकल्चर खत्म हो जाएगा. सूरज की रोशनी के ब्लॉक होने पर टेंपरेचर में तेजी से गिरावट के साथ दुनिया के कई हिस्सों में सालों तक खाने का प्रोडक्शन नामुमकिन हो जाएगा. यही वजह है कि साइंटिस्ट्स का ऐसा मानना है कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बचने के बेहतर चांस हो सकते हैं. उनके आसपास के समुद्र टेंपरेचर में गिरावट को कम कर सकते हैं और सीमित एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं.
जिंदा रहना फिर भी मुश्किल होगा
जिन देशों को काफी सुरक्षित माना जा रहा है वहां पर भी जिंदा रहना आसान नहीं होगा. लोगों को खाने की काफी ज्यादा कमी, रेडिएशन का खतरा और हवा के धुएं की वजह से लंबे समय तक अंधेरे का सामना करना पड़ सकता है. कई जिंदा बचे लोगों को रेडिएशन और खराब मौसम से खुद को बचाने के लिए जमीन के नीचे बने शेल्टर में रहना पड़ सकता है. हालांकि बड़े झगड़े वाले इलाकों से अलग रहने से कुछ सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन इसके बावजूद भी जिंदगी काफी मुश्किल होगी.
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