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Savarkar Death Anniversary: कश्मीर के बारे में क्या कहते थे सावरकर, आजादी मिलने के तुरंत बाद क्या दी थी चेतावनी?

आज देश के क्रांतिकारी देशभक्त वीर सावरकर की पुण्यतिथी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कश्मीर और अखंड भारत को लेकर उनका क्या पक्ष था? जानिए आजादी के बाद कश्मीर को लेकर उन्होंने क्या कहा था?

क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर आज यानी 26 फरवरी के दिन साल 1966 में अपनी आखिरी सांस ली थी. वीर सावरकर ना सिर्फ देश के लिए समर्पित स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि वो महान देशभक्त, क्रांतिकारी, चिंतक, लेखक, कवि, वक्ता और देश को गौरवशाली बनाने के लिए दूरदर्शी दृष्टि रखते थे. लेकिन आज हम आपको ये बताएंगे कि वीर सावरकर का कश्मीर को लेकर क्या सोच थी और वो इसको लेकर क्या कहते थे.

वीर सावरकर का जीवन

विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 को महाराष्ट्र के नासिक शहर के पास भागूर गांव में दामोदर और राधाबाई सावरकर के मराठी ब्राह्मण हिंदू परिवार में हुआ था. उनके भाई-बहन गणेश, मैनाबाई और नारायण थे. लेकिन वीरसावरकर अपनी बहादुरी के लिए जाने जाते थे, इसलिए उन्हें सावरकर से पहले 'वीर' उपनाम मिला था. 1902 में मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करके उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कालेज से बी॰ए॰ किया था.

जब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें जेल में डाला

बता दें कि भारत में वीर सावरकर के बड़े भाई ने 'इंडियन काउंसिल एक्ट 1909 जिसे मिंटो-मॉर्ले रिफॉर्म के नाम से भी जाना जाता है, उसके खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन किया था. इस दौरान ब्रिटिश पुलिस ने दावा किया था कि वीर सावरकर ने अपराध की साजिश रची थी और उनके खिलाफ वारंट जारी किया था. उस वक्त गिरफ्तारी से बचने के लिए वीर सावरकर पेरिस चले गए थे. जहां उन्होंने भीकाजी कामा के आवास पर शरण ली थी. लेकिन 13 मार्च, 1910 को उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. उस वक्त पेरिस में गिरफ्तारी होने के कारण अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का स्थायी न्यायालय ब्रिटिश अधिकारियों और फ्रांसीसी सरकार के बीच विवाद को संभाल रहा था. जिसको लेकर 1911 में फैसला सुनाया गया था.  

इस फैसले के मुताबिक 50 साल की कैद की सजा सुनाई गई और उन्हें वापस बंबई भेज दिया गया था. जिसके बाद 4 जुलाई 1911 को अंडमान और निकोबार द्वीप ले जाया गया था. वहां उन्हें काला पानी के नाम से फेमस 'सेल्यूलर जेल' में बंद कर दिया गया था. जहां जेल में उन्हें बहुत यातनाएं दी गई थी. लेकिन उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्रता की भावना जारी रही थी. जहां लगभग 12 साल तक वह कैद रहे थे.

कश्मीर को लेकर क्या थी सोच

क्या आप जानते हैं कि कश्मीर को लेकर वीर सावरकर की सोच क्या थी? सावरकर का एक विचार हमेशा से था, एक ईश्वर, एक देश, एक लक्ष्य, एक जाति, एक जीवन, एक भाषा. कश्मीर और देश को लेकर उनका कहना था कि ‘कश्मीर से रामेश्वरम तक एक भारत’.  

सावरकर की कश्मीर यात्रा

क्या आप जानते हैं कि सावरकर ने कश्मीर यात्रा भी की थी. बता दें कि जुलाई 1942 में सेहत खराब होने के बावजूद सावरकर एक से ज़्यादा बार कश्मीर गए थे. इतिहासकारों के मुताबिक 1942 में कश्मीर जाने पर जम्मू में कुछ मुस्लिमों समेत हिंदू बहुल 40 हज़ार लोगों ने सावरकर का स्वागत किया था. लेकिन जब वो रावलपिंडी गए थे, तो उस वक्त उनसे पूछा गया था कि कश्मीर में क्या बहुमत का सिद्धांत नहीं होना चाहिए? मुस्लिम बहुल आबादी के लिए हिंदू राजा क्यों होना चाहिए? इसको लेकर सावरकर ने कहा था कि 'मैं चाहता हूं कि कश्मीर के मुस्लिम इसी सिद्धांत की बात भोपाल और हैदराबाद के मामले में भी करें, जहां आबादी हिंदू बहुल है और मुस्लिम शासक हैं'.

कश्मीर में आने वाले खतरे की दी चेतावनी

बता दें कि आज़ादी मिलने के कुछ ही दिनों बाद सितंबर 1947 में सावरकर ने कश्मीर को लेकर चेतावनी दी थी. उन्होंने उस वक्त कहा था कि कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठ का खतरा होगा, जिस पर निगरानी रखते हुए निर्णायक कदम उठाए जाने चाहिए. 

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गिरिजांश गोपालन को मीडिया इंडस्ट्री में चार साल से ज्यादा का अनुभव है. फिलहाल वह डिजिटल में सक्रिय हैं, लेकिन इनके पास प्रिंट मीडिया में भी काम करने का तजुर्बा है. दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद गिरिजांश ने नवभारत टाइम्स अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की. उन्हें घूमना बेहद पसंद है. पहाड़ों पर चढ़ना, कैंपिंग-हाइकिंग करना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना उनकी हॉबी में शुमार है। यही कारण है कि वह तीन साल से पहाड़ों में ज्यादा वक्त बिता रहे हैं. अपने अनुभव और दुनियाभर की खूबसूरत जगहों को अपने लेखन-फोटो के जरिए सोशल मीडिया के रास्ते लोगों तक पहुंचाते हैं.
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