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Self Defence में जानलेवा हमला कब नहीं होता अपराध, क्या है कानून?

Swatantra Bhardwaj Controversy: स्वतंत्र भारद्वाज ने यह बयान दिया कि प्रोटेस्ट के दौरान उन्होंने जो कदम उठाया वह आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई थी. आइए जानते हैं इस मामले में क्या कहता है कानून.

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  • स्वतंत्र भारद्वाज ने जंतर मंतर घटना में आत्मरक्षा का दावा किया।
  • भारतीय न्याय संहिता निजी बचाव का अधिकार सशर्त प्रदान करती है।
  • जानलेवा बल का प्रयोग कुछ गंभीर खतरों में ही मान्य है।
  • आत्मरक्षा बदले का अधिकार नहीं, खतरा टलते ही समाप्त।

Swatantra Bhardwaj Controversy: भारतीय कानून के तहत खुद की सुरक्षा का अधिकार तो है लेकिन यह किसी व्यक्ति को हिंसा करने की असीमित इजाजत बिल्कुल भी नहीं देता. यह मुद्दा चर्चा में आ चुका है क्योंकि स्वतंत्र भारद्वाज ने जंतर मंतर की घटना के बारे में अपना पक्ष रखा और इस बात का दावा किया कि उन पर जो भी हिंसा का आरोप लगा है वह असल में आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई थी. उन्होंने कहा कि उन्हें डर था कि अगर उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया होता तो भीड़ उन्हें पीट-पीटकर मार डालती है. इससे एक बड़ा कानूनी सवाल उठता है कि आत्मरक्षा में किया गया जानलेवा काम कब कानूनी तौर पर सही ठहराया जा सकता है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

क्या कहती है भारतीय न्याय संहिता? 

भारतीय न्याय संहिता के तहत निजी बचाव का अधिकार किसी व्यक्ति को कुछ गंभीर खतरों से खुद को या फिर किसी दूसरे व्यक्ति को बचाने की इजाजत देता है. खास हालातों में इस अधिकार के तहत हमलावर की जान भी ली जा सकती है. हालांकि कानून इस बात पर भी अहम पाबंदी लगाता है कि इस अधिकार का इस्तेमाल कैसे और कब किया जा सकता है. 


Self Defence में जानलेवा हमला कब नहीं होता अपराध, क्या है कानून?

निजी बचाव के बारे में कानून क्या कहता है? 

निजी बचाव का अधिकार अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 35 से 44 के तहत आता है. इसका मूल सिद्धांत यह है कि जब कोई व्यक्ति निजी बचाव के कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त अधिकार के दायरे में काम करता है तो वह कोई अपराध नहीं करता. हालांकि इस्तेमाल की गई ताकत को हालात के हिसाब से सही ठहराया जाना काफी ज्यादा जरूरी है. 

आत्मरक्षा में हमलावर की जान कब ली जा सकती है? 

भारतीय न्यायाधीश संहिता की धारा 38 के तहत कुछ गंभीर हालातो में निजी बचाव के अधिकार के तहत हमलावर की जान भी ली जा सकती है. 

जान का खतरा 

जब यह उचित आशंका हो कि हमले से आपकी या फिर किसी दूसरे व्यक्ति की जान जा सकती है. 

गंभीर चोट का खतरा 

जब हमले से शरीर पर गंभीर या फिर स्थायी चोट लगने का तुरंत खतरा हो.

बलात्कार की कोशिश 

बलात्कार के इरादे से किए गए हमले को रोकने के लिए जरूरी होने पर जानलेवा बल का इस्तेमाल सही ठहराया जा सकता है.

कुछ यौन अपराध 

इस प्रावधान में खास अप्राकृतिक यौन कृत्यों से जुड़े हमले भी शामिल हैं.

अपहरण 

किसी व्यक्ति को जबरन अगवा करने या फिर अपहरण करने की कोशिश को रोकने के लिए निजी बचाव का अधिकार इस्तेमाल किया जा सकता है.

एसिड अटैक 

यह तब लागू हो सकता है जब एसिड अटैक या फिर गंभीर चोट पहुंचाने वाली कोशिश को रोकना जरूरी हो.

गलत तरीके से कैद करना 

यह अधिकार गैर कानूनी तरीके से कैद करने के मामले में भी लागू हो सकता है, जहां व्यक्ति के पास सरकारी अधिकारियों से मदद मांगने का कोई उचित मौका ना हो. 


Self Defence में जानलेवा हमला कब नहीं होता अपराध, क्या है कानून?

आत्मरक्षा का मतलब बदला लेना नहीं 

सबसे जरूरी सीमाओं में से एक यह है कि निजी बचाव एक सुरक्षात्मक अधिकार है ना कि बदला लेने का अधिकार. उदाहरण के लिए अगर कोई किसी व्यक्ति पर हमला करता है और फिर भाग जाता है तो खतरा टलने के बाद भी उस व्यक्ति को मारना या फिर घायल करना आत्मरक्षा नहीं माना जाएगा.  जैसे ही तुरंत का खतरा खत्म हो जाता है बचाव के लिए बल का इस्तेमाल का कानूनी आधार भी खत्म हो जाता है.

बल का इस्तेमाल खतरे से जुड़ा होना चाहिए 

कानून हर तरह के हमले के खिलाफ जानलेवा बल का इस्तेमाल करने की खुली छूट बिल्कुल भी नहीं देता. खतरे की प्रकृति और उस पर दी गई प्रतिक्रिया दोनों की एक साथ जांच की जानी चाहिए. 

अगर किसी व्यक्ति पर मामूली हमला होता है या फिर मौखिक बहस होती है और वह जानलेवा हिंसा से जवाब देता है तो इस बात पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं कि क्या उसे वास्तव में निजी बचाव का अधिकार था या फिर नहीं. 

इसी के साथ इसका आकलन सिर्फ इस्तेमाल किए गए हथियारों की तुलना करके नहीं किया जा सकता. कानूनी फैसले के लिए आसपास की स्थिति और खतरे की तात्कालिकता और व्यक्ति को नुकसान की उचित आवश्यकता जैसे पहलू भी मायने रखते हैं.

यह भी पढ़ेंः दुनिया में कौन तय करता है Crude Oil के दाम, इसमें ईरान का कितना रोल?

अगर पुलिस या फिर सरकारी अधिकारी शामिल हों तो क्या होगा?

भारतीय न्याय संहिता उन सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ निजी बचाव के अधिकार के इस्तेमाल पर भी रोक लगाता है जो अपने कानूनी कर्तव्यों का पालन कर रहे हों. उदाहरण के लिए जब कोई पुलिस अधिकारी कानूनी रूप से किसी को गिरफ्तार कर रहा हो तो कोई व्यक्ति आमतौर पर सिर्फ उस कानूनी कार्रवाई का विरोध करने के लिए निजी बचाव का अधिकार नहीं मांग सकता. अधिकारी के व्यवहार की स्थिति और यह बात की क्या वह काम कानून के अधिकार के दायरे में किया गया था जरूरी हो सकती हैं.

यह भी पढ़ेंः 'लोहे के कड़े से सिर पर वार'... स्वतंत्र भारद्वाज पर कौन सी धारा लगेगी?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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