शिपकी-ला में नहीं होता करेंसी का इस्तेमाल, कैसे होता है बिजनेस?
Shipki La Trade: शिपकी ला से व्यापार एक बार फिर से शुरू हो चुका है. आइए जानते हैं कि यहां व्यापार के लिए किस मुद्रा का इस्तेमाल किया जाता है.

- केवल अनुमोदित वस्तुओं का ही व्यापार किया जाता है।
Shipki La Trade: लगभग 6 साल के अंतराल के बाद हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला दर्रे के जरिए भारत और तिब्बत के बीच सीमा पार व्यापार फिर से शुरू हो चुका है. यह व्यापार मार्ग कोरोना महामारी और सीमा पार तनाव की वजह से बंद कर दिया गया था. इसे आधिकारिक तौर पर 1 अगस्त को फिर से खोल दिया गया है. इस रास्ते की खासियत यह है कि यहां व्यापार अभी भी बिना कैश, यूपीआई, चेक या फिर डिजिटल पेमेंट क्या होता है. इसके बजाय व्यापारी सदियों पुराने बार्टर सिस्टम का पालन करते हैं. इसमें सामान के बदले सीधे दूसरा सामान लिया-दिया जाता है.
सदियों पुराना वस्तु विनिमय सिस्टम आज भी चलन में
पारंपरिक व्यापार के उलट शिपकी ला में लेन-देन में किसी भी मुद्रा का इस्तेमाल नहीं होता. भारतीय व्यापारी मंजूरी प्राप्त सामान सीमा पार तिब्बत ले जाते हैं और वहां मौजूद उत्पादों के बदले उनका आदान-प्रदान करते हैं. पैसे से भुगतान करने के बजाय दोनों पक्ष पारंपरिक व्यापार प्रथाओं के आधार पर आपसी सहमति से सामान की कीमत तय करते हैं.
इस अनोखे वस्तु विनिमय सिस्टम का पालन ऐतिहासिक सिल्क रुट पर सदियों से किया जाता रहा है और यह भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय समझौते के तहत आज भी जारी है.

6 साल बाद व्यापार फिर से शुरू
कोरोना महामारी और सीमा संबंधी प्रतिबंधों की वजह से लगभग 6 साल तक बंद रहने के बाद शिपकी ला दर्रे के जरिए व्यापार आधिकारिक तौर पर 1 अगस्त को फिर से शुरू कर दिया गया है. इसके फिर से शुरू होने से हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के स्थानीय व्यापारियों को फायदा होने की उम्मीद है. इनमें से कई पारंपरिक रूप से अपनी आजीविका के लिए इस मौसमी सीमा पार व्यापार पर निर्भर रहे हैं. दोबारा शुरू हुए इस व्यापार से तिब्बत के साथ भारत के सबसे पुराने पारंपरिक व्यापार मार्ग में से एक फिर से शुरू हो गया है.
सरकार द्वारा मंजूरी प्राप्त सामान का ही व्यापार
बार्टर सिस्टम पर भी कड़ा नियंत्रण है. दोनों सरकारों की तरफ से सामानों की एक खास सूची को मंजूरी दी गई है जिनका आदान-प्रदान किया जा सकता है. भारत को लगभग 36 वस्तुओं के एक्सपोर्ट की अनुमति है. इनमें चाय, कॉफी, मसाले, सूखे मेवे, गुड़, चावल, गेहूं, चीनी, कपड़े, बर्तन, हस्तशिल्प और घड़ियां शामिल हैं.
इसके बदले में व्यापारी तिब्बत से लगभग 20 मंजूरी प्राप्त उत्पादों का आयात कर सकते हैं. इनमें कच्ची ऊन, पशमीना, कालीन, याक के बाल, भेड़ की खाल, चाइना क्ले और कई हर्बल उत्पाद शामिल हैं. इन मंजूरी प्राप्त सूचियों के बाहर किसी भी सामान का व्यापार नहीं किया जा सकता.
व्यापारिक यात्रा के लिए कड़े नियम लागू
पूरी व्यापारिक प्रक्रिया कड़ी निगरानी में की जाती है. किन्नौर जिले की नामग्या पंचायत में ₹1.70 करोड़ की लागत से बना एक आधुनिक छुपान ट्रेड मार्ट आधिकारिक व्यापार केंद्र के तौर पर काम करता है. सीमा पार करने से पहले व्यापारियों और उनके सामान की जांच भारत तिब्बत सीमा पुलिस और कस्टम विभाग द्वारा की जाती है. इसमें सिर्फ रजिस्टर्ड स्थानीय व्यापारियों को ही हिस्सा लेने की अनुमति है. साथ ही उन्हें अपना व्यापार पूरा करके 72 घंटे के अंदर भारत लौटना होता है.

सीमा पार सामान ढोने के लिए आज भी घोड़ों और खच्चरों का इस्तेमाल
आधुनिक तकनीक के बावजूद हिमालय के मुश्किल रास्तों की वजह से शिपकी ला में ट्रांसपोर्ट का तरीका आज भी काफी हद तक पारंपरिक ही है. ऊंचाई वाले पहाड़ी रास्ते आम गाड़ियों के लिए ठीक नहीं हैं इस वजह से व्यापारी सीमा पार सामान ले जाने के लिए घोड़ों और खच्चरों पर ही निर्भर रहते हैं. ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी दर्रों से सामान ले जाने के लिए ये जानवर सबसे व्यावहारिक और भरोसेमंद साधन बने हुए हैं.
एक सीमित मौसम में व्यापार
शिपकी ला व्यापार मार्ग पूरे साल खुला नहीं रहता. खराब मौसम और भारी बर्फबारी की वजह से पूरे साल व्यापार करना मुमकिन ही नहीं है. आमतौर पर व्यापार का मौसम जून और अगस्त के बीच शुरू होता है और मौसम के हालात के आधार पर 30 नवंबर तक चलता है. सर्दियां आते ही पहाड़ी दर्रा बंद हो जाता है. इस वजह से अगले मौसम तक व्यापारिक गतिविधि रुक जाती है.
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