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भीड़ पर चली थीं गोलियां और बिछ गई थीं लाशें, ये हैं दुनिया के सबसे खतरनाक नरसंहार

रवांडा नरसंहार को दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार कहा जाता है. जिसमें 100 दिनों में 8 लाख लोगों की हत्या की गई थी. जानिए कैसे शुरू हुआ था ये नरसंहार.

दुनिया में रवांडा नरसंहार को अब तक का सबसे बड़ा जनसंहार माना जाता है. इस नरसंहार में 100 दिनों में करीब 08 लाख लोगों की मौत हुई थी. आज हम आपको बताएंगे कि इस नरसंहार की शुरूआत कैसे हुई थी और इसमें कितने लोगों की मौत हुई थी. जानिए रवांडा नरसंहार में क्या-क्या हुआ था. 

रवांडा नरसंहार

रवांडा नरसंहार अप्रैल 1994 में हुआ था, जिसके बाद 100 दिन में ही पूरे देश में करीब 08 लाख लोगों की मौत हुई थी. बता दें कि यह देश के तुत्सी और हुतु समुदाय के लोगों के बीच हुआ एक जातीय संघर्ष था, जिसने इतना भयानक रूप लिया था. ये नरसंहार राष्ट्रपति की मौत के बाद शुरू हुआ था. जानकारी के मुताबिक 7 अप्रैल 1994 में रवांडा के प्रेसिडेंट हेबिअरिमाना और बुरंडियन के प्रेसिडेंट सिप्रेन की हवाई जहाज पर बोर्डिंग के दौरान हत्या कर दी गई थी. उस वक्त हुतु समुदाय की सरकार थी और उन्हें लगा कि यह हत्या तुत्सी समुदाय के लोगों ने की है. इस हत्या के दूसरे ही दिन ही पूरे देश में नरसंहार शुरू हो गया था. हुतु सरकार के अपने सैनिक भी इसमें शामिल थे. उन्हें तुत्सी समुदाय के लोगों को मारने का आदेश दिया गया था. 

100 दिनों में 8 लाख लोगों की हत्या

बता दें कि इस नरसंहार के शुरूआत में कुछ ही दिनों में 80000 से भी ज्यादा तुत्सी समुदाय के लोगों को मार दिया गया था और कई लोग तो देश छोड़कर भाग गए थे. ये नरसंहार करीब 100 दिनों तक चला था, जिसमें मौत का आंकड़ा 10 लाख के करीब पहुंचा था. इसमें सबसे ज्यादा मरने वालों की संख्या तुत्सी समुदाय के लोगों की ही थी.

लाखों परिवार उजड़ा

इस नरसंहार में हुतु समुदाय के लोगों ने मासूम बच्चों तक को सड़कों पर काटकर फेंका था. इस नरसंहार ने रवांडा को बर्बाद कर दिया था, इसमें लाखों परिवार उजड़ गए थे. यह नरसंहार इतना भयानक था कि आज भी यहां के लोग उस हादसे को याद कर सहम उठते हैं. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे और महिलाएं बने थे. उस दौरान हजारों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था.  तुत्सी समुदाय के लोगों की निर्मम हत्या के बाद उनके घर लूट लिए गए थे, इसके बाद घरों में ही उनके शवों को जला दिया गया था.

कैसे बिगड़े थे हालात

अब आप सोच रहे होंगे कि ये रवांडा का माहौल कैसे बिगड़ा था. बता दें कि 1918 से पहले रवांडा के हालात सामान्य थे. हालांकि देश गरीब था, लेकिन हिंसा नहीं हुआ था. लेकिन 1918 में बेल्जियम ने रवांडा पर कब्जा कर लिया था, इसके बाद यहां जनगणना कराई गई थी. इसके बाद बेल्जियम की सरकार ने रवांडा के लोगों की पहचान के लिए पहचान-पत्र जारी करवाया था. इस पहचान-पत्र में रवांडा की जनता को तीन जातियों (हुतु, तुत्सी और तोवा) में बांटा गया था. वहीं विभाजन में हुतु समुदाय को रवांडा की उच्च जाति बताते हुए, उन्हें सरकारी सुविधाएं देनी शुरू कर दी. इससे तुत्सी समुदाय भड़क उठा और दोनों समुदायों के बीच हिंसक झड़प शुरू हो गई थी. 

रवांडा बना देश

पश्चिमी देशों की मध्यस्था से 1962 में रवांडा आजाद हुआ था और एक नया देश बना था. इसके बाद 1973 में हुतु समुदाय के ‘हेबिअरिमाना’ रवांडा के प्रेसिडेंट बने थे. लेकिन हेबिअरिमाना के प्लेन पर हमला हुआ, जिसमें उनकी मौत हो गई थी. यही घटना रवांडा के नरसंहार की वजह बनी थी, जिसके बाद इस जनसंहार में रवांडा की लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या खत्म हो गई थी.

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