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नाटो से लोहा लेने के लिए रूस ने बनाया था वारसॉ पैक्ट, जानें इसमें कौन-कौन से ताकतवर देश थे शामिल?

Russia Warsaw Pact: रूस और अमेरिका बीच शुरू से ही संबंध अच्छे नहीं रहे हैं. इसीलिए रूस ने नाटो से मुकाबले के लिए वारसॉ पैक्ट बनाया था. यह 8 देशों के बीच एक तरह की संधि थी, जो कि बाद में खत्म हो गई.

रूस इस वक्त दुनिया का दूसरा सबसे ताकतवर देश है. वो लगातार किसी न किसी तरीके से अपनी ताकत बढ़ा रहा है और खुद को मजबूत करने में लगा हुआ है. रूस ने एक वक्त पर नाटो से भिड़ने के लिए वारसॉ पैक्ट बनाया था. वारसॉ पैक्ट को आधिकारिक तौर पर मित्रता, सहयोग और पारस्परिक सहायता की संधि के रूप में जाना जाता है. यह 1955 में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोपीय देशों के बीच एक हस्ताक्षरित सैन्य गठबंधन था. इसको नाटो के जवाब के रूप में बनाया गया था. इसका मुख्य उद्देश्य था कि नाटो के सदस्य देश का यूरोप में मुकाबला करना. चलिए वारसॉ पैक्ट के बारे में विस्तार से जानें और जानते हैं कि इसमें कौन कौन से सदस्य देश शामिल थे. 

क्या था वारसॉ पैक्ट

1955 में सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्व देशों ने एक गठबंधन किया था, जिसको कि वारसॉ पैक्ट के नाम से जाना जाता था. इसका सबसे अहम काम था कि वो नाटो में शामिल देशों का यूरोप में मुकाबला करे. इस संधि में शामिल देशों का कहना था कि अगर कोई भी बाहरी ताकत वहां हमला करती है, तो वे बचाव के लिए आगे आएंगे. सदस्य देशों ने राजनीतिक और आर्थिक मामलों में भी सहयोग करने की सहमति जताई थी. वारसॉ पैक्ट ने पूर्वी यूरोप में सोवियत संघ के राजनीतिक प्रभाव को और मजबूत कर दिया थआ. वारसॉ पैक्ट शीत युद्ध के दौरान बहुत ही महत्वपूर्ण था, जिसने यूरोप में दो विरोधी सैन्य गुटों के बीच तनाव को बढ़ावा दिया था.

वारसॉ पैक्ट में कौन कौन से देश शामिल 

14 मई 1955 को बनाए गए वारसा पैक्ट में सोवियत संघ, बुल्गारिया, अल्बानिया, जर्मनी, पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और रोमानिया शामिल थे. 1968 में रोमानिया और अल्बानिया इससे अलग हो गया था. वहीं 1990 में पूर्वी जर्मनी भी पीछे हट गया था. 1991 में शीत युद्ध के अंत के साथ रोमानिया ने अपनी प्रासंगिकता खो दी थी और 1 जुलाई 1991 को यह औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया था. 

बाद में नाटो में शामिल हो गए देश 

इस संधि का सबसे जरूरी प्रोविजन सोवियत संघ को पूर्वी यूरोपीय देशों में अपनी सेना तैनात करने की अनुमति देना था. इसका इस्तेमाल 1956 में पोलैंड और हंगरी में विद्रोह के दौरान और 1968 में चेकोस्लोवाकिया में किया गया था. उस समय सोवियत संघ ने इन देशों में अपने सैनिकों को भेजा था. विघटन के बाद वारसॉ पैक्ट में शामिल ज्यादातर देश नाटो में शामिल हो गए थे.  

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