"रमजान का पवित्र माह शुरू" जानिए किस तरह इबादत करते हैं मुस्लिम, क्या होती है सहरी, इफ्तार और तरावीह?
आइए जानते हैं कि रमजान, तरावीह, इफ्तार और सहरी का असल मायना क्या है और इनका धार्मिक महत्व कितना गहरा है. यह महीना सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है बल्कि खुद पर काबू रखने की भी वजह बनता है.

इस्लामी कैलेंडर का सबसे मुकद्दस महीना रमजान दस्तक दे चुका है. चांद के दीदार के साथ ही दुनिया भर के मुसलमान रोजे की शुरुआत कर चुके हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में भी गुरुवार को पहला रोजा रखा जाएगा. अरब मुल्क, पश्चिम एशिया सहित यूरोपीय देशों में बुधवार को पहला रोजा रखा गया.
रमजान की शुरुआत दरअसल, इबादत, पूजा, भक्ति, बंदगी, प्रसतिश और दुआ से लबरेज रूहानी महीने का आगाज़ है. यह महीना सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है बल्कि खुद पर काबू रखने, दिल और सोच को साफ करने और इंसानियत को समझने का मौका होता है.
रमजान में जहां दिन में रोजे रखे जाते हैं तो वहीं रातें खास नमाज तरावीह और दुआओं से भरपूर रहती हैं.
आइए जानते हैं कि रमजान, तरावीह, इफ्तार और सहरी का असल मायना क्या है और इनका धार्मिक व सामाजिक महत्व कितना गहरा है.
क्या होता है रमजान?
रमजान इस्लामिक हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना है और इसे सबसे पवित्र माना जाता है. इस्लाम में ऐसा कहा गया है कि इसी महीने में पवित्र कुरआन शरीफ का अवतरण शुरू हुआ था. इस महीने में रोजा रखना इस्लाम के पांच फर्ज इबादतों (जरूरी इबादत) में से एक है. रोजे का मतलब है फज्र (सुबह) से लेकर मगरिब (सूर्यास्त) तक खाने-पीने और तमाम बुरे कामों से परहेज करना. इसका मकसद केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि ख्यालों और बर्ताव की पाकीजगी भी है. रमजान 29 या 30 दिनों का होता है, जो चांद दिखने पर निर्भर करता है.
क्या है रोजे का पहला पड़ाव "सहरी"?
सहरी का मतलब है सहर यानी सुबह के वक्त का खाना. जब मुस्लिम लोग रोजा रखने की नियत करते हैं तो उसे सहरी (सहूर) कहा जाता है. इसे बरकत वाला भोजन बताया गया है, जिसका जिक्र इस्लाम की कई हदीसों ( पैगंबर मोहम्मद के अमल और बयान) में मिलता है. सहरी रोजेदार को पूरे दिन के लिए ऊर्जा देती है और इसे करना सुन्नत माना गया है, यानी इस अमल को आखिरी पैगंबर मोहम्मद साहब भी किया करते थे. सहरी सुबह की पो फटने से पहले की जाती है और फज्र की अजान शुरू होते ही खाने-पीने से रुक जाना जरूरी होता है, क्योंकि उसी वक्त से रोजा शुरू हो जाता है.
रमजान का दूसरा पड़ाव है इफ्तार?
इफ्तार अरबी भाषा का शब्द है. यह अरबी क्रिया 'अफ्तारा' (Aftara) से बना है, जिसका है मतलब है 'रोजा तोड़ना' या 'नाश्ता करना. दिन भर के रोजे के बाद जब सूरज ढलता है तो रोजेदार इफ्तार के जरिए अपना रोजा खोलते हैं. परंपरा के मुताबिक खजूर और पानी से रोजा खोला जाता है, जिसे सुन्नत माना जाता है. इफ्तार सिर्फ भोजन का समय नहीं, बल्कि शुक्र अदा करने और सामूहिक एकता का प्रतीक भी है. कई जगहों पर मस्जिदों और सामाजिक संगठनों द्वारा सामूहिक इफ्तार का आयोजन किया जाता है, जहां अमीर-गरीब सब एक साथ बैठकर रोजा खोलते हैं.
खुदा के नजदीक लाती है तरावीह की नमाज
रमजान की रातों को खास बनाती है तरावीह की नमाज. यह इशा की नमाज के बाद अदा की जाती है और आमतौर पर 20 रकअत पढ़ी जाती हैं, हालांकि कुछ जगहों पर 8 रकअत भी अदा की जाती हैं. तरावीह की खास बात यह है कि पूरे रमजान में मस्जिदों में कुरआन शरीफ को मुकम्मल तौर पर सुनाया जाता है. इससे मुसलमानों का कुरआन से जुड़ाव और गहरा होता है. मस्जिदों में रात देर तक इबादत का माहौल रहता है. हालांकि तरावीह की नमाज आम नमाजों की तरह फर्ज (जरूरी) नहीं है, यानी पढ़ने पर सवाब मिलता है और छोड़ने पर कोई गुनाह नहीं.
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