संसद में गलत जानकारी देने पर क्या मंत्री की कुर्सी जा सकती है, जानें क्या है संविधान में नियम?
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राजनाथ सिंह पर संसद में गलत बयान देने का आरोप लगा है. चलिए जानें कि क्या वाकई अगर कोई मंत्री संसद में गलत जानकारी देता है तो उसकी कुर्सी जा सकती है कि नहीं.

संसद को देश का लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, जहां हुई हर बात का सीधा जनता पर असर पड़ता है. हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के एक पुराने भाषण को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हुई है, जिसे सरकार ने भ्रामक और गलत बताया है. सरकार ने कहा है कि रक्षा मंत्री के बयान को गलत तरीके से पेश करने की कोशिश की गई है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई अगर किसी मंत्री ने संसद में झूठ जानकारी दी तो क्या उसकी कुर्सी जा सकती है? भारतीय संविधान और संसदीय नियमों में इसके लिए बहुत कड़े प्रावधान किए गए हैं, चलिए उसके बारे में जानते हैं.
संसद में झूठ बोलना मतलब सदन की अवमानना
संसद या फिर विधानसभा में अगर कोई मंत्री अपनी बात रखता है, तो उसे बेहद जिम्मेदारी से काम लेना होता है. उसने जो भी बात कही होती है, उसके लिए वह जिम्मेदार होता है. अगर कोई मंत्री सदन में झूठ बोलता है, या फि जानबूझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है तो इसे सीधे तौर पर विशेषाधिकार का हनन या सदन की अवमानना माना जाता है. ऐसे मामलों में सदन की कार्यवाही को बाधित करने या फिर गुमराह करने के आरोप में विपक्ष या कोई भी अन्य सदस्य जैसे लोकसभा स्पीकर या फिर राज्यसभा के सभापति को विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे सकता है. यह नोटिस इस बात की शुरुआत होता है कि मंत्री की जवाबदेही तय की जाए.
जांच कमेटी और कार्रवाई
नोटिस मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति इस मामले की जांच के लिए विशेषाधिकार समिति के पास भेजते हैं. यह समिति सदन के सदस्यों से मिलकर बनती है, जो निष्पक्षता से आरोपों की पड़ताल करती है. समिति इस बात की गहराई से जांच करती है कि मंत्री ने जो भी गलत जानकारी दी थी, वो कोई मानवीय भूल थी या फिर सदन को गुमराह करने की सोची-समझी साजिश थी. अगर इस समिति की रिपोर्ट में मंत्री दोषी पाया जाता है तो समिति सदन से मंत्री के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की सिफारिश करती है.
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मंत्री पद से बर्खास्तगी के नियम
अगर विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट गंभीर होती है तो सदन संबंधित मंत्री को पद से हटाने या फिर उनको सदन से निष्कासित करने का प्रस्ताव भी पारित कर सकता है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 के तहत अगर संसद में किसी मंत्री का झूठ पकड़ा जाता है तो प्रधानमंत्री या राज्य के मुख्यमंत्री किसी मंत्री की इस हरकत से नाराज होने पर तुरंत उससे इस्तीफे की मांग कर सकते हैं, या सीधे उनको बर्खास्त करने की सिफारिश राज्यपाल या राष्ट्रपति से कर सकते हैं.
क्या ऐसे मामले में अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं?
ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या इन मामलों में अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं? संसद और विधानसभा के सदस्यों को सदन के भीतर कुछ विशेष अधिकार और कानूनी उन्मुक्ति देता है. इसके तहत सदन के अंदर दिए गए किसी भी भाषण या बयान के लिए किसी भी सदस्य के खिलाफ बाहर की किसी अदालत में कोई आपराधिक या दीवानी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मंत्री कुछ भी बोलने के लिए आजाद हैं, उनको भी अदालत के नियमों के तहत काम करना होता है.


















