7 राज्यसभा सांसदों के BJP में जाने से टूट जाएगी आप, क्या इसके खिलाफ कोर्ट जा सकते हैं केजरीवाल; जानें नियम?
7 AAP MP Will Join BJP: राघव चड्ढा के नेतृत्व में AAP के 7 राज्यसभा सांसदों ने भाजपा में विलय का ऐलान किया है. 10 में से 7 सांसदों के साथ आने के कारण संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत यह दलबदल कानून की अयोग्यता से सुरक्षित है.

- राघव चड्ढा का दावा, 7 आप राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल होंगे.
- 70% सांसदों का साथ, दलबदल कानून के दायरे से बाहर.
- कानूनी रूप से मुश्किल, केजरीवाल के लिए अदालत का रास्ता कठिन.
- सभापति की मंजूरी पर निर्भर, विलय की अंतिम मुहर लगेगी.
7 AAP MP Will Join BJP: सियासी गलियारों में हवेलियों की तरह ही कुछ राज बंद कमरों के पीछे तैयार किए जाते हैं, जिनके बाहर आने पर सत्ता का पूरा नक्शा बदल जाता है. आम आदमी पार्टी के भीतर भी ऐसा ही एक भूचाल आया है, जिसने पूरी दिल्ली की राजनीति को हिलाकर रख दिया है. राघव चड्ढा की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने पार्टी की नींव में पड़ी दरारों को सबके सामने लाकर खड़ा कर दिया है. यह आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के लिए किसी सदमे से कम नहीं है. चलिए जानें कि क्या इससे पार्टी टूट जाएगी और क्या केजरीवाल इसके खिलाफ कोर्ट जा सकते हैं?
राघव चड्ढा की प्रेस कॉन्फ्रेंस और पार्टी में बगावत
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने एक सनसनीखेज प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि उनके नेतृत्व में पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने भाजपा में शामिल होने का फैसला किया है. इस मंच पर उनके साथ संदीप पाठक और अशोक मित्तल की मौजूदगी ने इस खबर को और भी पुख्ता कर दिया. राघव चड्ढा का कहना है कि आम आदमी पार्टी अब अपने उन बुनियादी सिद्धांतों से भटक गई है, जिन पर यह पार्टी बनी थी. इसी वैचारिक मतभेद का हवाला देते हुए उन्होंने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया है.
दो-तिहाई सांसदों का साथ और सियासी गणित
राघव चड्ढा के इस दावे की सबसे बड़ी ताकत वो आंकड़े हैं जो उन्होंने पेश किए हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके साथ केवल वे ही नहीं, बल्कि हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी और स्वाति मालीवाल जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं. आप के कुल 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 का एक साथ आना 'दो-तिहाई' का वह जादुई आंकड़ा पूरा करता है, जो दलबदल विरोधी कानून के दायरे से बाहर है. यानि 70% आप का राज्यसभा दल राघव चड्ढा के साथ है.
दलबदल विरोधी कानून का सुरक्षा कवच
अब सवाल यह उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी इस बगावत को कानूनी तौर पर रोक सकती है? भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर 'दलबदल विरोधी कानून' के रूप में जाना जाता है, इस पूरे प्रकरण का केंद्र है. नियम यह है कि यदि किसी भी पार्टी के दो-तिहाई या उससे अधिक सदस्य अलग होकर किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. चूंकि यहां 10 में से 7 सांसद साथ हैं, इसलिए तकनीकी रूप से यह विलय संवैधानिक रूप से वैध माना जा रहा है.
केजरीवाल की मुश्किलें और कानूनी राह
क्या अरविंद केजरीवाल इस फैसले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं? कानून के जानकारों का मानना है कि केजरीवाल के लिए यह रास्ता बेहद चुनौतीपूर्ण है. अदालत में तब तक कोई ठोस राहत मिलना मुश्किल है, जब तक यह साबित न हो जाए कि सांसदों के हस्ताक्षर फर्जी थे या उन्हें किसी तरह के दबाव में पार्टी छोड़ने का यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया गया है. जब तक कोई गंभीर वैधानिक उल्लंघन साबित नहीं होता, तब तक संवैधानिक प्रावधानों के तहत इस विलय को रोकना किसी भी अदालत के लिए एक कठिन कानूनी परीक्षा होगी.
सभापति की भूमिका अंतिम मुहर
इस पूरे सियासी नाटक का क्लाइमेक्स राज्यसभा के सभापति के पाले में भी जाता है. कानून के अनुसार, इस तरह के विलय को मान्यता देने का अंतिम अधिकार सभापति के पास ही निहित है. यदि सभापति इन सांसदों के पत्रों और दस्तावेजों को सही पाते हैं और उन्हें नियमों के अनुरूप मानते हैं, तो वे आधिकारिक तौर पर इस विलय को मंजूरी दे सकते हैं. एक बार मान्यता मिल जाने के बाद, इन 7 सांसदों का भाजपा में शामिल होना पूर्णतः औपचारिक हो जाएगा और पार्टी के लिए इसे पलटना लगभग असंभव होगा.
क्या इससे टूट जाएगी आम आदमी पार्टी?
इस बगावत का असर केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं रहने वाला है. व्यावहारिक रूप से यह आम आदमी पार्टी के संसदीय दल के लिए एक बड़ा पॉलिटिकल ब्रेकडाउन है. 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों का जाना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर गहरा असंतोष है. भले ही कानूनी रूप से पार्टी का अस्तित्व बना रहे, लेकिन राज्यसभा जैसे महत्वपूर्ण मंच पर पार्टी की ताकत का इस तरह बिखरना, केजरीवाल के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर रहा है.
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