देश में चार ही संत क्यों बन सकते हैं शंकराचार्य, क्या हैं इसके नियम?
Shankaracharya Controversy: शंकराचार्य की पदवी आस्था से ज्यादा परंपरा और नियमों से जुड़ी है. यही वजह है कि देश में केवल चार शंकराचार्य ही मान्य माने जाते हैं. आइए जानें कि वो कौन से नियम हैं.

प्रयागराज के माघ मेले में हुआ एक टकराव अचानक देशभर की चर्चा बन गया है. मामला सिर्फ प्रशासन से विवाद का नहीं रहा, बल्कि सदियों पुरानी एक परंपरा पर सवाल खड़े हो गए हैं. आखिर देश में शंकराचार्य सिर्फ चार ही क्यों होते हैं? क्या कोई भी खुद को शंकराचार्य घोषित कर सकता है? और इस पद के लिए नियम कौन तय करता है? इसके पीछे इतिहास, शास्त्र और परंपरा की एक लंबी कहानी छिपी है, चलिए जानें.
शंकराचार्य पद का विवाद क्यों चर्चा में है?
प्रयागराज माघ मेले के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों और मेला प्रशासन के बीच टकराव देखने को मिला था. यह मामला धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेने लगा. इसी के साथ सवाल उठने लगे कि देश में शंकराचार्य कितने हो सकते हैं और उनकी वैधता कैसे तय होती है.
शंकराचार्य पद की शुरुआत कहां से हुई?
शंकराचार्य की पदवी का इतिहास सीधे आठवीं सदी के महान संत आदि शंकराचार्य से जुड़ा है. उन्होंने पूरे भारत में भ्रमण कर सनातन धर्म के अद्वैत वेदांत सिद्धांत का प्रचार किया था. उनका मूल संदेश था कि ब्रह्म एक है और वही संपूर्ण सृष्टि का आधार है. इसी दर्शन को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने एक ठोस संस्थागत व्यवस्था बनाई.
चार दिशाओं में चार मठ क्यों बनाए गए?
आदि शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की. इसके पीछे विचार था कि देश के हर कोने में अद्वैत वेदांत की शिक्षा पहुंचे. वैदिक सिद्धांत “एकोहं बहुस्याम” यानी एक से अनेक होने की भावना के आधार पर एक शंकराचार्य परंपरा से चार शंकराचार्यों की व्यवस्था बनी. इन्हीं चार मठों के प्रमुख को शंकराचार्य की पदवी दी जाती है.
शंकराचार्य बनने के नियम कौन तय करता है?
शंकराचार्य की नियुक्ति कोई मनमानी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आदि शंकराचार्य द्वारा रचित ‘मठाम्नाय महानुशासन’ नामक ग्रंथ में इन मठों की व्यवस्था, परंपरा और उत्तराधिकार के नियम स्पष्ट रूप से बताए गए हैं. इसी ग्रंथ के अनुसार शंकराचार्य का चयन होता है. जो मठ इस व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आते, उन्हें आधिकारिक मान्यता नहीं मिलती है.
देश के चार प्रमुख शंकराचार्य मठ कौन से हैं?
उत्तर दिशा में उत्तराम्नाय मठ यानी ज्योतिर्मठ स्थित है, जो उत्तराखंड के जोशीमठ में बदरिकाश्रम के पास है. इसी पीठ को लेकर मौजूदा विवाद चल रहा है. पूर्व दिशा में पूर्वाम्नाय मठ है, जिसे गोवर्धन मठ कहा जाता है और यह ओडिशा के पुरी में स्थित है. इसके शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती हैं. दक्षिण में दक्षिणाम्नाय मठ या शृंगेरी मठ है, जिसे शारदा पीठ भी कहा जाता है और यह कर्नाटक के शृंगेरी में स्थित है. इसके शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ हैं. पश्चिम दिशा में पश्चिमाम्नाय मठ यानी द्वारिका पीठ है, जो गुजरात के द्वारिका में स्थित है और यहां वर्तमान में स्वामी सदानंद शंकराचार्य हैं.
चार से ज्यादा शंकराचार्य क्यों मान्य नहीं?
वैदिक परंपरा के अनुसार केवल इन्हीं चार मठों के पीठाधीश्वर शंकराचार्य कहलाते हैं. देश में कई अन्य मठ भी हैं, जहां शंकराचार्य की उपाधि इस्तेमाल की जाती है, लेकिन वे ‘महानुशासन’ के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए उन्हें धार्मिक परंपरा में आधिकारिक मान्यता और विश्वसनीयता नहीं मिलती, भले ही उनकी अपनी आस्था और अनुयायी हों.
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