Parliament Monsoon Session: डिलिमिटेशन बिल ध्वनि मत से क्यों नहीं हो सकता पास? जानिए क्यों जरूरी है स्पेशल बहुमत
Parliament Monsoon Session: ऐसा कहा जा रहा है कि मानसून सत्र में परिसीमन विधेयक पेश किया जा सकता है. आइए जानते हैं कि इसे वॉइस वोट से क्यों नहीं पारित किया जा सकता.

- 20 जुलाई से मानसून सत्र; परिसीमन विधेयक पेश होने की संभावना।
- यह संवैधानिक संशोधन है, साधारण वॉइस वोट से पारित नहीं होगा।
- लोकसभा सीटें बढ़ाने को विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी।
Parliament Monsoon Session: 20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है. इसी के साथ सरकार द्वारा परिसीमन विधेयक पेश किए जाने की संभावना एक बार फिर से जोर पकड़ चुकी है. हालांकि यह विधेयक संभावित विधायी एजेंडा का हिस्सा नहीं है लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक इसे सत्र के दौरान संसद में लाया जा सकता है. क्योंकि प्रस्तावित कानून का मकसद लोकसभा सीटों के आवंटन से जुड़े संवैधानिक प्रावधान में संशोधन करना है, इस वजह से इसे साधारण वॉइस वोट से पारित नहीं किया जा सकता. आइए जानते हैं इस बारे में पूरी जानकारी.
वॉइस वोट का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता?
प्रस्तावित परिसीमन विधेयक एक संविधान संशोधन विधेयक है. यह विधेयक 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026 है. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में किसी भी संशोधन को सिर्फ वॉइस वोट के जरिए मंजूरी नहीं दी जा सकती. इसके बजाय संसद सदस्यों को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग या फिर पेपर स्लिप के जरिए से रिकॉर्ड वोट डालना होता है. ऐसा इसलिए ताकि हर वोट की आधिकारिक गिनती हो सके.
वॉइस वोट का इस्तेमाल आमतौर पर सामान्य कानून के लिए किया जाता है. इस प्रक्रिया में पीठासीन अधिकारी हां या फिर नहीं की तेज आवाज के आधार पर नतीजे तय करते हैं. हालांकि संविधान संशोधन के लिए पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और वोटों की सटीक संख्या की गिनती जरूरी होती है. इससे वॉइस वोट कानूनी रूप से अपर्याप्त हो जाता है.
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संवैधानिक बदलावों के लिए सहमति की जरूरत
यह विधेयक भारत के संसदीय प्रतिनिधित्व में बड़े बदलाव का प्रस्ताव करता है. इसमें लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 करना और सीटों के आवंटन पर लंबे समय से लगी रोक को खत्म करना शामिल है. क्योंकि यह बदलाव देश के संवैधानिक ढांचे और संघीय संरचना को प्रभावित करते हैं इस वजह से संसद के अनुच्छेद 368 में बताई गई विशेष प्रक्रिया का ही पालन करना होगा.
संविधान के मुताबिक ऐसे जरूरी सुधारों के कानून बनने से पहले उच्च स्तर के राजनीतिक सहमति काफी जरूरी है. ऐसा इसलिए ताकि इस बात को पक्का किया जा सके कि चुनावी सीमाओं और प्रतिनिधित्व को सिर्फ साधारण संसदीय बहुमत से नहीं बदला जा सके.
क्या है विशेष बहुमत?
संविधान संशोधन को पारित करने के लिए विधेयक को एक साथ दो अलग-अलग शर्तों को पूरा करना होगा. पहला, इसे मतदान के दिन सदन में मौजूद और मतदान करने वाले संसद सदस्यों में से कम से कम दो तिहाई सदस्यों का समर्थन मिलना चाहिए. दूसरा, विधेयक को सदन की कुल सदस्य संख्या के 50% से ज्यादा सदस्यों का समर्थन मिलना चाहिए. भले ही मतदान के समय कितने भी सदस्य मौजूद हों. जब तक इन दोनों शर्तों को पूरा नहीं किया जा सकता तब तक संविधान संशोधन पारित नहीं किया जा सकता.
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